Pseudo सैटेलाइट बनाने में भारत को मिली कामयाबी, चीन की हर चाल पर होगी नजर, जानें क्यों कहा जाता है स्कैनर?
India's 1st Pseudo Satellite: भारतीय कंपनी वेदा एयरोनॉटिक्स ने हाई-एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म सिस्टम (HAPS), जिसे छद्म सैटेलाइट कहा जाता है, उसके निर्माण के लिए संयुक्त अरब अमीरात की कंपनी मीरा एयरोस्पेस के साथ साझेदारी कर ली है।
भारतीय वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (Council of Scientific and Industrial Research- CSIR)- राष्ट्रीय वांतरिक्ष प्रयोगशाला (National Aerospace Laboratories- NAL) ने हाल ही में हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट (HAPS) पर सफल परीक्षण किया था और अब भारत, अपने सर्विलांस को मजबूत करने के लिए HAPS प्लेटफॉर्म के निर्माण में मजबूती से कदम बढ़ा रहा है।

जबकि, एक भारतीय कंपनी पहले से ही छद्म सैटेलाइट प्लेटफॉर्म विकसित करने पर काम कर रही है, लेकिन यूएई की कंपनी के साथ पार्टनरशिप होने के बाद इस काम में काफी तेजी आ जाएगी। इस सैटेलाइट की सबसे खास बात यह है, कि ये एक तरह का स्कैनर है, यानि जासूसी के काम के लिए ये परफेक्ट साबित होगा।
हाई-एल्टीट्यूड प्लेटफ़ॉर्म सिस्टम (HAPS) क्या है?
HAPS, भारत के ड्रोन विंगमैन प्रोजेक्ट के लिए काफी महत्वपूर्ण है और माना जा रहा है, कि इस साल के आखिर तक ये उड़ान भरने में कामयाब हो जाएगा। HAPS एक दूर से संचालित विमान की तरह है, लेकिन यह 65,000 फीट की ऊंचाई पर पृथ्वी के समताप मंडल में उड़ता है।
यह पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले उपग्रहों और वायुमंडल के भीतर उड़ने वाले ड्रोन के बीच अंतर को पाटता है। इसकी समतापमंडलीय पहुंच इसे किसी भी मौसम में ऑपरेट होने की क्षमता देती है और सौर ऊर्जा से संचालित होने की वजह से यह महीनों तक बिना किसी रूकावट के काम कर सकता है।
इस समझौते के तहत यूएई की कंपनी मीरा एयरोस्पेस, VEDA एयरोनॉटिक्स की स्थानीय विकास क्षमताओं का उपयोग करके अपनी अत्याधुनिक ApusNeo HAPS टेक्नोलॉजी भारत में लाएगी। और रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिस प्रोडक्ट का निर्माण होगा, वो डिफेंस सेक्टर के साथ साथ प्राइवेट सेक्टर में भी इस्तेमाल हो सकेगा।
इस समझौते के तहत, कंपनियां 2024 की पहली छमाही के भीतर भारतीय बाजार के लिए विशिष्ट HAPS प्लेटफॉर्म विकसित करेंगी। दोनों कंपनियां पहले ही भारतीय हवाई क्षेत्र में टेस्ट फ्लाइट्स ऑपरेट कर चुकी हैं जहां HAPS यूनिट ने भारतीय समताप मंडल में उड़ान भरी थी। और यह परीक्षण आज तक किया गया, भारत में एकमात्र ऐसी उड़ान है।

भारत की रणनीतिक संपत्ति होगी HAPS
रिपोर्ट के मुताबिक, VEDA एयरोनॉटिक्स भारतीय वायु सेना (IAF) की तरफ से बनाए जा रहे मेक-1 प्रोजेक्ट के तहत HAPS विकसित करेगा। परियोजना के तहत HAPS न्यूनतम 35 किलोग्राम पेलोड ले जाने और 18,000 मीटर की ऊंचाई पर न्यूनतम 30-45 दिनों तक ऑपरेशन बनाए रखने में सक्षम होगा।
HAPS एक रणनीतिक संपत्ति है, जो एक उपग्रह और एक हवाई जहाज के बीच का मिश्रण है, जिसमें एक उपग्रह की सहनशक्ति और लगातार समतापमंडलीय उपस्थिति के लिए एक विमान जैसी चपलता होती है।
लगातार सलाह मिलते रहे हैं, कि भारत को अपनी सर्विलांस ताकत को बढ़ाना चाहिए और खुफिया निगरानी तंत्र को और मजबूत करना चाहिए और इस काम में HAPS काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और इसीलिए इसे स्कैनर सैटेलाइट भी कहा जाता है।
इस प्लेटफॉर्म को दूर से कंट्रोल किया जा सकता है और वे अपने मॉड्यूलर निर्माण की वजह से कई प्रकार के सेंसर और नेविगेशनल क्षमताओं के साथ पेलोड ले जा सकते हैं।
हिमालयी क्षेत्र में चीन के खिलाफ होगा फायदा
HAPS सैटेलाइट हिमालयी क्षेत्र में चीन के साथ चल रहे विवाद में भारत के लिए काफी ज्यादा उपयोगी साबित होगा और ड्रोन के मुकाबले चीनी क्षेत्र की काफी बेहतर तरीके से स्कैनिंग कर पाएगा। इसके अलावा, ऐसे क्षेत्रों में जहां ड्रोन के पेलोड काम नहीं कर पाते हैं, उन क्षेत्रों के लिए HAPS एक वरदान की तरह साबित होगा।
करीब 65 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरते वक्त HAPS सैटेलाइट के पास निगरानी करने के लिए एक विशालकाय क्षेत्र होगा और चीन क्या कर रहा है, इसकी सटीक जानकारी मिल सकेगी। बताया गया है, कि इस सैटेलाइट से 500 किलोमीटर की क्षेत्र में स्कैनिंग पूरी तरह से हो पाएगी।
वहीं, अगर एक ड्रोन से तुलना करे, तो 25 घंटे तक लगातार उड़ने वाले एक ड्रोन, जो 25 हजार फीट की ऊंचाई तक जा सकते है, उसे इतने बड़े क्षेत्र की स्कैनिंग के लिए 5 हजार बार उड़ान भरने की जरूरत होगी, लेकिन HAPS सैटेलाइट को सिर्फ 250 बार उड़ान भरने की जरूरत होगी।
यूरेशियन टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, VEDA एयरोनॉटिक्स के मैनेजिंग डायरेक्टर दीपेश गुप्ता ने कहा, कि "हमने भारत के लिए स्पेशल वर्जन प्रोडक्ट बनाने की योजना पर काम शुरू की है और इसके जरिए HAPS टेक्नोलॉजी को एडवांस करने की दिशा में भी हम काम करेगे। ताकि आगे जाकर इसके जरिए और ज्यादा पेलोड भेजा जा सके।
सर्विलांस सेक्टर में भारत के मजबूत होते कदम
इसके अलावा एक और भारतीय फर्म, न्यूस्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज प्राइवेट ने भी HAPS टेक्नोलॉजी बनाने की दिशा में मील का पत्थर हासिल किया है और इसने जो HAPS व्हीकल का निर्माण किया है, वो फिलहाल 21 घंटों तक आकाश में रह पाता है। लेकिन, यूएई की कंपनी के साथ जिस भागीदारी पर VEDA एयरोनॉटिक्स काम कर रही है, उसकी क्षमता इससे कहीं ज्यादा होने वाली है।
भविष्य में होने वाली लड़ाईयों में टेक्नोलॉजी का काफी ज्यादा महत्वपूर्ण योगदान होगा और सौर ऊर्जा से काम करने वाली टेक्नोलॉजी इसमें अहम योगदान देगा।
रीपर जैसे हाई-अल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस (HALE) ड्रोन की तुलना में एक 'छद्म उपग्रह' निगरानी की लागत में भारी कटौती करेगा। अभी अमेरिका से जो रीपर ड्रोन भारत खरीद रहा है, उसके ऑपरेशन मे हर घंटे 3500 डॉलर का खर्च आएगा, लेकिन HAPS प्लेटफॉर्म के संचालन का खर्च 500 डॉलर प्रति घंटे से भी कम है।
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