गायब हो गया ग्लेशियर: इस देश का आखिरी ग्लेशियर भी पिघलकर हुआ खत्म, प्रलय के रास्ते पर कैसे बढ़ी दुनिया?
How Venezuela lost Glacier: इंसानी लालच ने दुनिया को प्रलय के रास्ते पर धकेल दिया है और जिस तरह से प्रकृति का नुकसान किया जा रहा है, वो एक ऐसी तबाही की तरफ ले जा रही है, जो इस धरती से इंसानी वजूद को ही खत्म कर सकता है।
अगर आप अभी भी सोचते हैं, कि जलवायु परिवर्तन कुछ नहीं है, या फिर हमें जलवायु परिवर्तन से क्या मतलब है, तो फिर आपकी ये सोच इंसानों के अस्तित्व के लिए घातक है। जैसे, वेनेजुएला.. इस दुनिया का पहला वो देश बन गया है, जिसने अपने सभी ग्लेशियर खो दिए हैं।

वेनेजुएला, आधुनिक इतिहास में अपने सभी ग्लेशियर खोने वाला संभवतः पहला देश बन गया है और निश्चित तौर पर वो आखिरी देश नहीं है। कई देश वेनेजुएला के रास्ते पर ही हैं और अगले कुछ दशकों में पूरी तरह से अपने ग्लेशियर को खत्म कर लेंगे। वैज्ञानिकों ने कहा है, कि वेनेजुएला का आखिरी बचा ग्लेशियर, हम्बोल्ट ग्लेशियर अब खत्म हो गया है।
वेनेजुएला का आखिरी ग्लेशियर भी खत्म
वेनेजुएला एक समय 6 ग्लेशियरों का घर हुआ करता था, जो एंडीज़ पहाड़ों में समुद्र तल से करीब 5,000 मीटर ऊपर स्थित थे। लेकिन, साल 2011 तक उनमें से पांच ग्लेशियर गायब हो गए।
वैज्ञानिकों को उम्मीद थी, कि हम्बोल्ट ग्लेशियर एक और दशक तक चलेगा। लेकिन ये ग्लेशियर वैज्ञानिकों की उम्मीजद से कहीं ज्यादा रफ्तार से पिघला और 2 हेक्टेयर से भी कम क्षेत्र में सिमट गया, जिससे यह ग्लेशियर से बर्फ के मैदान में तब्दील हो गया है।
2023 के एक स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक, हम्बोल्ट ग्लेशियर की तरह, दुनिया भर के कई अन्य ग्लेशियर भी शोधकर्ताओं के अनुमान से कहीं ज्यादा तेजी से सिकुड़ रहे हैं या फिर गायब हो रहे हैं। वर्तमान में जलवायु परिवर्तन इतनी तेजी के साथ हो रहा है, कि दुनिया में मौजूद दो-तिहाई ग्लेशियरों का अस्तित्व 2100 तक पूरी तरह से खत्म हो जाने का अनुमान लगाया गया है।
आइये जानते हैं, कि ग्लेशियर क्या होते हैं, वे क्यों गायब हो रहे हैं और उनके गायब होने का क्या प्रभाव हो सकता है।
ग्लेशियर क्या होते हैं?
ग्लेशियर मूल रूप से बर्फ के बड़े और मोटे समूह हैं जो सदियों से बर्फ जमा होने के कारण पृथ्वी पर बनते हैं। संयुक्त राज्य भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के मुताबिक, वे आमतौर पर उन क्षेत्रों में मौजूद होते हैं, और बनते हैं जहां औसत वार्षिक तापमान, हिमांक बिंदु के करीब पहुंच जाता है।
अपने विशाल द्रव्यमान और गुरुत्वाकर्षण की वजह से, ग्लेशियर बहुत धीमी नदियों की तरह बहते हैं। हालांकि इस बात पर कोई सार्वभौमिक सहमति नहीं है, कि ग्लेशियर के रूप में योग्य होने के लिए बर्फ का द्रव्यमान कितना बड़ा होना चाहिए, लेकिन यूएसजीएस का कहना है, कि आम तौर पर करीब 10 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले बर्फ के विशालखंड को ग्लेशियर कहा जाता है।
ग्लेशियर क्यों गायब हो रहे हैं?
ग्लेशियरों के गायब होने की वजह बिल्कुल साफ है। इसके पीछे की वजह ग्लोबल वार्मिंग है। जैसे बर्फ का टुकड़ा गर्मी के संपर्क में आने पर पिघल जाता है, वैसे ही ग्लेशियर गर्म तापमान के कारण पिघल रहे हैं। और इन गर्म तापमानों का कारण क्या है? यह ग्रीनहाउस गैसें (जीएचजी) हैं।
18वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति शुरू होने के बाद से, जीवाश्म ईंधन का भयानक तौर पर इस्तेमाल किया गया, जिससे वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन गैस का प्रवाह हुआ। इन गैसों से पृथ्वी और सूरज के बीच मौजूद ओजोन परत का गहरा नुकसान पहुंचा है, जिससे वैश्विक तापमान में वृद्धि हुई है।
हाल के दशकों में, जीएचजी का उत्सर्जन आसमान छू गया है, जिसकी वजह से 1880 के बाद से वैश्विक औसत तापमान में कम से कम 1.1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। तापमान में ये इजाफा, छोटी लग सकती है लेकिन इसके विनाशकारी परिणाम हुए हैं। उदाहरण के लिए, लगातार और तीव्र गर्मी की लहरें, बाढ़, सूखा, समुद्र के जल स्तर में वृद्धि हुई है और ग्लेशियरों का गायब होना शुरू हो गया है।
एंडीज, अर्जेंटीना, बोलीविया, चिली, कोलंबिया, इक्वाडोर, पेरू और वेनेजुएला के कुछ हिस्सों से होकर गुजरने वाली एक पर्वत श्रृंखला में पिछले सात दशकों में 0.10 डिग्री सेल्सियस की उच्च दर से तापमान में वृद्धि देखी गई है। यही एक प्रमुख कारण है, कि वेनेजुएला ने अपने सभी ग्लेशियर खो दिए हैं।
वहीं, हम्बोल्ट ग्लेशियर के मामले में, अल नीनो की वजह से ये काफी तेजी से पिघलता चला गया, जो जुलाई 2023 में विकसित हुआ था। अल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने को कहा जाता है, जिससे महासागर में पानी गर्म होने लगा है।
जलवायु विज्ञानी और मौसम इतिहासकार मैक्सिमिलियानो हेरेरा ने द गार्जियन को बताया, कि "वेनेजुएला के एंडियन क्षेत्र में, 1991-2020 के औसत से ऊपर +3C/+4C तक तापमान में बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो ऐसे उन उष्णकटिबंधीय अक्षांशों के लिए असाधारण है।"

भारत के ग्लेशियर भी हो सकते हैं गायब
भारत पर भी अपने ग्लेशियर को खोने का खतरा मंडरा रहा है। 2023 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदू कुश हिमालय पर्वत श्रृंखला में ग्लेशियर अभूतपूर्व दर से पिघल रहे हैं और यदि गैसों के उत्सर्जन में भारी कमी नहीं की गई, तो इस सदी के खत्म होते होते भारतीय ग्लेशियर 80 प्रतिशत से ज्यादा खत्म हो जाएंगे। यानि, अगले 75 सालों में 80 प्रतिशत भारतीय ग्लेशियर खत्म हो जाएंगे।
ग्लेशियर खत्म होने से क्या होगा?
ग्लेशियर मीठे पानी का एक महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं, खासकर गर्म, शुष्क मौसम के दौरान। उनके गायब होने का मतलब यह होगा, कि किसी को मीठे पानी के लिए पूरी तरह से बारिश पर निर्भर रहना होगा।
ग्लेशियरों से बहने वाला ठंडा पानी नीचे की ओर पानी के तापमान को ठंडा रखता है। यूएसजीएस के मुताबिक, यह क्षेत्र की कई जलीय प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि जीवित रहने के लिए उन्हें ठंडे पानी के तापमान की आवश्यकता होती है। ग्लेशियर के नष्ट होने का सीधा असर ऐसी प्रजातियों पर पड़ता है, जो खाद्य जाल का एक अनिवार्य हिस्सा हैं।
पिघलते ग्लेशियर की वजह से समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी होती है। ग्रीनलैंड और अंटार्कटिक बर्फ की चादरें, इन्हें ग्लेशियर भी माना जाता है - वैश्विक समुद्र स्तर में वृद्धि में सबसे बड़ा योगदानकर्ता हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है, कि वेनेज़ुएला के हम्बोल्ट ग्लेशियर में समुद्र के स्तर को बढ़ाने के लिए पर्याप्त बर्फ नहीं है। लेकिन, अगर बड़े ग्लेशियर पिघलते हैं, तो उससे समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी होती है, जिससे समुद्र की तटीय शहरों पर खतरा मंडरा सकता है।












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