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चीन का 'गला घोंटने' वाले मलक्का में 8 पनडुब्बियों से शक्ति प्रदर्शन, सबमरीन शक्ति में भारत के पास कितना दम?

Indian Submarine Surfaces Near Malacca Strait: मलक्का स्ट्रेट हिंद महासागर के व्यापारिक रास्ते में वो चेकप्वाइंट है, जिसे अगर ब्लॉक कर दिया जाए, तो चीन की अर्थव्यवस्था एक हफ्ते के अंदर घुटने पर आ जाएगी और मलक्का स्ट्रेट भारत के प्रभाव वाले क्षेत्र में हैं, जहां के काफी करीब वाले हिस्से में इस हफ्ते भारतीय नौसेना ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया है।

भारतीय नौसेना की आठ पनडुब्बियां पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र में एक साथ ऑपरेट की गई हैं, जो पिछले 30 सालों में भारत की तरफ से किया गया पहला शक्ति प्रदर्शन था, जिसमें इंडियन नेवी की स्कॉर्पीन पनडुब्बियों में से एक, अंडमान निकोबार द्वीप समूह की तरफ रवाना हुई, जहां से मलक्का स्ट्रेट सीधे निशाने पर है।

Indian Submarine Surfaces Near Malacca Strait

मलक्का स्ट्रेट में शक्ति प्रदर्शन के मायने

इंडियन नेवी की पनडुब्बी शाखा की ये ड्रिल भारत की महत्वाकांक्षा के साथ साथ भारत की क्षमता का प्रदर्शन करने के लिए था, क्योंकि हिंद महासागर में चीन लगातार अपनी जासूसी जहाजों को भेज रहा है।

पनडुब्बियों के बारे में एक पुरानी कहावत है, कि "समुद्र में दो प्रकार के जहाज होते हैं, एक पनडुब्बियां और दूसरा लक्ष्य।"

इस कहावत का मतलब ये है, समुद्र में पनडुब्बियां ही किसी देश की सबसे बड़ी ताकत होती है।

लेकिन, क्या भारत की पनडुब्बी ताकत, चीन के पनडुब्बी ताकत का मुकाबला करने में सक्षम है। ये सवाल इसलिए, क्योंकि चीन के पास 76 पनडुब्बी प्लेटफॉर्म हैं, जिनमें 8 SSBN (बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी), 13 SSN (परमाणु-संचालित हमला पनडुब्बी), और 55 SSK (डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां) शामिल हैं।

पिछले हफ्ते के अंत में भारत की कलवरी क्लास (स्कॉर्पीन) पनडुब्बी अपनी उद्घाटन यात्रा के लिए पूर्वी हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के अंतिम बेस आईएनएस बाज पर पहुंची। हालांकि, यह कलवरी श्रेणी की पनडुब्बियों के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, लेकिन इसे भारतीय नौसेना की उस क्षेत्र में पहुंच के रूप में पेश करना एक सही आइडिया नहीं माना जा रहा है, क्योंकि चीनी पनडुब्बियां अक्सर हिंद महासागर क्षेत्र में घुसपैठ करती रहती हैं।

हिंद महासागर में चीनी पनडुब्बियां

नवंबर 2023 में चीन की नौसेना की टाइप-093 सॉन्ग श्रेणी की डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी ने पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र में पाकिस्तान नौसेना के साथ संयुक्त समुद्री गश्त में भाग लिया था।

जबकि, 24 मार्च को भारतीय नौसेना ने घोषणा की, कि कलवरी श्रेणी की पनडुब्बी ने निकोबार द्वीप समूह में भारत के सबसे दक्षिणी बंदरगाह कैंपबेल खाड़ी का दौरा किया। यह बंदरगाह मलक्का जलडमरूमध्य के पास है, जो हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ने वाला समुद्री मार्ग है। यह संकरी गली, चीन के लिए आर्थिक और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण है।

कैंपबेल बे द्वीप इंडोनेशिया से सिर्फ 145 किलोमीटर उत्तर में है और ग्रेट निकोबार और इंडोनेशियाई द्वीप सुमात्रा के बीच 'छह-डिग्री शिपिंग चैनल' को नियंत्रित कर सकता है।

भारत की पूर्वी नौसेना कमान ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर कहा, कि "यह इस क्लास की पनडुब्बी द्वारा इस रणनीतिक बंदरगाह की पहली यात्रा है, जो मुख्य भूमि से दूर भारतीय नौसेना की पहुंच को बढ़ाती है, जिससे योजनाकारों को हमारे हित के क्षेत्रों और उससे आगे तेजी से स्टील्थ पनडुब्बियों को तैनात करने में महत्वपूर्ण पहुंच और ऑपरेशनल लचीलेपन की अनुमति मिलती है।"

इंडियन नेवी की पोस्ट ने यह स्पष्ट कर दिया, कि यह इस पनडुब्बी क्लास की पहली पनडुब्बी है।

भारत अपनी बोइंग पी-8आई जैसे समुद्री सर्विलांस विमानों को संचालित करने में मदद करने के लिए आईएनएस बाज पर रनवे का विस्तार कर रहा है। जबकि, 2022 में भारतीय वायु सेना (IAF) का C-130 J स्पेशल ऑपरेशनल फाइटर जेट भी INS बाज पर उतरा था।

यूरो टाइम्स की एक रिपोर्ट में एक भारतीय अधिकारी ने पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर कहा, कि "चीनी पहले से ही अपनी डीजल पनडुब्बियों को हिंद महासागर क्षेत्र में भेज रहे हैं। और यह पहली बार नहीं है, जब कोई भारतीय पनडुब्बी अंडमान निकोबार पहुंची है। कैंपबेल खाड़ी भारत की मुख्य भूमि से 1500 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, लगभग वही दूरी जिस पर भारतीय नौसेना ने पैराड्रॉप के जरिए समुद्री कमांडो को शामिल करते हुए अदन की खाड़ी के पास समुद्री डकैती विरोधी अभियान चलाया है।"

भारत की पनडुब्बी पावर में कितना दम?

25 मार्च को भारतीय नौसेना ने पश्चिमी समुद्र तट पर अपनी पनडुब्बियों की एक आश्चर्यजनक तस्वीरें जारी कीं। अरब सागर में हाल ही में खत्म हुए इस अभ्यास में आठ पनडुब्बियों ने एक साथ अपनी ताकत का प्रदर्शन किया था।

इससे पहले, भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल हरि कुमार ने खुलासा किया था, कि भारतीय नौसेना ने हिंद महासागर क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों में ऑपरेशन के लिए एक साथ 11 पारंपरिक पनडुब्बियों को तैनात किया है।

उन्होंने कहा, कि "ऑपरेशन संकल्प ने छोटे और तेज ऑपरेशन के मिथक को तोड़ दिया है और महासागरों में सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए निरंतर संचालन की आवश्यकता पर बल दिया है। ऑपरेशन की गति काफी तेज है, और हमारे पास 11 पनडुब्बियां और 30 युद्धपोत हैं, जो हमारे हित के सभी क्षेत्रों की कवरेज सुनिश्चित करने के लिए समुद्र के विभिन्न हिस्सों में काम कर रहे हैं।"

यह अभियान, पिछले दो दशकों में भारतीय नौसेना के लिए ऑपरेशनल पनडुब्बियों की सबसे ज्यादा संख्या है। लेकिन, भारत के पास पनडुब्बियों की संख्या काफी कम हो गई है, जबकि भारत को किसी भी वक्त 24 पनडुब्बियों की जरूरत है, लेकिन इंडियन नेवी के पाश सिर्फ 16 पनडुब्बियां ही हैं। जिनमें से हाल ही में बनाए गये 6 पनडुब्बियों को अलग कर दिया जाए, तो बाकी की 10 पनडुब्बियां 30 साल से ज्यादा पुरानी हैं और रिटायर्ड होने के करीब पहुंच गई हैं।

दूसरी तरफ, चीन लगातार इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में हावी होने के साथ साथ हिंद महासागर में कंट्रोल बनाने के लिए तेजी से काम कर रहा है। भारत के पास सिर्फ 16 पारंपरिक और एक एसएसबीएन (आईएनएस अरिहंत) है। रूस से लीज पर एक एसएसएन अकुला क्लास की पनडुब्बी अभी मिलना बाकी है।

भारतीय पारंपरिक पनडुब्बी बेड़े में पांच स्कॉर्पीन क्लास (फ्रेंच), चार एचडीडब्ल्यू (जर्मन), और सात किलो-क्लास (रूसी) शामिल हैं। एक अतिरिक्त स्कॉर्पीन क्लास अभी भी चालू किया जाना बाकी है।

भारतीय नौसेना के लिए दिक्कतें क्या हैं?

भारतीय नौसेना के लिए इन पनडुब्बियों को ऑपरेट करना एक प्रमुख मुद्दा है। एक सामान्य नौसैनिक नियम यह है, कि संचालन करने वाले प्रत्येक जहाज के लिए, दो पनडुब्बियों की जरूरत होती है।

शांतिकाल के दौरान बेड़े का केवल एक-तिहाई हिस्सा तैनात किए जाने की उम्मीद है। युद्धकाल में ज्यादा जहाजों को तैनात किया जाता है। चीनी नौसेना न केवल अपने बेड़े में पनडुब्बियों को शामिल करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है, बल्कि भारत के पड़ोसी पाकिस्तान को भी अत्याधुनिक तकनीक से लैस कर रही है।

भारतीय नौसेना फिलहाल Air-independent propulsion (AIP) टेक्नोलॉजी हासिल करने की दिशा में काम कर रही है और इस क्षमता को हासिल करने के बाद भारतीय नौसेना का बेड़ा पाकिस्तान की तुलना में काफी बेहतर स्थिति में आ जाएगा। पाकिस्तान के तीनों फ्रेंच अगोस्टा-90बी (पीएनएस खालिद, साद और हमजा) AIP टेक्नोलॉजी से लैस हैं। पाकिस्तान को चीन के साथ 5 अरबअमेरिकी डॉलर के समझौते के तहत 2023 के अंत तक आठ 39 ए युआन-क्लास AIP-संचालित पनडुब्बियां मिलने की भी उम्मीद है।

जबकि, अगले साल तक भारतीय नौसेना के बेड़े में 17 पारंपरिक पनडुब्बियां होंगी। हालाकि, पुरानी किलो-श्रेणी की पनडुब्बी का उपलब्धता अनुपात कम है।

दस रूसी पनडुब्बियों को 1980 के दशक में कमीशन किया गया था, और वे पुरानी हो रही हैं। उनमें से एक को पहले ही सेवामुक्त कर दिया गया है, दूसरे को नवीनीकृत किया गया और म्यांमार को उपहार में दिया गया, और वहीं, तीसरी पनडुब्बी साल 2013 में हादसे का शिकार हो गई थी।

भारतीय नौसेना ने प्रोजेक्ट-75 I के तहत 6 और पारंपरिक डीजल पनडुब्बियों के निर्माण की योजना बनाई है। लेकिन, अभी तक इस प्रोजेक्ट के लिए किसी भी देश के साथ कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं हो पाया है। पिछले साल फ्रांसीसी कंपनी इस प्रोजेक्ट में बजट की कमी का हवाला देकर डील से हट गई थी। ऐसे में अगर डील होता भी है, फिर भी प्रोजेक्ट 75I के तहत बनाई जाने वाली पनडुब्बियों के नौसेना बेड़े में शामिल होने में कम से कम 10 साल और लगेंगे।

परेशानी बढ़ाने वाली बात यह है, कि भारत दुनिया का एकमात्र पनडुब्बी संचालित करने वाला देश बना हुआ है, जिसने पांच दशकों से ज्यादा समय से पनडुब्बियों को अपने बेड़े में शामिल करने के बाद भी खुद अपनी पनडुब्बियों का डिजाइन और निर्माण नहीं किया है।

प्रोजेक्ट-75 I के तहत पहली शर्त मोदी सरकार ने इसकी टेक्नोलॉजी हासिल करने की रखी है और किसी पनडुब्बी कंपनी से करार नहीं होने के पीछे एक बड़ी वजह ये भी है।

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