सऊदी अरबः मक्का में हमले की कोशिश, काबा पहले भी रहा है निशाने पर
सऊदी अरब में पिछले शुक्रवार को मक्का में एक इमाम पर हमले की कोशिश हुई, जिसकी सऊदी अधिकारी जाँच कर रहे हैं.
सऊदी मीडिया में इस घटना के बारे में बताया गया है कि शुक्रवार को मक्का में जुमे की नमाज़ के दिन वहाँ बैठा एक शख़्स अचानक उस आसन या मंच की ओर दौड़ा जहाँ से इमाम बोल रहे थे.
इस घटना की तस्वीरें टीवी पर लाइव प्रसारित हुईं, जिसमें दिखता है कि वहाँ मौजूद सुरक्षाकर्मी फ़ौरन मक्का में पहनी जानेवाली पवित्र पोशा पहने उस शख़्स को पकड़कर नीचे गिरा देते हैं.
अख़बार अरब न्यूज़ ने ख़बर दी है कि शुरुआती जाँच में पता चला है कि हमलावर सऊदी नागरिक है, जो ख़ुद के 'इमाम महदी' होने का दावा करता है.
गल्फ़ न्यूज़ का कहना है कि अधिकारियों ने उसकी मानसिक स्थिति का पता लगाने के लिए उसकी मेडिकल जाँच की है.
इमाम महदी
इस्लाम में इमाम महदी की अवधारणा मुख्य तौर पर शिया संप्रदाय का एक अहम हिस्सा है, लेकिन कई सुन्नी मुसलमान भी इसमें यक़ीन रखते हैं.
शिया मानते हैं कि उनके पहले इमाम हज़रत अली हैं और अंतिम यानी बारहवें इमाम ज़माना यानी इमाम महदी हैं.
अरबी शब्द में महदी का मतलब होता है - वो जिसे सही समझाया गया है.
इमाम महदी में आस्था रखने वाले मानते हैं कि क़यामत या दुनिया ख़त्म होने के समय इमाम महदी आएँगे और इंसाफ़ और अमन फैलाएँगे.
उन्हें मोहम्मद भी कहा जाएगा और वो उनकी बेटी फ़ातिमा की ओर से उनके वंशज होंगे.
पिछली कई सदियों में कई लोगों ने ख़ुद को महदी घोषित करते हुए दावा किया कि वो मुस्लिम जगत को नई ज़िंदगी देने आए हैं, लेकिन सुन्नी संप्रदाय के ज़्यादातर लोगों ने उन्हें स्वीकार नहीं किया.
हालाँकि, कई रुढ़िवादी सुन्नी मुसलमान महदी की अवधारणा पर ये कहते हुए सवाल उठाते हैं कि इसका पवित्र क़ुरान और सुन्ना में कोई ज़िक्र नहीं है.
मक्का में पहले भी हुई हैं ऐसी घटनाएँ
मक्का में हमलों की घटनाएँ होती रही हैं. इस साल अप्रैल में भी काबा परिसर से छुरा लेकर गए एक व्यक्ति को गिरफ़्तार करने की ख़बर आई थी.
अख़बार गल्फ़ न्यूज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार तब मक्का क्षेत्र के प्रवक्ता ने बताया कि संदिग्ध हमलावर मस्जिद के पहले तल पर चरमपंथी गुटों के समर्थन में नारे लगा रहा था, जिसके बाद उसे गिरफ़्तार कर लिया गया.
इस घटना का एक वीडियो भी तब सामने आया था, जिसमें पवित्र पोशाक और मास्क लगाया हुआ एक व्यक्ति हाथ में छुरा उठाकर कुछ बोलता हुआ चलता दिखाई देता है और उसके आस-पास के लोग उसे देखते हैं, फिर सुरक्षाकर्मी वहाँ आ जाते हैं.
2017 के जून में भी काबा पर हमले की कोशिश की एक ख़बर आई थी. तब सऊदी अरब ने कहा था कि मक्का में काबा की पवित्र मस्जिद को निशाना बनाने की एक चरमपंथी योजना को नाकाम कर दिया गया है.
सऊदी गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने तब बताया था कि सुरक्षा बलों ने एक आत्मघाती हमलावर को उस वक़्त घेर लिया, जब वह एक रिहाइशी इमारत में था, जिसके बाद उसने ख़ुद को उड़ा लिया.
इमारत ढहने से कुछ पुलिसकर्मियों समेत 11 लोग घायल हो गए. पाँच अन्य संदिग्ध चरमपंथियों को हिरासत में लिया गया था.
मक्का पर अब तक का सबसे बड़ा हमला
हाल के इतिहास में मक्का पर हमले की सबसे गंभीर घटना 42 साल पहले घटी थी. तब ख़ुद को महदी बताने वाले एक शख़्स के समर्थकों ने क़ाबे की मस्जिद को अपने क़ब्ज़े में ले लिया था.
ये संकट 15 दिन चला और इस दौरान सैकड़ों लोगों को बंधक बना लिया गया, ज़बरदस्त हिंसा हुई जिसमें सैकड़ों लोगों की जान चली गई.
ये घटना 1979 की है. तब 20 नवंबर को मक्का में देश-विदेश से आए हज़ारों हज यात्री शाम की नमाज़ का इंतज़ार कर रहे थे.
जब नमाज़ ख़त्म होने को आई तो सफ़ेद रंग के कपड़े पहने लगभग 200 लोगों ने ऑटोमैटिक हथियार निकाल लिए. कुछ ने इमाम को घेर लिया और जैसे ही नमाज़ ख़त्म हुई, उन्होंने मस्जिद के माइक को अपने क़ब्ज़े में ले कहा कि अब महदी आ रहे हैं.
इस हथियार बंद अति कट्टरपंथी सुन्नी मुस्लिम सलाफ़ी गुट की अगुआई बद्दू मूल के युवा सऊदी प्रचारक जुहेमान अल-ओतायबी कर रहे थे.
थोड़ी देर बाद उनके ही साले मोहम्मद अब्दुल्ला अल-क़हतानी आगे आए और कहा गया कि यही इमाम महदी हैं.
https://www.youtube.com/watch?v=zYoMZ5lZdrA
इसके बाद सऊदी प्रशासन ने मस्जिद को फिर से अपने नियंत्रण में लेने के लिए हज़ारों सैनिक और विशेष बलों को मक्का रवाना किया.
सऊदी अरब के शाही परिवार ने धार्मिक नेताओं से मस्जिद के अंदर बल प्रयोग करने की इजाज़त मांगी.
अगले कई दिनों में वहाँ ज़बरदस्त लड़ाई हुई, जिसमें मस्जिद का बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया.
मस्जिद पर इस क़ब्ज़े को ख़त्म करने में मदद के लिए पाकिस्तान ने भी कमांडो की एक टीम सऊदी अरब भेजी थी.
कुछ फ्रेंच कमांडो भी गुप्त अभियान के तहत सऊदी अरब आए ताकि वे सऊदी सुरक्षाबलों को सलाह दे सकें और उपकरणों वगैरह के ज़रिए उनकी मदद कर सकें.
संकट 20 नवंबर से चार दिसंबर 1979 तक चला. कई लड़ाके मारे गए, कइयों ने आत्मसमर्पण कर दिया.
लड़ाई में ख़ुद को इमाम महदी बताने वाले अल-क़हतानी की भी मौत हो गई.
63 लोगों को सऊदी अरब ने फांसी दे दी, जिनमें जुहेमान अल-ओतायबी भी शामिल थे. बाक़ियों को जेल में डाल दिया गया.
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