गैस टर्बाइन, फाइटर जेट, वारशिप, प्रधानमंत्री मोदी यूक्रेन के राष्ट्रपति के साथ क्या-क्या डिफेंस समझौते करेंगे?
India-Ukraine Defence Pact: भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की के न्योते पर 23 अगस्त 2024 को यूक्रेन का दौरा करने वाले हैं। अपनी यात्रा के दौरान, पीएम मोदी और जेलेंस्की रक्षा, आर्थिक संबंधों और साइंस एंड टेक्नोलॉजी सहित सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों पर चर्चा करने की उम्मीद कर रहे हैं।
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में सोवियत संघ से जो रक्षा उपकरण खरीदे हैं, उनमें से बहुत से रक्षा उपकरण यूक्रेन में निर्मित किए गए हैं। इनमें से कई उपकरण ऐसे हैं, जिनका अभी भी यूक्रेन में निर्माण होता है, जिनमें भारतीय नौसेना के युद्धपोतों के लिए गैस टर्बाइन इंजन और भारतीय वायुसेना द्वारा संचालित एएन-32 विमान शामिल हैं।

लिहाजा, भारत के लिए यूक्रेन के साथ घनिष्ठ रक्षा संबंध बनाए रखना बहुत जरूरी है।
ब्लूमबर्ग ने सूत्रों के हवाले से जानकारी दी है, कि यूक्रेन की सरकारी स्वामित्व वाली जोर्या-मैशप्रोक्ट युद्धपोतों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले गैस टर्बाइनों के संयुक्त निर्माण के लिए भारतीय निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ बातचीत कर रही है। दोनों देश भारत में विमान और एयरो-इंजन के निर्माण पर भी चर्चा कर रहे हैं।
भारत में यूक्रेनी गैस टर्बाइनों के संयुक्त निर्माण से भारत अपने एएन-72 विमानों के बेड़े को उड़ान भरने और भारतीय नौसेना प्रोजेक्ट 11356 फ्रिगेटों को क्रूज करवाने में कामयाब हो पाएगा।

IAF An-32 Fleet
भारतीय वायुसेना 105 An-32 मीडियम टैक्टिकल मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट का बेड़ा संचालित करती है। इस विमान में एलएसी (55 डिग्री सेल्सियस और 4,500 मीटर ऊंचाई तक) की गर्म और उच्च स्थितियों में भी उड़ान भरने की शानदार क्षमता है। भारतीय वायुसेना हमारी उत्तरी सीमा पर तैनात सेना के जवानों के हवाई रखरखाव, एयर कार्गो ड्रॉप-ऑफ, पैरा ड्रॉप-ऑफ और मेडवैक के लिए एएन-32 पर काफी हद तक निर्भर है।
जून 2009 में भारत ने यूक्रेन के स्पेट्सटेक्नोएक्सपोर्ट (STE) के साथ 105 AN-32 विमानों के अपने बेड़े को अपग्रेड करने, उनकी लाइफलाइन को 40 साल तक बढ़ाने और उनके एवियोनिक्स में सुधार करने के लिए 400 मिलियन डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।
उस समझौते के तहत, यूक्रेन में डिजाइनर-प्रमाणित संयंत्रों में 40 एएन-32 को अपग्रेड किया जाना था, जिसमें 10 विमानों को सालाना अपग्रेड किया जाना था। यूक्रेन को कानपुर में भारतीय वायुसेना के नंबर 1 बेस रिपेयर डिपो (बीआरडी) में बाकी 64 एएन-32 को सामग्री और टीओटी का उपयोग करके अपग्रेड करना था।
हालांकि, इस परियोजना में देरी हुई है। भारतीय वायुसेना अब 2028-2029 तक घरेलू स्तर पर और ज्यादा अपग्रेड पूरा करने की योजना बना रही है। इन विमानों में यूक्रेन और रूस में निर्मित इवचेंको प्रोग्रेस AI-20DM इंजन लगे हैं।

फ्रिगेट निर्माण में चुनौतियां
गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) में एडमिरल ग्रिगोरोविच क्लास के दो फ्रिगेट के निर्माण में भारत को यूक्रेनी गैस टर्बाइनों पर निर्भरता के कारण संभावित बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। 2018 में, भारत ने इन फ्रिगेट के लिए रूस से कॉन्ट्रैक्ट किया था, जिसमें यूक्रेन ने तकनीकी सहायता और गैस टर्बाइन प्रदान किए थे। हालांकि, 2014 में जब रूस ने आक्रमण करके यूक्रेन से क्रीमिया छीन लिया, को यूक्रेन ने रूस को इंजन की आपूर्ति बंद कर दी।
इन इंजनों के निर्माण के लिए जिम्मेदार ज़ोर्या-मशप्रोएक्ट उद्यम पर 2022 में रूस ने मिसाइल हमला किया था। लिहाजा, अब रूस-यूक्रेन संघर्ष समाप्त होने तक उत्पादन फिर से शुरू होने की संभावना नहीं है, जिससे भारत की नौसैनिक क्षमताएं प्रभावित होंगी। यह स्थिति ऑपरेशनल तत्परता बनाए रखने के लिए वैकल्पिक समाधानों की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
भारत-यूक्रेन साथ मिलकर बनाएंगे गैस टर्बाइन इंजन?
अब भारत और यूक्रेन स्थानीय स्तर पर गैस टर्बाइन बनाने के लिए संयुक्त उद्यम की संभावना तलाश रहे हैं। भारत का बड़ा बाजार इस तरह के उद्यम को उचित ठहराता है, जो यूक्रेन की निर्यात की मांग को भी पूरा कर सकता है। साथ ही, इस पहल से भारतीय नौसेना की जोर्या-मैशप्रोएक्ट टर्बाइन पर निर्भरता भी कम होगी और भारतीय युद्धपोतों और विमानों के लिए स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता सुनिश्चित होगी।
यूक्रेन में लंबे समय से चल रहा संघर्ष भारत की जहाज निर्माण तकनीक और परिचालन क्षमताओं के लिए जोखिम पैदा कर रहा है। स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करने से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है और महत्वपूर्ण रक्षा प्रौद्योगिकियों में आत्मनिर्भरता बढ़ाई जा सकती है।
प्रधानमंत्री मोदी की आगामी यात्रा डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भारत-यूक्रेनी सहयोग के रणनीतिक महत्व को उजागर करती है। इन संबंधों को मजबूत करने से वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत के रक्षा बुनियादी ढांचे को काफी मजबूती मिल सकती है।












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