Opinion: ट्रंप पर हमले ने लिबरल पार्टियों के किया बेनकाब, इस विचारधारा को विरोध क्यों नहीं है बर्दाश्त?
Donald Trump assassination attempt: डोनाल्ड ट्रंप के सिर और उस गोली के बीच एक इंच से भी कम का फासला था, जिसे थॉमस मैथ्यू क्रुक्स ने करीब 150 मीटर की दूरी से चलाया था। वो तो गनीमत थी, कि उसी क्षण संयोगवश डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सिर को हिला लिया, वरना AR-15 सेमी ऑटोमेटिक राइफल उनके सिर को उड़ा देता।
पता चला है, कि थॉमस मैथ्यू क्रुक्स रजिस्टर्ड रिपब्लिकन था, उसके पिता भी रजिस्टर्ड रिपब्लिकन थे और उसकी मां रजिस्टर्ड डेमोक्रेटिक थी। ट्रंप की हत्या की कोशिश ने दुनिया के सामने एक सेप्टिकैमिक अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था को उजागर कर दिया है।

डोनाल्ड ट्रंप पर हुए जानलेवा हमले ने इस बात को भी उजागर किया है, कि कैसे अमेरिका की लिबरल और वामपंथी राजनीति ने उन्हें बार बार और लगातार निशाना बनाया है, उन्हें लोकतंत्र का खतरा बताया है।
इसमें भी कोई शक नहीं, कि 2020 में चुनाव हारने के बाद ट्रंप समर्थकों ने 6 जनवरी 2021 को संसद पर कब्जा करने की कोशिश की थी, लेकिन उसके बाद ट्रंप को रास्ते से हटाने के लिए जिस तरह से बदले की राजनीति की गई, उन्हें जिस तरह से वामपंथी-लिबरल राजनेताओं और पत्रकारों ने निशाना बनाया, उसी का अंजाम उनपर किया गया जानलेवा हमला हो सकता है।
डेमोक्रेटिक पार्टी ने पिछले 8 सालों से लगातार डोनाल्ड ट्रंप को 'नाजी' और 'हिटलर' कहा है। डोनाल्ड ट्रंप पर हुए जानलेवा हमले से कुछ समय पहले ही जो बाइडेन ने डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिका के लिए खतरा करार दिया था।
बराक ओबामा, जिन्होंने अपने शासनकाल में कई मुस्लिम देशों को तबाह कर दिया, उन्हें नोबल प्राइज दिया जाता है और वो मुस्लिमों के हितैशी कहलाते हैं, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप, जिन्होंने अपने कार्यकाल में अमेरिका को एक भी युद्ध में नहीं झोंका, वो मुस्लिमों के विरोधी कहे जाते हैं।
खून से लथपथ डोनाल्ड ट्रंप की मुट्ठी बांधे तस्वीर अमेरिका की लोकतंत्र की जीत का प्रतीक नहीं है, बल्कि ये तस्वीर उस लोकतांत्रिक विचार का अंत हो सकता है, जिसमें हर विचारधारा को पनपने, विकास करने और आत्मसात करने की आजादी मिलती है।
क्या डोनाल्ड ट्रंप की खून से भींगी तस्वीर ये सोचने के लिए मजबूर नहीं करती है, कि लिबरल और वामपंथ किसी और विचारधारा को पनपने देने का सख्त विरोधी है।
अमेरिका के इस लिबरल विचारधारा ने तब तक आतंकवाद के स्वरूप को स्वीकार नहीं किया, जब तक वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला नहीं हुआ। अमेरिका हो या भारत या फिर वो यूरोप ही क्यों ना हो, "सांस्कृतिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण" के लिए बहुत हद तक ये विचारधारा जिम्मेदार है, जो अपने आगे किसी और विचारधारा को मान्यता नहीं देता। खासकर अमेरिका के संदर्भ में देखा जाए, तो 'काले वोटर्स' का वोट एकमुश्त हासिल करने के लिए जिस तरह से लिबरल विचारधारा ने गोरों को निशाना बनाया है, उसने अमेरिकी लोकतंत्र की जड़ को ही जहरीला कर दिया है और उसी का नतीजा डोनाल्ड ट्रंप हैं, जिन्हें गोरों ने मसीहा मान लिया है।
आखिर वो क्या वजह है, कि लिबरल राजनीति सिर्फ एक तरफ देखती है?

भारत में कथित सवर्णों के खिलाफ मुहिम चलाना हो या फिर हिंदुत्व को गाली की तरफ इस्तेमाल करना हो, यूरोप में अप्रवासियों के लिए दरवाजा खोलना हो, मुस्लिम चरमपंथ पर चुप्पी साधना हो या दक्षिणपंथी विचारधारा को एक अभिशाप बनाकर पेश करना हो, लिबरल और वामपंथी विचारधारा ने ही सबसे पहले अपने फायदे के लिए समाज को बांटा है और इसी बंटवारे से जो जहर निकलता है, उसका अंजाम डोनाल्ड ट्रंप पर हमला है।
ऐसा नहीं है, कि अमेरिका में पहली बार किसी पूर्व राष्ट्रपति पर हमला हुआ है, बल्कि कई राष्ट्रपतियों की हत्या तक कर दी गई है, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है, कि हिंसा की घटना ने गहरे गुस्से, ध्रुवीकरण और अभूतपूर्व अलगाव के दलदल को दर्शाया हो। डोनाल्ड ट्रंप पर हमले के बाद ऐसा लग रहा है, कि अमेरिकी राजनीति बारूद के ढेर पर बैठ गई है, सोशल मीडिया पर जहरीली भाषाओं की बाढ़ आ चुकी है और नेताओं के भाषण में भड़काऊ शब्दों की भरमार है, जिससे आशंका बन गई है, कि कहीं इस बारूद में विस्फोट ना हो जाए।
बाइडेन को देश के लिए बार बार खतरा बताने के बाद अब राष्ट्रपति जो बाइडेन अपील करते हैं, कि 'राजनीतिक गर्मी काफी बढ़ गई है, इसे कम करने की जरूरत है।'
CNN समेत अमेरिका की वामपंथी और लिबरल मीडिया ने डोनाल्ड ट्रंप को खलनायक की तरफ पेश किया है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता है, कि चुनाव से पहले ट्रंप के नाम पर जो चुनावी लहर बनी है, उसे घबराकर ही उनपर हमला किया गया हो?
अमेरिकी मीडिया ने डोनाल्ड ट्रंप को ऐसे पेश किया है, मानो अगर वो फिर से राष्ट्रपति चुने जाते हैं, तो फिर ये दुनिया ही खत्म हो जाएगी और अमेरिका का विनाश हो जाएगा।
लिहाजा अमेरिका को आत्ममंथन करने की जरूरत है। इस लिबरल विचारधारा को ये समझने की जरूरत है, कि समाज में हर तरह की विचारधारा को रहने की इजाजत मिलना ही लोकतंत्र है और लोकतंत्र के रक्षक सिर्फ वही नहीं हैं। अमेरिका की राजनीति वर्ग को खुद को शुद्ध करने की जरूरत है और अमेरिकी मीडिया को डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ नकारात्मक रिपोर्टिंग करते समय ये याद रखना होगा, कि ट्रंप और उनके समर्थक भी अमेरिकी समाज से ही हैं और वो हरगिज देश के लिए खतरा नहीं हो सकते हैं। इसके अलावा, ट्रंप को चुना जाना चाहिए या नहीं, ये अमेरिका के समाज पर, अमेरिका को नागरिकों के विवेक पर छोड़ना चाहिए और उनके चुनाव का सम्मान करना चाहिए, यही लोकतंत्र होता है और लोगों के चुनाव का सम्मान करना ही लोकतंत्र का सम्मान है।
6 जनवरी 2021 को अमेरिकी संसद पर ट्रंप समर्थकों के हमले के बाद अमेरिका की राजनीति और अमेरिका का समाज बुरी तरह से बंट चुका है। दोनों ही पार्टियों के बीच अविश्वास की दीवार खड़ी हो चुकी है और दोनों ही पार्टियों के समर्थक इस अविश्वास की दीवार के दोनों तरफ खड़े हो चुके हैं, लिहाजा अमेरिकी नेताओं को ये याद रखना होगा, कि हिंसा वहां दिखाई देती है, जहां राजनीति खत्म होती है। उन्हें अविश्वास की इस दीवार को तोड़ना होगा, अति-वामपंथी विचारधारा हो या अति-दक्षिणपंथी विचारधारा, इनसे बाहर निकलना होगा और तभी जाकर अमेरिका का लोकतंत्र शुद्ध हवा में सांस ले पाएगा।












Click it and Unblock the Notifications