Special Report: जापान की अनोखी ‘होली’ हड़का मत्सुरी, जब लंगोट पहने 10 हजार लोगों के बीच होती है पवित्र ‘लड़ाई’
जापान का पवित्र त्योहार हड़का मत्सुरी, जिसे भारतीय लोग जापानी होली भी कहते हैं, वो इस बार कोरोना वायरस की वजह से नहीं मनाया गया।
टोक्यो: पिछले साल अगर इस वक्त आप जापान में होते तो संभव है कि आप भी लंगोट पहनकर ठंडे पानी की फुहारों के बीच जापानी लोगों के साथ पवित्र त्योहार में शरीक होकर दौड़ लगा रहे होते। इस त्योहार का नाम ही बस 'नेक्ड फेस्टिवल' यानि 'नंगा होकर दौड़ने' का त्योहार है मगर बाकी हर चीज पवित्र और प्रकृति को ध्यान में रखकर प्रकृति के लिए मनाया जाने वाला यह त्योहार है। जापानी भाषा में इस त्योहार को हड़का मत्सुरी भी कहा जाता है। सैकड़ों साल से चली आ रही इस परंपरा में एक साथ हजारों लोग लंगोट पहने हुए हड़का मत्सुरी में शामिल होते हैं।
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10000 लोगों के बीच अनोखी लड़ाई
हर साल फरवरी महीने के तीसरे सोमवार को जापान के साइदाइजी कन्नोनिन मंदिर में हड़का मत्सुरी मनाया जाता है। इस मंदिर तक जाने के लिए आप ओकायामा से ट्रेन पकड़ सकते हैं और वहां जाने में आपको करीब आधे घंटे का वक्त लगेगा। हालांकि, इस बार कोरोना वायरस की वजह से इस पवित्र त्योहार का रंग फीका रहा। जापान में पंबर खेती और भाईचारा बढ़ाने के लिए इस त्योहार को मनाया जाता है। दोपहर के बाद मंदिर परिसर में जवान लड़के जमा होकर पहले ये त्योहार मनाते हैं मगर शाम होते ही जवान लड़कों को किनारे कर दिया जाता है और बारी आती है बड़े लोगों के इस त्योहार में शामिल होने की।

शाम के वक्त सिर्फ लंगोट पहनकर 10 हजार लोग पवित्र साइदाइजी कन्नोनिन मंदिर के चारों और दौड़ लगाते हैं और हड्डियां जमा देने वाले पानी में नहाते हैं। एक से दो घंटे तक लोग दौड़ते हैं और उनके ऊपर बर्फ जितना ठंडा पानी गिराया जाता है। माना जाता है कि मंदिर परिरस में इस पानी से नहाने पर शुद्धता हासिल होगी और जापान में अच्छी खेती होगी। करीब एक से दो घंटे तक ठंडे पानी से नहाकर जब लोग शुद्ध हो जाते हैं फिर उन्हें मंजिर में प्रवेश दी जाती है। जापान में लंगोट को 'फंदोशी' कहा जाता है जबकि पैरों में बांधे गये कपड़े को ताबी कहा जाता है।
रात के वक्त जब हर तरफ अंधेरा पसर जाता है उस वक्त रात करीब 10 बजे मंदिर के मुख्य पुजारी मंदिर की खिड़की से नीचे 100 बंडल लकड़ी के टुकड़ों के साथ 20-20 सेंटिमीटर के दो टुकड़े फेंकते हैं। जिसे वहां मौजूद ठंडे पानी में पवित्र हुए लोगों को खोजना पड़ता है। 10 हजार लोगों के बीच 20-20 सेंटीमीटर के 2 लकड़ी के टुकड़ों को खोजने का खेल बेहद दिलचस्प हो जाता है। सिर्फ दो लोग ही भाग्यशाली हो सकते हैं, लिहाजा ये प्रतिस्पर्धा बेहद कड़ा और खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है। लेकिन, ये नजारा ऐसा होता है जिसे देखने दुनिया के अलग अलग हिस्से से लोग जापान जाते हैं।

ऐसी मान्यता है कि जिन दो भाग्यशाली लोगों को लड़की के छोटे छोटे टुकड़े मिलते हैं वो पूरे सालभर भाग्यशाली होगा। लकड़ी के टुकड़ों को खोजने का ये खेल करीब आधे घंटे चलता है और जब खत्म होता है तो लोगों के शरीर पर जख्म के कई निशान बन आते हैं। कई लोग घायल हो जाते हैं मगर परंपरा के आगे उन्हें वो जख्म पसंद हैं।
इस साल हड़का मत्सुरी 20 फरवरी को मनाया गया है मगर कोरोना वायरस की वजह से इस बार सिर्फ 100 लोगों के बीच ही इस त्योहार को मनाया गया वो भी सोशल डिस्टेंसिग के साथ। सोशल डिस्टेंसिंग के साथ हड़का मत्सुरी त्योहार मनाना वैसा ही है जैसे होली एक दूसरे को सोशल डिस्टेंसिंग के साथ रंग लगाना।

500 सालों की परंपरा
इस साल कोरोना वायरस की वजह से कई लोग इस त्योहार को इस साल के लिए स्थगित करने की मांग रहे थे मगर कुछ लोगों का कहना था कि 500 सालों से इस परंपरा को मनाया जा रहा है ऐसे में इस साल भी हड़का मत्सुरी त्योहार कैंसिल नहीं होनी चाहिए। जिसके बाद सोशल डिस्टेंसिंग के साथ इस त्योहार को मनाने की इजाजत मिली। मंदिर के पुजारी कहते हैं कि तमाम अधिकारियों से बात करने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा गया कि हम सोशल डिस्टेंसिंग के साथ त्योहार मनाएंगे और प्रार्थना करेंगे कि दुनिया से कोरोना वायरस जल्द खत्म हो जाए। ऐसा अनुमान है कि इस नेक्ड फेस्टिवल की शुरूआत आज से करीब 500 साल पहले 1338 से 1573 के बीच हुई थी। हालांकि, साइदाइजी कन्नोनिन मंदिर सैकड़ों सालों से मौजूद है। लंबी विरासत संजोने के लिए इस त्योहार को 2016 में एक महत्वपूर्ण अमूर्त लोक सांस्कृतिक फोक कल्चर भी कहा गया जिसे पूरी दुनिया में पसंद किया जाता है।
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