अंटार्कटिका में भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजी पौधों की नई प्रजाति, इस भगवती का दिया नाम

भारतीय वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिक में पौधों की नई प्रजाति की खोज की है, जिसका नाम भारतीय की एक भगवती के नाम पर रखा गया है।

नई दिल्ली, जुलाई 10: करीब पांच सालों के अथक मेहनत के बाद भारतीय वैज्ञानिकों ने आखिरकार अंटार्कटिका में पौधों की नई प्रजाति की खोज करने में सफलता हासिल कर ही ली है। दिलचस्प बात यह है, कि यह पहली बार है जब भारत ने चार दशक पहले अंटार्कटिका में अपने पहले रिसर्च सेंटर की स्थापना के बाद पौधों की किसी नई प्रजाति की खोज करने में कामयाबी हासिल की है और इस पौधे को भारतीय वैज्ञानिकों ने देवी मां का नाम दिया है।

पौधे को दिया 'भगवती' का नाम

पौधे को दिया 'भगवती' का नाम

भारतीय समाज की परंपरा है, कि जब किसी बच्चे का जन्म होता है, तो हम उसका नाम किसी देवी-देवता के नाम पर रखना चाहते हैं और अंटार्कटिका में खोजी गई पौधों की इस नई प्रजाति का नाम भी भगवती के नाम पर रखा गया है। भारतीय वैज्ञानिकों ने पौधों की इस नई प्रजाति का नाम 'भारती' रखा है। जबकि, पौधों की इस नई प्रजाति का वैज्ञानिक नाम ब्रायम भारतीएंसिस नाम दिया गया है। 'भारती' ज्ञान की हिंदू देवी सरस्वती का भी एक नाम है। 2016-17 के बीच, पंजाब सेंट्रल यूनिवर्सिटी के ध्रुवीय बायोलॉजिस्ट इंडियन-आर्कटिक मिशन पर गए थे और तभी एसोसिएट प्रोफेसर और वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रमुख फेलिक्स बास्ट ने लार्समैन हिल्स में भारती स्टेशन के पास चट्टानों पर एक नई पौधों की प्रजाति को देखा।

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    नई प्रजाति पर रिसर्च

    नई प्रजाति पर रिसर्च

    रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि ये पौधा मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में उगती है, जहां पेंगुइन बड़ी संख्या में प्रजनन करते हैं। इसके पीछे पेंगुइन का मल त्यागना माना गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पेंगुइन के मल में नाइट्रोजन होता है, जिसकी वजह से इन पौधों को विकसित होने में मदद मिलती है। छह महीने के लंबे अभियान का हिस्सा रहे जीवविज्ञानियों में से एक प्रोफेसर फेलिक्स बास्ट ने बीबीसी को बताया कि, "मूल रूप से यहां के पौधे पेंगुइन के मल त्यागने पर जीवित रहते हैं।" फेलिक्स ने कुछ हरे पौधों के नमूने एकत्र किए और उन्हें रिसर्च के लिए यूनिवर्सिटी ले आए। जहां उन्होंने पीएचडी छात्र वहीद-उल-रहमान और असिस्टेंट कृति गुप्ता के साथ टैक्सोनॉमिक असेसमेंट किया। कृति बठिंडा के डीएवी कॉलेज में वनस्पति विज्ञान विभाग की प्रमुख हैं। इन पौधों को जिंदा रहने के लिए नाइट्रोजन, पोटेशियम, फास्फोरस, धूप और पानी की आवश्यकता होती है।

    वैज्ञानिकों के लिए रहस्य

    वैज्ञानिकों के लिए रहस्य

    वैज्ञानिकों के लिए ये पौधा एक रहस्य से कम नहीं है। ऐसा इसलिए, क्योंकि अभी भी पता नहीं चल पाया है कि अंटार्कटिका में जब 6 महीने तक लंबी सर्दी चलती है, तो ये पौधा कैसे जिंदा रहता है। जब सूरज की रोशनी नहीं होती है और तापमान -76 सेल्सियस जितना कम हो जाता है, उस वक्त ये पौधे कैसे जिंदा रहते हैं? वैज्ञानिक अंदाजा लगा रहे हैं कि हो सकता है कि ये पौधे सर्दी के मौसम में सूख जाते हों और इसके बीज बर्फ में दबकर सुसुप्तावस्था में चले जाते हों, लेकिन जब फिर से सूरज की रोशनी मिलने लगती हो, तो इनमें फिर से अंकुरन होना शुरू हो जाता हो।

    40 साल से चल रहा था मिशन

    40 साल से चल रहा था मिशन

    भारत के अंटार्कटिक मिशन के दौरान करीब 40 सालों के बाद पहली बार किसी नये पौधे की खोज की गई है। आपको बता दें कि भारत का अंटार्कटिक मिशन 1981 में शुरू हुआ था। भारत का पहला अंटार्कटिक स्टेशन दक्षिण गंगोत्री 1984 में स्थापित किया गया था, लेकिन बर्फ के नीचे दबने के बाद 1990 में उसे बंद कर दिया गया था। मैत्री स्टेशन 1989 में और भारती 2012 में शुरू किया गया था। दोनों साल भर चालू रहते हैं। भारतीय वैज्ञानिकों की पौधे की नई प्रजाति की खोज को लेकर रिसर्च, जर्नल ऑफ एशिया-पैसिफिक बायोडायवर्सिटी में प्रकाशित हुआ है।

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