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धर्म में नेतृत्व के लिए सक्रिय हो रही हैं हिंदू महिलाएं

Provided by Deutsche Welle

वॉशिंगटन, 14 दिसंबर। सुषमा द्विवेदी ने शादियों में फेरे और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करवाने के बारे में सोचना शुरू किया तो उन्हें पता था कि पहले उन्हें अपनी दादी से बात करनी पड़ेगी. अपनी दादी के साथ मिलकर उन्होंने सारे मंत्र आदि दोहराये जो विभिन्न अनुष्ठानों में दोहराए जाते हैं. और फिर उनमें से वे मंत्र खोजे जो द्विवेदी की सोच और लक्ष्य से मेल खाते थे. सुषमा द्विवेदी ऐसी पुरोहित बनने जा रही थीं जो किसी भी जाति, लिंग, नस्ल या यौन रुझान से ऊपर उठकर आशीर्वाद दे.

सुषमा द्विवेदी की दादी भी पुरोहित नहीं हैं. भारत और भारत के बाहर भी शादियों या अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में पूजा कराने का काम आमतौर पर पुरुष ही करते आए हैं. लेकिन दादी के पास ज्ञान का भंडार था जिसे वह अपनी पोती के साथ बांट सकती थीं.

सुषमा द्विवेदी अमेरिका की पहली महिला पुजारी हैं जो समलैंगिकों समेत सभी की शादी आदि करवाती हैं. इस पहल के जरिए द्विवेदी हिंदू धर्म में हो रहे बड़े बदलाव का प्रतीक बन गई हैं. धर्म और उसकी परंपराओं का अध्ययन करने वाले कहते हैं कि भारत या विदेशों में भी महिला पुजारी अभी बहुत ज्यादा नहीं हैं लेकिन हिंदू धर्म में महिलाएं बढ़-चढ़कर नेतृत्व की भूमिका में आ रही हैं. ऐसा सामुदायिक गतिविधियों और सांगठनिक भूमिकाओं के अलावा अगली पीढ़ी को ज्ञान के संप्रेषण के जरिए हो रहा है.

ज्ञान बांटने की परंपरा

सुषमा द्विवेदी कहती हैं, "हम दोनों बैठे और सारे ग्रंथों का अध्ययन किया. यही पौराणिक हिंदू व्यवस्था कि आप अपना ज्ञान अगली पीढ़ी को देते हैं." द्विवेदी को हिंदू धर्म का ज्ञान भी अपने दादा-दादी से ही मिला था जो खुद प्रवासी हैं. कनाडा में पली बढ़ी सुषमा के लिए वही हिंदू धर्म का स्रोत थे. उन्होंने मॉन्ट्रियल में हिंदू मंदिर बनवाने में अहम भूमिका निभाई. यह मंदिर द्विवेदी के बचपन का अहम केंद्र रहा.

हिंदू धर्म में बहुत सारे दर्शन और विचार मानने ले लोग हैं. नर और मादा के रूप में यहां दर्जनों देवता हैं जिनके मानने वाले एक दूसरे से एकदम अलग मत के हो सकते हैं. इसीलिए एक हिंदू की परंपराएं और मान्यताएं दूसरे हिंदू से एकदम अलग हो सकती हैं. यहां चर्च के रूप में कोई केंद्रीय मठ नहीं है जो सभी को संचालित करता हो.

इसलिए भारत और आप्रवासी समुदाय में भी हिंदुओं के बीच नेतृत्व की भूमिकाएं बंटी हुई हैं. फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी में धर्म पढ़ाने वालीं प्रोफेसर वसुधा नारायण बताती हैं कि अलग-अलग मंदिरों के बोर्ड अलग-अलग होते हैं.

अलग-अलग भूमिकाएं

प्रोफेसर नारायण कहती हैं, "मैं यह भी कहूंगी कि महिलाएं कई बार अलग-अलग तरीकों से अपने लिए जगह बनाती हैं." मसलन हिंदू टेंपल सोसायटी ऑफ नॉर्थ अमेरिका की अध्यक्ष डॉ. उमा मैसोरकर हैं जो अमेरिका में सबसे पुराने मंदिरों का संचालन करती हैं.

मैसोरकर एक डॉक्टर हैं और 1980 के दशक में वह मंदिर प्रबंधन से जुड़ीं. कई साल से वह इसके प्रबंधन में सक्रिय हैं और अलग-अलग कार्यक्रमों के जरिए समाज को सक्रिय रखती हैं. हालांकि शुरुआत में प्रबंधक बनना उनका लक्ष्य नहीं था. वह बताती हैं, "मैं प्रेजिडेंट बनने के लिए सक्रिय नहीं हुई थी. लेकिन जब हालात ने मजबूर किया तो मैंने चुनौती स्वीकार की."

मैसोरकर मानती हैं कि महिलाओं में ज्ञान को दूसरों तक पहुंचाने की क्षमता होती है, खासकर बच्चों में. और इसी गुण के कारण वह नेतृत्व की भूमिका में आ सकती हैं. वह कहती हैं, "पुरातन समय से कितनी ही महिलाओं ने नेतृत्व किया है. और उनका योगदान एक मिसाल है. ऐसा नहीं है कि महिलाओं को पुजारी ही बनना पड़ेगा. उनमें ज्ञान के प्रसार की काबिलियत होनी चाहिए."

वीके/एए (एपी)

Source: DW

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