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जलवायु परिवर्तन की वजह से सिकुड़ रहा है आज के इंसान का दिमाग! नई रिसर्च में सामने आई ये बात

आज दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के संभावित खतरों को लेकर बहस छिड़ी हुई है। एआई इंसानी दिमाग की ही देन है। लेकिन, दूसरी तरफ एक नई रिसर्च में यह बात सामने आई है कि असल में जिस इंसानी दिमाग ने इस तरह की टेक्नोलॉजी विकसित की है, वह खुद जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की चपेट में आ चुका है।

PsyPost की एक रिपोर्ट के मुताबिक नई रिसर्च से पहले इंसानी मस्तिष्क के सिकुड़ने की वजह मोटापे में वृद्धि को माना जा रहा था। लेकिन, 'ब्रेन, बिहेवियर और इवोल्यूशन' में प्रकाशित एक नए शोधपत्र में जलवायु परिवर्तन को मस्तिष्क के आकार को प्रभावित करने वाला एक संभावित कारक माना गया है।

climate change and shrinking brain size

जलवायु संकट का मस्तिष्क के आकार पर असर-शोध
इस शोध पत्र के अनुसार जलवायु संबंधी संकटों की वजह से मस्तिष्क के विकास पर प्रभाव पड़ने की शुरुआत मोटे तौर पर 15,000 वर्ष पहले ही शुरू हो चुकी थी। यह शोध पत्र को जेफ मॉर्गन स्टिबेल ने 'क्लाइमेट चेंज इंफ्लुएंसेज ब्रेन साइज इन ह्यूमेंस' के नाम से लिखा है।

नैचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के ट्रस्टी हैं शोधकर्ता
स्टिबेल ने कहा है, 'एक कॉग्निटिव साइंटिस्ट के रूप में ये समझना महत्वपूर्ण है कि समय के साथ होमिनिंस में दिमाग कैसे बदल गया है, लेकिन इस विषय पर अभी बहुत कम काम हुआ है।' स्टिबेल नैचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के सदस्य और ट्रस्टी भी हैं।

इंसानी दिमाग पर लंबे वक्त से कर रहे हैं पड़ताल
उनके मुताबिक, 'हमें पता है कि पिछले कुछ लाख वर्षों में विभिन्न प्रजातियों में दिमाग का विकास हुआ है, लेकिन हम मैक्रोइवॉल्यूशनरी ट्रेंड के बारे में बहुत कम जानते हैं। मैंने अपनी पिछली पुस्तक ब्रेकप्वाइंट में मस्तिष्क के आकार में कमी के बारे में लिखा था, इसलिए नई रिसर्च में उसी के कारणों की पड़ताल की गई है।'

298 मानव अवशेषों से लिया गया सैंपल
इस शोध कार्य के लिए 298 मानव अवशेषों को नमूने के तौर पर इस्तेमाल किया गया। इसमें दो तापमान काल (पिछले interglacial काल से पहले और उसके बाद का समय) के आधार पर इनका विश्लेषण किया गया। इन जीवाश्मों को 100-साल, 5000-साल, 10,000-साल और 15,000-साल के समूहों में विभाजित किया गया था।

बढ़ेगा तापमाना तो छोटा होगा दिमाग!
मस्तिष्क के आकार के आंकड़ों को चार क्लाइमेट रिकॉर्ड के साथ तुलना की गई। उनका कहना है कि, 'होलोसीन वार्मिंग काल की वजह से आधुनिक इंसानों के मस्तिष्क के आकार में 10% से ज्यादा की कमी आई है। अगर वैश्विक तापमान में वृद्ध जारी रही, तो इससे इंसानी दिमाग पर विकासवादी दबाव और ज्यादा बढ़ जाएगा।'

नमी और वर्षा का भी पड़ता है असर
इस शोध के अनुसार मोटे तौर पर यह प्रक्रिया जो करीब 15,000 साल पहले शुरू हुई थी, वह अभी भी जारी हो सकती है। शोधकर्ता के अनुसार वातावरण में नमी और वर्षा के स्तर से भी मस्तिष्क के आकार पर प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने कहा, 'यह हैरानी की बात है कि मानव मस्तिष्क के एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंग होने के बावजूद हम उसके बारे में कितना कम जानते हैं।'

मानव के लिए पैदा हो सकता है गंभीर संकट!
अंत में उन्होंने जो कुछ कहा है, वह इससे जुड़ी भविष्य की चिंता की ओर इशारा करता है। उनके मुताबिक, 'आधुनिक मनुष्यों के दिमाग के आकार में थोड़ी सी भी कमी, हमारे शरीर विज्ञान (physiology ) पर इस तरह से प्रभाव डाल सकती है, जिसे अभी पूरी तरह से समझा नहीं गया है।'

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