कौन हैं मौलवी मुक्तदा अल-सदर, जिनके राजनीति से इस्तीफा देने पर इराक फिर गृहयुद्ध के नजदीक खड़ा है?
मौलाना मुक्तदा अल-सदर एक इराकी शिया विद्वान होने के साथ साथ मिलिशिया नेता भी हैं, जो देश में सबसे शक्तिशाली राजनीतिक गुट के संस्थापक मुक्तदा अल-सदर सद्दाम हुसैन सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद काफी प्रसिद्ध हुए थे।
बगदाद, अगस्त 30: इराक के प्रभावशाली शिया धर्मगुरु मुक्तदा अल-सदर के राजनीति छोड़ने के ऐलान करने के बाद इराक खूनी संघर्ष में घिर गया है। मौलवी मुक्तदा अल-सदर ने सोमवार को घोषणा की है, कि वो इराक की राजनीति से सन्या ले रहे हैं, जिसके बाद उनके सैकड़ों नाराज अनुयायियों ने सरकारी दफ्तरों पर धावा बोल दिया और सुरक्षा बलों के साथ झड़पें शुरू हो गईं, जिसमें अब तक कम से कम 20 प्रदर्शनकारी मारे गए हैं। मौलवी मुक्तादा अल-सदर के वफादार प्रदर्शनकारियों ने सरकारी महल के बाहर सीमेंट की बोरियों के बने बैरिकेट्स गिरा दिए, वहीं प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति भवन में भी घुस गये और जमकर हंगामा किया है। आईये जानते हैं, कि इराक में हिंसा के पीछे की वजह क्या है और शिया धर्मगुरु मुक्तदा अल-सदर कौन हैं, जिनके इशारे पर खूनी संघर्ष शुरू हो चुका है।

इराक में क्यों हो रहा है प्रदर्शन?
इराक में स्थिति पिछले बुधवार से ही उस वक्त खराब होने लगी थी, जब इराकी संसद में सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने ईरान विरोधी नारे लगाए। ये प्रदर्शन इराक के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोहम्मद अल-सुदानी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी की घोषणा के खिलाफ था, जिसे समन्वय फ्रेमवर्क ब्लॉक, ईरान समर्थित शिया पार्टियों और उनके सहयोगियों के नेतृत्व वाले गठबंधन द्वारा चुना गया था। इराक की राजधानी बगदाद में संसद को घेरने वाले ज्यादातर प्रदर्शनकारी प्रभावशाली मौलवी मुक्तदा अल-सदर के अनुयायी थे। अल-सदर का दावा है कि, वो पूर्व प्रधानमंत्री नूरी अल-मलिकी की उस योजना के खिलाफ लड़ रहे हैं, जिसके तहत वो इराक सरकार में उच्च पदों पर ईरान समर्थित नेताओं की बहाली की योजना बना रहे हैं। इराक में मौजूदा प्रदर्शन के पीछे की सबसे बड़ी वजह यही है और सबसे खास बात ये है, कि खुद मौलाना मुक्तदा अल-सदर, जिनके इशारे पर ये हिंसक प्रदर्शन शुरू हुआ है, वो शिया मुस्लिम है और ईरान भी शिया मुस्लिम बाहुल्य देश है। तो,सदरवादी आंदोलन के संस्थापक और वर्तमान इराकी राजनीतिक व्यवस्था में काफी लोकप्रिया हो चुके मौलाना मुक्तदा अल-सदर कौन हैं?

मुक्तदा अल-सदर और सदरवादी आंदोलन
मौलाना मुक्तदा अल-सदर एक इराकी शिया विद्वान होने के साथ साथ मिलिशिया नेता भी हैं, जो देश में सबसे शक्तिशाली राजनीतिक गुट के संस्थापक मुक्तदा अल-सदर सद्दाम हुसैन सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद काफी प्रसिद्ध हुए थे। हाल की घटना में जब उनके समर्थकों ने पिछले दिनों इराकी संसद को घेर लिया था, तब उन्होंने ट्विटर पर एक बयान जारी करते हुए कहा था, कि उनका संदेश सरकार तक पहुंच चुका है, लिहाजा अब वो अपने घरों को लौट जाएं। जिसके बाद प्रदर्शनकारी सुरक्षा बलों की मदद से संसद भवन से बाहर निकलने लगे। अपने बड़े जमीनी अनुयायियों को संगठित करने और नियंत्रित करने की उनकी क्षमता उन्हें अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर एक मजबूत बढ़त हासिल करने में मुक्तदा अल-सदर को महारत हासिल हो चुकी है।

अमेरिका से संबंध होने के आरोप
इससे पहले साल 2016 में भी अल सदर के अनुयायियों ने संसद के ग्रीन ज़ोन पर धावा बोल दिया था और राजनीतिक सुधार की मांग करते हुए देश के संसद भवन में प्रवेश कर गये थे। दरअसल, इराक में ईरान अपना प्रभुत्व जमाना चाहता है और अमेरिका को चिंता है, कि ईरान का प्रभुत्व स्थापित होने के बाद इराक के सुन्नी समुदाय अलग थलग हो सकते हैं और इनके बीच अल सदर के राजनीतिक प्रभुत्व का लगातार विस्तार हो रहा है और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है, कि अल-सदर अभी अमेरिका के लिए इराक में सत्ता में रहने के लिए एकमात्र व्यवहार्य विकल्प की तरह दिखते हैं, जो कभी सद्दाम हुसैन के पतन के बाद अमेरिका के कट्टर दुश्मनों में से एक थे। ये दुश्मनी किस हद तक थी, कि इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं, कि गार्डियन अखबार ने अमेरिकी सेना के लेफ्टिनेंट जनरल रिकार्डो सांचेज़ के हवाले से कहा था, कि "अमेरिकी सेना का मिशन मुक्तदा अल-सदर को मारना या पकड़ना है।" सदरिस्ट और संबद्ध मिलिशिया (महदी सेना) ने 2003 में इराक पर अमेरिकी आक्रमण के बाद अमेरिकी सैनिकों के खिलाफ प्रतिरोध शुरू किया। अल-सदर के तहत इन मिलिशिया को अब "शांति कंपनियां" कहा जाता है।

अल-सदर के बढ़ते प्रभाव का असर
हालांकि, अल-सदर का बढ़ता प्रभाव अमेरिका और ईरान दोनों के लिए समस्याएं पैदा कर सकता है। उन्होंने इराक मे अभी भी बचे बाकी अमेरिकी सैनिकों को देश से बाहर निकालने की मांग की है और ईरानी धर्मतंत्र से कहा है, कि वह "अपने देश को अपने कब्जे में बाहर नहीं जाने देंगे"। सदरवादी आंदोलन, जो इस समय इराक में सबसे मजबूत हो चुका है, उसकी स्थापना अल-सदर ने की थी। मूल रूप से इसे एक राष्ट्रवादी आंदोलन कहा जाता है, और इस आंदोलन को देश भर में शिया समुदाय के गरीब लोगों से समर्थन प्राप्त करता है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एक रिपोर्ट में दावा किया है, कि पिछले दो सालों में सदरिस्ट मूवमेंट के सदस्यों ने आंतरिक, रक्षा और संचार मंत्रालयों में वरिष्ठ पदों पर काम किया है। एक दर्जन से अधिक सरकारी अधिकारियों और सांसदों के अनुसार, उन्होंने राज्य के तेल, बिजली और परिवहन निकायों, राज्य के स्वामित्व वाले बैंकों और यहां तक कि इराक के केंद्रीय बैंक में भी अपनी पसंद के अधिकारियों को नियुक्त किया है।

इराक में राजनीतिक उथल-पुथल
इराक में 10 महीने पहले चुनाल हुए थे, लेकिन उसके बाद भी देश में नई सरकार का गठन नहीं हो पाया है और देश पर अमेरिकी हमले के बाद ये पहला मौका है, जब इतने लंबे अर्से तक देश की राजनीतिक व्यवस्था ऐसी है। इराकी राजनीति के केंद्र में गतिरोध काफी हद तक अभिजात वर्ग के व्यक्तिगत प्रतिशोध से प्रेरित है। वहीं, अब देश की संसद में जिस तरह से खून-खराबा हुआ है, वो अल-सदर के विरोधियों के लिए एक साफ संदेश है, कि नई सरकार बनाने की कोशिश करते समय उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। ये लड़ाई, मुख्य रूप से शिया नेताओं अल-सदर और अल-मलिकी के बीच उनके अपने अपने राष्ट्रवादी एजेंडे के कारण है। अल-सदर, इराक पर ईरानियों के अधिकार को चुनौती देते हैं, जबकि पूर्व प्रधानमंत्री अल-मलिकी ईरान समर्थक माने जाते हैं।

इराक में चुनावी परिणाम कैसा रहा?
इराक के शिया समाज में भारी धार्मिक प्रभाव होने के कारण अल-सदर के गठबंधन ने पिछले साल अक्टूबर में हुए संसदीय चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतीं थीं, लेकिन राजनीतिक दल राष्ट्रपति चुनने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत तक पहुंचने में विफल रही थी। नई सरकार बनाने की बातचीत के बाद, अल-सदर ने संसद से अपना गुट वापस ले लिया और घोषणा की थी, कि वह आगे की वार्ता से बाहर निकल रहे हैं। वार्ता छोड़ने के बाद से बगदाद में सड़क पर भारी विरोध प्रदर्शन हो रहा है, जिसमें अब तक 20 लोग मारे जा चुके हैं। वहीं, दूसरी ओर, अल-मलिकी, जो अल-सदर के कट्टर प्रतिद्वंद्वी हैं, वो इस वक्त समन्वय फ्रेमवर्क गठबंधन के प्रमुख हैं, वो शिया ईरान समर्थित पार्टियों के नेतृत्व वाला समूह है। लेकिन, जब अल-सदर इस बातचीत से निकल गये और उनके सांसदों ने इस्तीफा दे दिया, तो अल-मलिकी ने उनके इस्तीफा देने वाले सांसदों इराकी संसद से बदल दिया। हालांकि, ये कानूनी तौर पर सही है, लेकिन इराकी राजनीति पर इसका काफी उत्तेजक प्रभाव पड़ा।

प्रधानमंत्री के उम्मीदवार पर भी संग्राम
वहीं, समन्वय फ्रेमवर्क गठबंधन के प्रमुख अल-मलिकी ने देश के पूर्व श्रम मंत्री मोहम्मद अल-सुदानी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया है, जो ईरान के काफी करीबी और वफादार हैं और मुक्तदा अल-सदर का मानना हैस कि अगर मोहम्मद अल-सुदानी प्रधानमंत्री बनते हैं, तो वो सिर्फ कठपुतली होंगे और सरकार पर असली नियंत्रण अल-मलिकी का ही होगा। वहीं, देश के प्रधानमंत्री रह चुके अल-मलिकी अपने लिए एक वफादार प्रीमियर चाहते थे, लेकिन, उनकी एक ऑडियो रिकॉर्डिंग लीक हो गई थी, जिसमें उन्हें अल-सदर और यहां तक कि अपने शिया सहयोगियों को कोसते और उनकी आलोचना करते हुए सुना गया था, जिसने पहले से ही गंभीर राजनीतिक माहौल को और भड़का दिया है। फिलहाल, न तो अल-सदर और न ही अल-मलिकी गुट राजनीतिक प्रक्रिया से अलग हटने का जोखिम उठा सकते हैं, क्योंकि दोनों के पास खोने के लिए बहुत कुछ है। दोनों प्रतिद्वंद्वियों के पास इराक के संस्थानों में सिविल सेवक स्थापित हैं, जो निर्णय लेने या किसी निर्णय को रोकने की स्थिति में अपनी भूमिका अदा कर सकते हैं।

क्या है ईरान की भूमिका
इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान, इराक के साथ 1,599 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है और इराक के लगातार युद्धग्रस्त रहने से ईरान को काफी फायदा हुआ है। खासकर सद्दाम हुसैन के पतन के बाद ईरान ने भारी संख्या में इराकी मिलिशिया को ट्रेनिंग की है और अमेरिका के खिलाफ ऑपरेशन चलाने में भी ईरान को काफी मदद मिली है, जिसके परिणामस्वरूप अभी भी देश के शीर्ष शासक अभिजात वर्ग के शिया मुस्लिम हैं, जो आपस में सत्ता के लिए लड़ रहे हैं। ईरान वर्तमान में लेबनान की तरह परदे के पीछे रहकर काम करने की कोशिश कर रहा है, ताकि एक अलग अलग धड़ों में बंटे शिया मुस्लिम अभिजात वर्ग को एक साथ जोड़ा जा सके। अल-सुदानी का नामांकन गठबंधन में शिया पार्टियों को एक साथ लाने के ईरानी प्रयासों का प्रमाण है। हालांकि, हाल के चुनावों में ईरानी समर्थित पार्टियों की चुनावी विफलता ने एक नाटकीय बदलाव को उजागर किया है।
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