चीन पर क्या अनाज की कमी से बड़ा ख़तरा मंडरा रहा है?
चीनी राष्ट्रपति शी ज़िनपिंग ने इस महीने 2013 के 'क्लीन योर प्लेट कैम्पेन' का नया संस्करण लॉन्च किया है और लोगों से खाना बर्बाद न करने को कहा है. इसके अलावा उन्होंने कम खर्च को बढ़ावा देने की भी बात की है.
चीन के सरकारी समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, शी ज़िनपिंग ने खाने की बर्बादी को 'हैरान करने वाला और निराशाजनक' बताते हुए इस मुद्दे पर जागरूकता फैलाने को कहा है. उन्होंने कहा कि ऐसा सामाजिक वातावरण तैयार किया जाए जिसमें खाना बर्बाद करने को 'शर्मिंदगी के नज़रिए' से देखा जाए.
चाइना ग्लोबल टेलिविज़न नेटवर्क (सीजीटीएन) ने ज़िनपिंग के हवाले से कहा है, ''हालांकि चीन ने कई सालों से बम्पर पैदावार की है लेकिन अब भी खाद्य सुरक्षा को लेकर जागरूकता फैलाने की ज़रूरत है. कोविड-19 का असर हमारे लिए अलार्म की तरह है."
सरकारी मीडिया शी ज़िनपिंग के बयान के तत्काल बाद उनका अनुसरण करते हुए अलग-अलग मंचों पर खाना बर्बाद नहीं होने करने को प्रोत्साहित करने लगा.
इसके लिए सरकारी मीडिया आंकड़ों का भी हवाला दिया. इन आंकड़ों के मुताबिक चीनी उपभोक्ताओं ने साल 2015 में बड़े शहरों में 17 से 18 टन तक खाना बर्बाद किया है.
चीन की एक दूसरी सरकारी मीडिया 'सीसीटीवी' ने उन लोगों की आलोचना की जो अपने प्रशंसकों के लिए लाइव स्ट्रीमिंग करते हुए बहुत ज़्यादा खाना खाते हैं और बाद में उल्टी कर देते हैं.
सरकारी मीडिया की इस मुहिम ने विश्लेषकों के मन में यह आशंका पैदा कर दी है कि बर्बादी और लोगों के ग़ैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार की आड़ में चीन में खाद्य संकट की बात छिपाई तो नहीं जा रही?
सरकारी मीडिया के लिए सब 'हरा ही हरा'
सरकारी मीडिया ने इस चिंता को अधिक तवज्जो नहीं दी है कि चीन कोविड-19 या फिर कई प्रांतों में प्राकृतिक आपदा के कारण फसल बर्बाद होने की वजह से किसी तरह के खाद्य संकट का सामना कर रहा है.
मीडिया ने इस बात पर भी ज़ोर दिया है कि चीन ने खाद्य उत्पादन, टिड्डियों के प्रकोप और महामारी के असर पर अच्छी तरह से नियंत्रण रखा है.
सरकारी मीडिया में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि बारिश से देश के दक्षिणी हिस्से में आई बाढ़ में फसल बर्बाद होने के बावजूद खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर चीन पूरी तरह से तैयार है और स्थिति उसके नियंत्रण में है.
सरकारी समाचार एजेंसी 'शिन्हुआ' का कहना है कि चीन टिड्डियों के प्रकोप और साल 2003 में बने थ्री जॉर्ज रेज़रवायर में आई बाढ़ के बावजूद 'वसंत में शानदार फसल' होने को लेकर आश्वस्त है.
चीनी मीडिया ने यह दावा भी किया है कि देश में धान, गेहूँ और दूसरे अनाजों का पर्याप्त भंडार मौजूद है. मीडिया ने यहां तक कहा है कि इस साल तो धान की और ज़्यादा फसल हुई है.
चीनी कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि चीन में 2019 में कुल अनाज की पैदावर 664 मिलियन टन हुई है.
चीनी टीवी चैनल सीजीटीएन के मुताबिक़, इसमें 210 मिलियन टन चावल और 134 मिलियन टन गेहूँ है जबकि अभी देश में चावल की खपत 143 मिलियन टन और गेहूँ की खपत 125 मिलियन टन है.
ग्लोबल टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि चीन के लिए महामारी या बाढ़ के कारण खाद्यान्न की कमी होने से ज़्यादा बड़ा संकट खाना बर्बाद करने से उभर सकता है.
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चीन ने बताया 'फ़ेक न्यूज़'
चीनी मीडिया और कड़े नियंत्रण वाले वीबो जैसे चीनी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर ऐसी रिपोर्ट और टिप्पणियां देखने को मिल रही हैं जिनमें लोगों से अनाज इकट्ठा न करने को कहा जा रहा है या फिर अनाज की कमी को लेकर फैलाए जा रहे 'फेक न्यूज़' पर यकीन न करने को कहा जा रहा है.
सरकारी मीडिया इसे लेकर संपादकीय, रिपोर्ट्स और टिप्पणियां प्रकाशित कर रही है कि पश्चिमी मीडिया देश की खाद्यान सुरक्षा और खाने को बर्बाद होने से रोकने की मुहिम को 'ग़लत' तरीके से समझ रहे हैं.
इस साल की शुरुआत में भी कोरोना वायरस के प्रकोप के समय भी ऐसी ही रिपोर्ट्स आई थीं.
चीनी मीडिया और विश्लेषकों ने सरकारी थिंक टैंक की उस रिपोर्ट पर लोगों की चिंता को ग़ैरवाजिब दिखाने की कोशिश की, जिसमें चेतावनी दी गई थी कि 2025 तक चीन में खाद्य आपूर्ति में 130 मिलियन टन का अंतर आ सकता है. इसके पीछे शहरीकरण, ग्रामीण इलाक़ो में श्रम करने वालों की उम्र बढ़ने और प्रति व्यक्ति भोजन की खपत बढ़ने को ज़िम्मेदार बताया गया था.
चाइनीज़ अकैडमी ऑफ़ सोशल साइंसेज़ (CASS) के रुरल डेवेलपमेंट इंस्टिट्यूट और चाइना सोशल साइंसेज़ प्रेस की ओर से 17 अगस्त को संयुक्त रूप से जारी 'द रुरल डेवलपमेंट रिपोर्ट 2020' में यह भी कहा गया है कि गेहूं, चावल और मक्के की घरेलू आपूर्ति भी 2025 तक मांग से 25 मिलियन टन कम रहेगी.
हालांकि, इस रिपोर्ट को तैयार करने में शामिल रहे शोधकर्ता ली गूशियांग ने कहा कि कुछ मीडिया संस्थानों ने रिपोर्ट का ग़लत अर्थ समझा.
उन्होंने 19 अगस्त को चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स में लिखा था, ''दरअसल, घरेलू आपूर्ति में जो कमी होगी, उसे आयात करके पूरा किया जा सकता है. ऐसे में चीन की खाद्य सुरक्षा को कोई दिक्कत नहीं होगी."
शंघाई से चलने वाली निजी बिज़नेस न्यूज़ वेबसाइट यीसाई के रिपोर्टर चेन हुई और हू जुनहुआ ने 16 अगस्त को लिखा था कि सीएएसएस की रिपोर्ट में जिस फ़ूड सप्लाई गैप की बात की गई है, वह चीन की अनाज उत्पादन की विशाल क्षमता की तुलना में कुछ भी नहीं है. हालांकि, उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया था कि आयात पर निर्भर होना चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ठीक नहीं होगा.
उन्होंने लिखा था, "चीन रणनीतिक रूप से अहम इस जीवनरेखा के लिए आयात पर निर्भर नहीं रह सकता. 1.4 अरब चीनी लोगों का पेट भरने के लिए आयात पर निर्भर रहना व्यावहारिक नहीं लगता."
पश्चिमी मीडिया पर दोषारोपण
अंग्रेज़ी में छपने वाले सरकारी मीडिया, ख़ासकर ग्लोबल टाइम्स ने चीन की खाद्य सुरक्षा के जुड़े मसले को लेकर पश्चिमी मीडिया पर निशाना साधा है.
17 अगस्त को इसमें छपे एक लेख के अनुसार, "कुछ पश्चिमी मीडिया ने झूठी ख़बरें छापीं हैं कि दक्षिणी चीन में भारी बाढ़ और अमरीका के साथ बढ़ते तनाव के कारण पूरे चीन में खाद्य संकट का ख़तरा मंडरा रहा है."
हालांकि, चीनी भाषा के घरेलू मीडिया ने इस मामले पर विदेशी मीडिया को कोसने की बजाय देश के अंदर 'ऑनलाइन फैली अफ़वाहों' पर निशाना साधा.
चार अगस्त को सरकारी अख़बार इकनॉमिक डेली ने अनाज के संकट को लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट डालकर एक शख़्स द्वारा चलाए जा रहे सोशल मीडिया समाचार चैनल को हौव्वा बनाने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया.
चीन के अधिकतर सोशल मीडिया यूज़र सरकार के खाना बर्बाद न करने के अभियान के पक्ष में हैं. खाने की बर्बादी रोकने के लिए चलाए जा रहे अभियानों के तहत रेस्तरां ग्राहकों को अधिक खाना ऑर्डर नहीं करने देते. अगर खाना बच जाए तो उसे घर ले जाने के लिए कहते हैं.
कुछ लोग अनाज की बर्बादी बचाने के लिए और भी कड़े क़दम उठा रहे हैं. कुछ ने अनाज से बनने वाली शराब का उत्पादन रोकने का सुझाव दिया है.
'बड़े पेट वाले सितारों' यानी कि लाइवस्ट्रीमिंग करते हुए बड़ी मात्रा में खाना खाने वाले लोगों के ख़िलाफअभियान चलाना भी चीनी सोशल मीडिया यूज़र्स के बीच ख़ासा लोकप्रिय हो गया है. वो ऐसे वीडियोज़ को 'वाहियात' और 'बर्बादी करने वाला' बताने लगे हैं.
हालांकि, कुछ लोगों ने इस व्यवहार का विरोध भी किया है.
जैसे कि एक वीबो यूज़र ने 13 अगस्त को लिखा, "लोगों को खाने की आज़ादी है और बाक़ियों को देखने की. जिस समाज में सब चीज़ों पर रोक हो वो बहुत ख़राब होता है."
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