Explainer: जासूसी में भारत पर चीन की 64:1 की बढ़त.. नौसेना में पहला रिसर्च जहाज शामिल, क्यों पीछे रहे हम?
India Vs China in Indian Ocean: हिंद महासागर में जासूसी के मामले में चीन, भारत से कोसों आगे है और ताजा रिपोर्ट से पता चलता है, कि चीन के पास 64 जासूसी जहाजों का बेड़ा है, जबकि इंडियन नेवी ने पहली बार चीन जैसा कदम उठाया है।
भारतीय नौसेना ने 3 फरवरी को चार स्वदेश निर्मित सर्वेक्षण जहाजों में से पहला, आईएनएस संध्याक को अपने बेड़े में शामिल किया है, जिसे समुद्री सर्वे करने के लिए डिजाइन किया गया है। लेकिन, चीन के साथ 64:1 की तुलना साफ तौर पर इंडियन ओसियन में चीन और भारत के अप्रोच को दर्शाता है।

चीन के सर्वेक्षण जहाज बिना रोक टोक हिंद महासागर में अलग अलग जगहों पर जासूसी करते रहे हैं, जो बताता है, कि हिंद महासागर में चीन किस हद तक आक्रामक है। चीनी जासूसी पनडुब्बियों और जहाजों को हिंद महासागर में बेरोक-टोक एंट्री मिलती है और वो समद्र में आक्रामक रूप से मानचित्रण कर रहे हैं, जबकि भारतीय नौसेना के पास हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण करने के लिए एकमात्र जहाज आईएनएस संध्याक को अब जाकर बेड़े में शामिल किया गया है।
भारत के आईएनएस संध्याक को जानिए
आईएनएस संध्याक को 80 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री के साथ भारत में ही बनाया गया है और ये उन चार जहाजों में शामिल है, जिन्हें समुद्री सर्वेक्षण के लिए डिजाइन किया गया है।
आईएनएस संध्याक, भारतीय नौसेना के हाइड्रोग्राफिक पोत का पुनर्जन्म है, जिसे चार दशकों की सेवा के बाद 2021 में डी-कमीशन कर दिया गया था। तब से, आईएनएस संध्याक के शामिल होने तक, भारतीय नौसेना के पास एक भी रिसर्च जहाज नहीं था।
सर्वेक्षण जहाजों को, समुद्र में ध्वनि तरंगें भेजकर पानी के नीचे के नमूने जुटने के लिए डिजाइन किया जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन के डेटाबेस के मुताबिक, साल 1990 के बाद से चीन के पास 64 रजिस्टर्ड रिसर्च जहाज हैं, जबकि अमेरिका के पास 44 और जापान के पास 23 सर्वेक्षण जहाज हैं।
इन आंकड़ों से समझा जा सकता है, कि चीन जासूसी पर कितना ज्यादा जोर दे रहा है और अलग अलग समुद्री डेटा हासिल करने के लिए चीन की आक्रामकता किस हद तक की है।

रिसर्च जहाज क्यों होते हैं जरूरी?
रिसर्च जहाजों के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता है। पुराने आईएनएस संध्याक ने 1987 में श्रीलंका में ऑपरेशन पवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ऑपरेशन पवन, श्रीलंका के उत्तरी शहर जाफना पर तमिल टाइगर्स के खिलाफ नियंत्रण पाने के लिए भारतीय शांति सेना (आईपीकेएफ) के मिशन का कोड नाम था।
भारतीय नौसेना के एक विशेषज्ञ ने कहा, "चीन आक्रामक रूप से समुद्री खनन सिद्धांत का पालन कर रहा है और भारत से बहुत आगे है। इसके अलावा, दक्षिण चीन सागर में, एयूवी जैसे उप-सतह जहाजों के संचालन के लिए चीन के लिए अंडरवाटर प्रोफाइलिंग बहुत फायदेमंद है। दूसरी ओर, भारत को जिम्मेदारी के क्षेत्र की सटीक रीडिंग के लिए ज्यादा से ज्यादा सर्वेक्षण जहाजों की आवश्यकता होती है, और सर्वेक्षण संसाधन आमतौर पर अत्यधिक विस्तारित होते हैं।"
तटीय युद्ध के मामले में, क्षेत्रीय जल के बारे में सटीक जानकारी होना अत्यधिक जरूरी होता है, खासकर समुद्री नियंत्रण हासिल करने के लिए। खुले महासागरों में खतरे की पहचान और जवाबी उपायों के लिए युद्ध रणनीति, भीड़भाड़ वाले द्वीपसमूह वाले समुद्री क्षेत्र से अलग होती है।
इसके अलावा, युद्ध के दौरान सैनिकों के लिए सप्लाई चेन बनाए रखने के लिए नौसेना एस्कॉर्ट्स को यह सुनिश्चित करना होता है, कि सैनिकों के लिए सामान और रसद आपूर्ति, बिना रुके या प्रतिबंधित जल में बिना कहीं टकराए, अपने गंतव्य स्थान तक पहुंचे।
लिहाजा, समुद्र के अंदर सटीक नक्शा बनाना अत्यधिक जरूरी होता है, खासकर स्पेशल इकोनॉमिक जोन के अंदर।
इसके अलावा, समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (एलओएससी) के तहत विवाद निपटान के लिए भी सटीक सर्वेक्षण रिपोर्ट की आवश्यकता होती है, ताकि संप्रभु अधिकारों और समुद्री स्थानों के कथित उल्लंघन को स्थापित किया जा सके। हाइड्रोग्राफ़िकल सर्वेक्षण समुद्र तल की खदानों का पता लगाने या पानी में गैर-विस्फोटित विस्फोटकों का पता लगाने में भी सहायता कर सकते हैं।
ऑपरेशन पवन के दौरान, आईएनएस संध्यांक ने जमीन और समुद्र की मैपिंग करते हुए सुरक्षित नेविगेशन सुनिश्चित किया था, ताकि सैन्य अभियान के समय महत्वपूर्ण हाइड्रोग्राफिक डेटा प्रदान करके शांति सेना की मदद की जाए।
जहाज के हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षणों ने उपयुक्त लैंडिंग स्थलों की पहचान करने और पानी के नीचे बाधाओं का आकलन करने में मदद की।

INS संध्याक की क्षमता क्या है?
आईएनएस संध्याक को मुख्य रूप से बंदरगाहों, नेविगेशनल चैनलों और स्पेशल इकोनॉमिक जोन्स (ईईजेड) के हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण के लिए डिज़ाइन किया गया है। वे सैन्य उद्देश्यों के लिए समुद्र संबंधी डेटा भी एकत्र करते हैं। जहाज का डिस्पेलसमेंट करीब 3,800 टन है। यह 110 मीटर लंबा है, 16 समुद्री मील की स्पीड से चल सकता है और इसकी सीमा 6,500 समुद्री मील है।
यह जहाज हाइड्रोग्राफिक सेंसर और अत्याधुनिक उपकरणों से सुसज्जित है, जिसमें एक ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल (एयूवी), रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल (आरओवी), और मल्टीबीम इकोसाउंडर (एमबीईएस) शामिल हैं।
हालांकि, यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट में भारत के एक रिटायर्ड नौसेना अधिकारी कहते हैं, कि "रिसर्च जहांजों ती संख्या की कमी, नौसेना की क्षमता में बाधा नहीं बनेगी, क्योंकि नौसेना का देहरादून में एक समर्पित नौसेना हाइड्रोग्राफिक कार्यालय है। अब तक भारत मित्र देशों के लिए हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण करता रहा है।"
उन्होंने कहा, कि "लेकिन जैसे-जैसे भारत महासागरों के पार पहुंचता है, हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण करने की उसकी जरूरतें बढ़ना तय है।''
कई अन्य देशों की तरह भारतीय नौसेना भी अब नेविगेशन के लिए केवल भारतीय चार्ट का उपयोग करती है।
अधिकारियों के मुताबिक, ये रिसर्च जहाज समुद्र से जो जानकारियां हासिल करते हैं, वो अमूल्य होती हैं। और हिंद महासागर में चीनी जहाज और जासूसी पनडुब्बियां जो जानकारियां हासिल कर रही हैं, वो मलक्का स्ट्रेट के उथले पानी और पूर्वी इंडियन ओसियन रीजन के माध्यम से नेविगेट करने के लिए किया जा सकता है।
आपको बता दें, कि मलक्का स्ट्रेट चीन के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है और भारत इस स्थान पर रणनीतिक बढ़त रखता है और अंडमान निकोबार से मलक्का स्ट्रेट को संघर्ष के समय ब्लॉक कर एक हफ्ते में चीन को घुटने पर ला सकता है और चीन इसी को काउंटर करने के लिए सालों से हाथ-पैर मार रहा है। और इसी कड़ी में चीनी जासूसी जहाज बार बार हिंद महासागर पहुंचते रहते हैं।
चीनी बेड़े में क्यों हैं 64 जासूसी जहाज?
भारत ने वैज्ञानिक परीक्षण करने के बहाने हिंद महासागर में चीनी रिसर्च जहाजों की बार बार आवाजाही पर गहरी चिंता जताई है। पिछले साल नई दिल्ली ने श्रीलंका के साथ कड़ा विरोध दर्ज कराया और द्वीप राष्ट्र ने भारत की संवेदनशीलता को समझते हुए 1 जनवरी से अपने बंदरगाहों में चीनी जहाजों के रुकने पर एक साल की रोक लगा दी है।
चीन 60 से ज्यादा सर्वेक्षण जहाजों का बेड़ा क्यों रखता है? रिटायर्ड भारतीय नौसेना अधिकारी ने कहा, कि "हो सकता है, कि वे सिर्फ हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण से आगे बढ़कर कुछ और कर रहे हों और हिंद महासागर के उत्तरी मार्ग सहित बहुत बड़े क्षेत्र को कवर कर रहे हों।"
हिंद महासागर क्षेत्र में आने वाले चीनी समुद्र विज्ञान सर्वेक्षण जहाजों में से आखिरी शि यान 6 था, जो सितंबर 2023 में तीन महीने के लिए श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह में डॉक किया था।
चीनी शि यान 6 जहाज को 60 लोगों की टीम संचालित करती है और यह समुद्र विज्ञान, समुद्री भूविज्ञान और समुद्री पारिस्थितिकी प्रयोगों को अंजाम दे सकता है। समुद्र तल पर डेटा इकट्ठा करने और पानी के नीचे के वातावरण को समझने के लिए हाइड्रोलॉजिकल डेटा रिकॉर्ड करने के अलावा, जहाज़ समुद्र के भीतर केबलों के बारे में जानकारी इकट्ठा कर सकते हैं, और मिसाइल फायरिंग के टेलीमेट्री डेटा रिकॉर्ड कर सकते हैं।
इसलिए, चीन का यह दावा कि हिंद महासागर में उसके प्रयास आक्रामक नहीं हैं, भारत उसे रिजेक्ट करता है। चीनी नौसेना इस क्षेत्र में जिन क्षमताओं का उपयोग कर रही है, उससे उसे इस क्षेत्र में सैन्य मिशन शुरू करने में मदद मिलेगी।

समुद्री सर्वे का सेना में कैसे हो सकता है इस्तेमाल?
समुद्र के अंदर से जो डेटा जुटाई जाती है और जो मैपिंग की जाती है, उसका इस्तेमाल नागरिक और मिलिट्री मकसद, दोनों के लिए किया जाता है। जबकि भूकंपीय डेटा, भूवैज्ञानिक स्थितियों का आकलन करने में महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे समुद्र के अंदर छिपी हुई पनडुब्बियों के बारे में भी पता चल जाता है।
यानि, अगर इंडियन नेवी की कोई पनडुब्बी हिंद महासागर में छिपी हुई है, चीन अपने रिसर्च जहाज से ना सिर्फ उसका पता लगा सकता है, बल्कि उसके पूरे रूट को लेकर रिसर्च कर सकता है। इसके अलावा, रिसर्च जहाज नौसैनिक टोही टीम, विदेशी सैन्य सुविधाओं और आसपास के क्षेत्र में संचालित जहाजों पर खुफिया जानकारी भी इकट्ठा कर सकते हैं।
इसके अलावा, समुद्र के अंदर किस मौसम में किस तरह के जहाज या पनडुब्बियों की तैनाती करना सही होगा, इसके बारे में भी पता लगाया जा सकता है और समुद्री मौसम के अनुकूल पनडुब्बियों को संचालन के लिए भेजा जा सकता है। वहीं, समुद्र की अधिकतम गहराई, समुद्र के अंदर भविष्य में कैसा मौसम रहने वाला है, उसकी जानकारियां भी हासिल की जाती है और इसका इस्तेमाल सैन्य तौर पर होता है।
रिपोर्टों से संकेत मिलता है, कि चीन खास तौर पर नाइनटीईस्ट रिज में काफी दिलचस्पी रखता है, जो हिंद महासागर के तल पर एक मध्य महासागरीय पर्वतमाला है। यह कटक हिंद महासागर को पश्चिमी और पूर्वी हिंद महासागर में विभाजित करती है।
नौसेना विशेषज्ञों का तर्क है, कि यह सीमा पनडुब्बी संचालन के लिए महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र में डेटा हासिल करने से चीनी पनडुब्बियों को हिंद महासागर में अपनी गतिविधि बढ़ाने में मदद मिलेगी।
'फिश-हुक' सेंसर का पता लगाना चाहता है चीन
एक्सपर्ट्स का मानना है, कि चीन का मकसद इंडोनेशिया और भारतीय द्वीपसमूह अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के पास अमेरिकी नौसेना के 'फिश-हुक' सेंसर नेटवर्क का पता लगाना है। जब कोई चीनी पनडुब्बी हिंद महासागर में प्रवेश करती है, तो इस नेटवर्क को अलार्म बजाने के लिए डिजाइन किया गया है।
यह क्षेत्र सुंडा और लोम्बोक जलडमरूमध्य जैसे हिंद महासागर के महत्वपूर्ण चोकपॉइंट के पास है, जिसका उपयोग चीनी उप-सतह युद्धपोतों द्वारा हिंद महासागर में प्रवेश करने के लिए किया जाता है। इसका उथला पानी, पनडुब्बियों का पता लगाने में आसान बनाता है। इसलिए, इस क्षेत्र को लेकर चीन काफी सतर्क रहता है।
चीन से साल 2022 में युआन वांग 5 जासूसी जहाज को श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पर भेजा था, जो एक स्पेस रिसर्च ट्रैकिंग जहाज है, जिसका उपयोग उपग्रह, रॉकेट और अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल टेस्ट की निगरानी के लिए किया जाता है। पेंटागन का मानना है, कि युआन वांग जहाजों का संचालन, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के रणनीतिक सहायता बल द्वारा किया जाता है।
ऐसी रिपोर्ट है, कि युआन वांग 5 जासूसी जहाज आने के बाद भारत को अपने एक बैलिस्टिक मिसाइल की लॉन्चिंग टालनी पड़ी थी।
अगस्त 2019 में, एक चीनी सर्वेक्षण जहाज 'शी यान 1' बंगाल की खाड़ी में भारतीय द्वीप पोर्ट ब्लेयर से 460 किमी पूर्व में आया, लेकिन इंडियन आर्मी के युद्धपोतों ने उस जहाज को खदेड़ दिया था।
दिसंबर 2019 में चीन का एक और सर्वेक्षण जहाज, जियांग यांग होंग 06 ने कथित तौर पर हिंद महासागर में कम से कम 12 ग्लाइडर पानी के नीचे तैनात किए थे। इन लंबे समय तक चलने वाले मानव रहित पानी के नीचे के वाहनों (यूयूवी) ने धाराओं और पानी के गुणों पर डेटा इकट्ठा करने के लिए समुद्र की सतह से 6.5 किमी की गहराई पर लगभग 12,000 किमी की यात्रा की थी।












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