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क्‍यों मोसुल की जंग राष्‍ट्रपति बराक ओबामा के लिए है खास

अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा के लिए ही नहीं हिलेरी क्लिंटन के लिए भी काफी अहम साबित हो सकती है इराक के शहर मोसुल की जंग।

वाशिंगटन। आठ वर्ष पहले जब राष्‍ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिका का चुनाव जीता था तो उन्‍होंने वादा किया था कि वह इराक में जारी अमेरिकी सेनाओं के अभियान को खत्‍म करेंगे। अब मानों लगता है कि समय का पहिया घूम गया है और ओबामा जब अपना ऑफिस छोड़ेंगे तो एक बार फिर से इराक में अमेरिकी सेनाओं का अभियान जारी रहेगा।

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यहीं पर बगदादी ने खुद को बताया खलीफा

इराक के शहर मोसुल को आईएसआईएस के कब्‍जे से छुड़ाने के लिए यहां पर जंग छिड़ी चुकी है। अमेरिकी और इराक की सेनाओं की यह जंग काफी आक्रामक हो चुकी है।

मोसुल इराक को दूसरा सबसे बड़ा शहर है जहां पर सुन्‍नी नागरिकों की संख्‍या सबसे ज्‍यादा है।

यह वही शहर है जहां से वर्ष 2014 में आईएसआईएस मुखिया अबु बकर-अल-बगदादी ने खुद को खलीफा घोषित कर यहां से दुनियाभर में आतंक की शुरुआत की थी।

अमेरिकी के लिए बड़ी परीक्षा मोसुल

मोसुल में जो कुछ भी होगा वह आने वाले दिनों में शिर्ते, सुन्‍नी और कुर्दों का भविष्‍य तय करेगा। अमेरिका के लिए मोसुल की लड़ाई एक बड़ी परीक्षा है।

न सिर्फ राष्‍ट्रपति ओबामा बल्कि मोसुल की लड़ाई अमेरिका के कांउटर-टेररिज्‍म प्रोग्राम के लिए भी काफी अहम साबित होगी।

क्‍या किया था बुश ने

ओबामा से पहले पूर्व राष्‍ट्रपति जॉर्ज बुश ने यहां पर 150,000 अमेरिकी सैनिकों को डेप्‍लॉय किया था। मिडिल ईस्‍ट सिक्‍योरिटी प्रोग्राम के डायरेक्‍टर इलान गोल्‍डबर्ग कहते हैं कि ओबामा ने काउंटर टेररिज्‍म की जो लड़ाई छेड़ी है उसका बुश के फैसले कोई लेना-देना नहीं है।

यह बिल्‍कुल एक नई शुरुआत है जिसमें छोटी संख्‍या में अमेरिकी सैनिकों को ईराक की सिक्‍योरिटी फोर्सेज की मदद करने के लिए भेजा गया है।

मिलेगी हिलेरी को मदद

यह लड़ाई ऐसे समय में शुरू हुई है जब अमेरिका में चुनाव होने वाले हैं। रिपब्लिकन पार्टी के उम्‍मीदवार डोनाल्‍ड ट्रंप ने आरोप लगाया है कि ओबामा ने यह लड़ाई क्लिंटन को चुनाव में जीत दिलाने के मकसद से शुरू की है।

विशेषज्ञों का भी मानना है कि अगर राष्‍ट्रपति ओबामा को मोसुल में कामयाबी मिलती है तो फिर हिलेरी क्लिंटन को उसका सीधा फायदा मिलेगा।

क्‍या हुआ था 2003 में

वर्ष 2003 में अमेरिकी सेना ने टर्की में अपने बेस कैंप्‍स बनाए थे और यहां से वह मोसुल को कब्‍जे में करने का सपना देख रही थी।

टर्की ने अमेरिका को ऐसा करने से मना कर दिया था। अप्रैल 2003 में अमेरिका ने इसे अपने कब्‍जे में कर लिया था।

मोसुल में ही 22 जुलाई 2003 को इराक के शासक सद्दाम हुसैन के बेटो उदय हुसैन और क्‍यूसे हुसैन की मोसुल में ही एक एनकाउंटर में मौत हो गई थी।

मोसुल वर्ष 2003 में अमेरिकी सेना का बेस कैंप था और यहां पर अमेरिकी का 101वीं एयरबॉर्न डिविजन मौजूद थी।

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