करोड़ों की कमाई, समुद्र में एक्शन ही एक्शन.. ईरानी आतंकियों ने कैसे गुजरात के पोर्ट तक बनाया नेटवर्क?
Pak-Iran terror groups target India's west coast: संयुक्त राज्य अमेरिका की नौसेना ने 11 जनवरी को सोमाली तट के पास अरब सागर में एक छोटी नाव को जब्त किया था, जिसका इस्तेमाल एशियाई मछुआरों और स्थानीय व्यापारियों द्वारा किया जा रहा था।
जांच के दौरान पता चला, कि उस नाव में ईरान में बने एडवांस पारंपरिक हथियारों को ले जाया जा रहा था, जिसमें मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों और जहाज-रोधी क्रूज मिसाइलों के महत्वपूर्ण हिस्से भी शामिल थे। इस ऑपरेशन के दौरान यूएस नेवी ने अपने कमांडो को गंवा दिया, लेकिन नाव से 14 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनके पास से पाकिस्तान पहचान पत्र बरामद किया गया।

समुद्र में कैसे चलता है नेटवर्क?
शुरुआती पूछताछ के दौरान गिरफ्तार किए गये लोगों ने अधिकारियों को बताया, कि वे पाकिस्तान से चलकर आए हैं और वे ईरान के कोणार्क से आ रहे थे। पूछताछ के दौरान उन्होंने आगे बताया, कि वो 5 जनवरी को ईरान के चाबहार बंदरगाह से रवाना हुए थे। संघीय जांच ब्यूरो (एफबीआई) के मुताबिक, नाव पर मिसाइल के जो सामान मिले थे, वो हूती विद्रोहियों को पहुंचाये जा रहे थे और उसे ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की तरफ से भेजा जा रहा था।
इस घटना के दो महीने से भी कम समय में, इसी तरह के एक और घटनाक्रम में, भारतीय अधिकारियों ने मंगलवार को पांच व्यक्तियों को गिरफ्तार किया, जिनकी पहचान पाकिस्तानी मूल के होने का संदेह है।
अरब सागर में गुजरात के तट पर जिस नाव को भारतीय कोस्ट गार्ड ने जब्त किया उसमें 3,000 किलो से ज्यादा ड्रग्स ले जाया जा रहा था। नशीली दवाओं और हथियारों की तस्करी के लिए नाव जैसे गैर-सैन्य जहाजों के उपयोग में इजाफा ने भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए टेंशन काफी बढ़ा दिए हैं।

भारत में किन समुद्री इलाकों में चलता है नेटवर्क
अरब सागर में चलने वाले ऐसे हर जहाज को रोकना और उसकी तलाशी लेना असंभव है, क्योंकि हर वक्त समुद्र में बड़ी संख्या में नावें सक्रिय होती हैं। भारत का पश्चिमी तट दक्षिण में कन्याकुमारी (तमिलनाडु) से लेकर उत्तर में सूरत (गुजरात) तक लगभग 1,500 किमी तक फैला हुआ है और यह तस्करी और अवैध नौकाओं के लिए पसंदीदा लैंडिंग स्थान है जो भारत में खेप पहुंचाने के लिए पाकिस्तानी और ईरानी तटों से रवाना होते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, जब ये नाव पहले से ही तय किए गये प्वाइंट पर पहुंच जाते हैं, तो फिर एक नाव का सामान दूसरे जहाज में ट्रांसफर कर दिया जाता है। दूसरा जहाज, जो आमतौर पर नाव से छोटा होता है, वो उस खेप को पहुंचाने के लिए भारतीय तटों तक पहुंचता है।
भारत का पश्चिमी तट हमेशा से तस्करी के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। जनवरी 1993 के बॉम्बे सीरियल बम ब्लास्ट के दौरान भी विस्फोटक लाने के लिए पश्चिमी तटों का ही इस्तेमाल किया गया था। उस दौरान गोला-बारूद और 3,000 किलोग्राम आरडीएक्स को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले की श्रीवर्धन तहसील में शेखड़ी और दिघी घाटों पर दो अलग-अलग लैंडिंग के दौरान पाकिस्तान से मुंबई लाया गया था।
इसी तरह, 26 नवंबर 2008 के मुंबई हमले के अपराधी भी पाकिस्तान से अरब सागर होते हुए ही मुंबई पहुंचे थे। ये आतंकी 22 नवंबर को सुबह 7 बजे एक छोटी नाव पर कराची तट से रवाना हुए थे और बीच में एक बड़ी नाव पर सवार हुए थे और फिर 23 नवंबर को मुंबई पहुंचे थे।
ईरानी आतंकवादियों का समुद्री मार्ग क्या होता है?
ईरान में चाबहार बंदरगाह क्षेत्र में ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां ईरानी सुरक्षा बलों की मौजूदगी काफी कम है, जिसकी वजह से वो क्षेत्र आतंकवादियों के लिए एक सुरक्षित क्षेत्र बन जाता है। इन क्षेत्रों से हथियारों और ड्रग्स की तस्करी करना काफी आसन होता है। लिहाजा, इन क्षेत्रों में कई सशस्त्र समूहों की मौजूदगी है, जो ईरान-पाकिस्तान सीमा के आसपास सक्रिय रहते हैं, और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI इन संगठनों को संरक्षण और आर्थिक मदद देता है, ताकि ये भारत में तस्करी कर सकें।
ऐसे ही एक समूह, जैश-अदल-अदल पर शक है, कि उसने मार्च 2016 में भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव का चाबहार पोर्ट के पास से अपहरण किया और फिर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी, इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) को सौंप दिया था।
कैसा होता है तस्करी में शामिल नाव का आकार?
ईरानी या पाकिस्तानी आतंकी, जो इन नावों का इस्तेमाल करते हैं, वो सामान्य तौर पर 50-70 फीट लंबे और 15-20 फीट चौड़े और 10-12 फीट ऊंचाई वाले होते हैं। ये नावें अकसर 1500 टन वजन के सामान और करीब 15 से 20 लोगों को एक बार में ढोने में सक्षम होते हैं।
बेरोजगारी और अत्यधिक गरीबी की वजह से इन इलाकों के लोग पाकिस्तानी और ईरानी आतंकी संगठनों में शामिल होते हैं औऱ फिर ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से हथियार और ड्रग्स खरीदते हैं, और फिर उन्हें अरब सागर और हिंद महासागर के किनारे के देशों में आपूर्ति करते हैं।
इस काम में शामिल तस्करों को तस्करी करने में करीब 10 दिनों का वक्त लगता है और हर एक तस्कर को इस दौरान 2 लाख से 4 लाख रुपये दिया जाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये नेटवर्क करोड़ों की कमाई वाला नेटवर्क बन गया है, जिससे जमा किए गये पैसों की आतंकी गतिविधियों में इस्तेमाल किया जाता है।

नेटवर्क को तोड़ने में नाकामी क्यों?
गुजरात के समुद्री क्षेत्र में ऐसे ही पांच तस्करों को गिरफ्तार किया गया है, लेकिन इन शिपमेंट के पीछे के सरगना की पहचान करना एक बेहद चुनौतीपूर्ण काम है। इन नावों से जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, वे बेहद निम्न स्तर के ऑपरेटर हैं, जिन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है, कि खेप किसकी है या उन्हें भुगतान करने वाले लोग कौन हैं।
और यही वजह है, कि उनकी गिरफ्तारी और पूछताछ से शायद ही कभी कोई सुराग मिल पाता है। अधिकारियों का कहना है, कि भारत के पश्चिमी तट को गैर-आतंकवादी और गैर-नशीली दवाओं के अनुकूल बनाने का एकमात्र तरीका उनकी खेप को जब्त करके और उनके कोरियर को गिरफ्तार करके उन्हें आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाना है, ताकि ये हथियार और ड्रग कार्टेल भारत की ओर आने से रोक दिए जाएं।
रिपोर्ट्स से पता चला है, कि इस मामले पर पीएमओ ने फौरन कार्रवाई करते हुए इस नेटवर्क को तहस-नहस करने के लिए कहा है, लिहाजा यह सुनिश्चित करने के लिए उपाय किए जा रहे हैं, कि कई तरीकों और एजेंसियों के उपयोग से ऐसी तस्करी को खत्म किया जाए।












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