अंडरवाटर 'फाइटर जेट्स', समुद्र के अंदर हाथ में होगी सीक्रेट शक्ति , जानें क्या है इंडियन नेवी का प्लान?
Indian Navy: भारतीय नौसेना, समुद्र के अंदर अपनी लड़ाकू क्षमता को और भी ज्यादा धारदार बनाने के लिए बेहद महत्वाकांक्षी परियोजना के सहारे आगे बढ़ना चाहती है और समुद्र में अपनी शक्ति का लोहा, दुनिया को मनवाने के लिए कम से कम 6 परमाणु ईंधन से संचालित हमलावर पनडुब्बियों को अपने बेड़े में शामिल करना चाह रही है।
हालांकि, इंडियन नेवी की ये महत्वाकांक्षा पिछले चार सालों से भारत सरकार के पास लटकी पड़ी है। चूंकि रूसी अकुला श्रेणी की परमाणु-संचालित पनडुब्बी का लीज 2021 में ही समाप्त हो चुका है, इसलिए भारतीय नौसेना के बेड़े में कोई एसएसएन नहीं बचा है। रिपोर्टें हैं, कि भारत छह एसएसएन पनडुब्बियों के निर्माण की परियोजना पर सहयोग के लिए फ्रांस के साथ बातचीत कर रहा है।

भारत बनाम चीन: पनडुब्बी क्षमता की तुलना
चीन के पनडुब्बी बेड़े में 70 से ज्यादा पनडुब्बियां शामिल हैं, जिनमें सात परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां (एसएसबीएन), 12 परमाणु हमला पनडुब्बियां (एसएसएन), और 50 से ज्यादा डीजल हमलावर पनडुब्बियां (एसएसके) शामिल हैं।
इसके विपरीत, भारत के ज्यादातर पारंपरिक पनडुब्बी बेड़े को 1980 के दशक में हासिल कर लिया गया था और भारत की पनडुब्बियां पिछले काफी सालों से सर्विस में हैं।
चीन की नौसेना, जिसे PLAN कहा जाता है, उसकी बढ़ती शक्ति से मुकाबला करने के लिए भारत के पास परमाणु ऊर्जा से ऑपरेट होने वाली पनडुब्बियों का होना काफी ज्यादा जरूरी है। और इसी के लिए, भारत में 65 हजार टन के स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर (IAC)-2 परियोजना को स्थगित कर, उसकी जगह पर स्वदेशी nuclear attack submarines (SSN) बनाने का फैसला लिया, जो पानी के अंदर मार करने वाली लड़ाकू विमाने हैं।
"एसएसएन गेम चेंजर हैं। वे गुप्त और असीमित सहनशक्ति वाले शक्तिशाली मंच हैं। वे अनिश्चित काल तक पानी के भीतर रह सकते हैं और बंदरगाह से दूर लंबे समय तक और तेज़ गति से काम कर सकते हैं। वे वाहक युद्ध समूह के हिस्से के रूप में आगे बढ़ सकते हैं। लंबी दूरी की मिसाइलों से लैस, वे समुद्री युद्ध का आकार बदल सकते हैं, "भारतीय नौसेना के पूर्व पनडुब्बी कमोडोर अनिल जय सिंह ने यूरेशियन टाइम्स को बताया।
एसएसएन में धीमी और छोटी टांगों वाली डीजल पनडुब्बी की तुलना में काफी ज्यादा क्षेत्र को कवर करने की क्षमता होती है और इसके पास काफी रफ्तार के साथ साथ परिस्थितियों को बर्दाश्त करने की क्षमता भी काफी तेज गोती है।
यह डीजल इंजन-सह-बैटरी से चलने वाली पारंपरिक नावों की तुलना में कई दिनों और कई महीनों कर पानी में रखा जा सकता है। एक बार जब यह गहरे पानी में चला जाता है, तो एसएसएन का पता लगाना न केवल मुश्किल होता है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर, ज्यादातर अन्य पनडुब्बियों या युद्धपोतों से आगे निकलने की क्षमता भी इसके पास मौजूद होती है, जो क्षमता डीजल पनडुब्बियो में नहीं होती है।
एसएसएन की क्लासिक भूमिकाएं, वाहक युद्ध समूहों की रक्षा करना और दुश्मन एसएसबीएन का शिकार करना है, लेकिन यह जहाज-रोधी, भूमि-हमले और निगरानी भूमिकाओं के लिए भी एक आदर्श मंच है।
भारत ने साल 2019 में रूस से एक और परमाणु-संचालित अकुला क्लास हमले की पनडुब्बी के लिए 3 अरब अमेरिकी डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच लीज की शुरुआत 2026 की अपनी समय सीमा से चूक जाने की संभावना है। स्वदेशी एसएसएन के लिए, यदि सरकार की मंजूरी कल आएगी, तो भी पहली खेप के युद्ध योग्य बनने में 10-15 साल और लगेंगे।
तो, वास्तविक रूप से कहें तो, पहला घरेलू एसएसएन 2040 तक भारतीय नौसेना में प्रवेश करेगा। भारतीय नौसेना को छह एसएसएन के लिए सैद्धांतिक मंजूरी मिल गई है, और यह काम शुरू करने के लिए सुरक्षा पर कैबिनेट समिति (सीसीएस) से मंजूरी का इंतजार कर रही है।
परमाणु पनडुब्बियों का कब तक हो पाएगा निर्माण?
परमाणु पनडुब्बियों के निर्माण में सबसे बड़ी परेशानी टेक्नोलॉजीकल सपोर्ट नहीं मिलना है। पिछले महीने जुलाई में, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) ने 11 प्रकार की नियंत्रण प्रणालियां और उनके मल्टीफ़ंक्शन कंसोल विकसित करने के लिए, इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडियन लिमिटेड (ECIL) के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।
इससे एसएसएन पर काम के कुशल निष्पादन में मदद मिलेगी और कुल मिलाकर, स्थापित परमाणु युद्ध सिद्धांत का समर्थन करने के लिए भारत के परमाणु त्रय की स्थापना होगी।
भारत के पास वर्तमान में दो परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां (एसएसबीएन) हैं। हालांकि, भारत के परमाणु डेटरेंट फोर्स के एक उपकरण के रूप में, उन्हें सामरिक मिशनों के लिए तैनात नहीं किया जा सकता है।
यहीं पर SSN फाइटर जेट्स नौसेनाओं की मदद करने और दुश्मन का मुकाबला करने के लिए काम में आते हैं। वे अपनी इच्छानुसार लक्ष्यों का पीछा और उनका सफाया कर सकते हैं, और उनकी लगभग अजेयता उन्हें देश के शस्त्रागार में सबसे शक्तिशाली हथियार बनाती है।
यह इस बात से स्पष्ट है कि पिछले दशक में चीन के साथ कई सीमा गतिरोधों में से एक के दौरान भारत ने हिंद महासागर के पूर्वी हिस्से में अपनी एकमात्र रूसी अकूला श्रेणी की पनडुब्बी, जिसे आईएनएस चक्र नाम दिया गया था, तैनात की थी।
भारत का संभावित परमाणु शार्क बेड़ा
एसएसएन एक "महंगा" प्रस्ताव है। भारतीय नौसेना ने लीज पर ली गई रूसी अकुला श्रेणी की पनडुब्बियों के माध्यम से परमाणु-संचालित पनडुब्बियों के रखरखाव और संचालन में अमूल्य अनुभव प्राप्त किया है।
भारत ने रूस की मदद से परमाणु ऊर्जा से चलने वाली बैलिस्टिक अटैक पनडुब्बियों (एसएसबीएन) - आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघाट को डिजाइन और विकसित किया है। इससे उन्हें पनडुब्बी में फिट करने के लिए परमाणु रिएक्टर को छोटा करने की विशेषज्ञता मिल गई है। वनहीं अरिहंत BARC द्वारा निर्मित 83 मेगावाट रिएक्टर द्वारा संचालित है।
प्रस्तावित एसएसएन को बड़ा और अधिक शक्तिशाली बनाने की योजना है। एसएसएन में 190 मेगावाट का रिएक्टर होगा जो इसे शक्ति प्रदान करेगा।
भारत छह परमाणु ऊर्जा चालित पनडुब्बियों के निर्माण के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम पर सहयोग के लिए फ्रांस के साथ बातचीत कर रहा है। फ्रांस का नौसेना समूह फ्रांसीसी नौसेना के लिए बाराकुडा श्रेणी के एसएसएन का निर्माण कर रहा है।
अधिकारी ने कहा, "परमाणु-संचालित पनडुब्बियों को विकसित करने के लिए AUKUS के तहत अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया का पहले ही सहयोग हो चुका है, लिहाजा फ्रांस इस समय भारत के लिए एकमात्र विकल्प है।" प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया पेरिस यात्रा के दौरान भारत और फ्रांस ने छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (एसएमआर) के क्षेत्र में सहयोग करने का फैसला किया है।












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