Gwadar: ग्वादर पोर्ट से निकलेगा पाकिस्तान के टूटने का रास्ता? बंगालियों की तरह बढ़ रहा बलूचों का विद्रोह
Baloch Protest: पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी बलूचिस्तान प्रांत के बंदरगाह शहर ग्वादर में तनाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है और बलूचों के प्रदर्शन को कुचलने में अब शहबाज शरीफ की सरकार और देश की सेना बुरी तरह से नाकाम हो रही है। सेना की खतरनाक कार्रवाइयों के बाद भी बलूचों का विरोध प्रदर्शन कई दिनों से चल रहा है।
ग्वादर पोर्ट, अरब सागर पर पाकिस्तान का एकमात्र गहरे समुद्र वाला बंदरगाह है, और यह 60 अरब डॉलर वाले चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का एक प्रमुख मार्ग है। लेकिन, बलूचों का प्रदर्शन इस कदर बढ़ गया है, कि ग्वादर पोर्ट काफी मुश्किलों में पड़ गया है।

ग्वादर बंदरगाह वाले शहर में ताजा तनाव शुक्रवार को तब शुरू हुआ, जब बलूच यकजेहती समिति (BYC) ने पाकिस्तान के सबसे बड़े और सबसे गरीब प्रांत बलूचिस्तान में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन, जबरन गायब किए जाने और लोगों की न्यायेतर हत्याओं के खिलाफ प्रदर्शन करने का आह्वान किया। 2023 की जनगणना के मुताबिक, पाकिस्तान की अनुमानित 24 करोड़ की आबादी में से लगभग 1.5 करोड़ की आबादी वाला बलूचिस्तान, तेल, कोयला, सोना, तांबा और गैस भंडार सहित प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है, जहां से बाकी पाकिस्तान का पेट भरता है, लेकिन इस क्षेत्र को इन्हीं की संपदाओं से कुछ भी हासिल नहीं होता।
बलूचों की समस्याएं क्या हैं?
जातीय बलूच का आरोप है, कि पाकिस्तान की सरकारों ने उनके समुदाय की उपेक्षा की है और प्रांत के खनिज संसाधनों का दोहन किया है। इस गुस्से ने अलगाववादी भावनाओं को हवा दी है और 1947 में पाकिस्तान के गठन के बाद से प्रांत में कम से कम पांच विद्रोही आंदोलन हुए हैं।
विद्रोह की नवीनतम लहर 2000 के दशक की शुरुआत में प्रांत के संसाधनों के बड़े हिस्से की मांग करने और यहां तक कि पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करने के लिए शुरू हुई। तब से पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने विद्रोह पर कड़ी कार्रवाई शुरू की और हजारों बलूच विद्रोहियों को पाकिस्तानी सेना ने मौत के घाट उतार दिया
ग्वादर, जो अपनी आर्थिक प्रमुखता के साथ साथ, सशस्त्र और अलगाववादी समूहों की तरफ से दिए जाने वाले हिंसा का केंद्र रहा है, वहां सबसे ताजा घटना इस साल मार्च में हुई थी, जब आठ लोगों ने ग्वादर पोर्ट अथॉरिटी परिसर में घुसने की कोशिश की थी, लेकिन सुरक्षा अधिकारियों ने उन्हें मार डाला।
बलूचों के विद्रोह को कुचलने की कोशिश
रविवार को, BYC ने ग्वादर में "बलूच राजी मुची" यानि बलूच राष्ट्रीय सभा का आह्वान किया। हालांकि, जब विशाल प्रांत के विभिन्न हिस्सों से काफिले शहर की ओर बढ़े, तो कानून प्रवर्तन अधिकारियों ने वहां जाने वाले प्रमुख राजमार्गों को ब्लॉक करना शुरू कर दिया, जिसकी वजह से कई जगहों पर पर झड़पें हुईं।
BYC का दावा है, कि शनिवार को मस्तुंग जिले में ऐसी ही एक झड़प के दौरान सुरक्षा बलों ने गोलीबारी की, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। BYC के प्रतिनिधि बेबर्ग बलूच ने अल जजीरा को बताया, कि "अर्धसैनिक बल ने महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों के काफिले पर गोलीबारी की, जो क्वेटा से ग्वादर की यात्रा कर रहे थे।"
जबकि, सोमवार को एक बयान में पाकिस्तानी सेना ने कहा, कि "हिंसक भीड़ के हमलों" में उसके एक सैनिक की भी मौत हो गई और 16 अन्य सैनिक घायल हो गए। इन सबके बीच बुधवार को लगातार पांचवें दिन ग्वादर में मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं बंद रहने के कारण झड़पों के दौरान सुरक्षा बलों ने दर्जनों बलूच लोगों को गिरफ्तार किया। बीवाईसी ने कहा, कि उनके दो प्रमुख नेताओं, सम्मी दीन बलूच और सबीहा बलूच को सोमवार को ग्वादर में अधिकारियों ने हिरासत में लिया और उन्हें गायब कर दिया है।
अलजजीरा के मुताबिक, गुस्साए प्रदर्शनकारी प्रांत के अन्य शहरों में भी इकट्ठा हो रहे हैं, जिनमें प्रांतीय राजधानी क्वेटा, केच और मस्तुंग शामिल हैं, और गिरफ्तार नेताओं की रिहाई की मांग कर रहे हैं।
इस बीच, बीवाईसी नेता महरंग बलूच ने रविवार देर रात एक बयान जारी करते हुए दो मुख्य मांगें बताई गईं: 1- बलूच प्रदर्शनकारियों को ग्वादर तक पहुंचने की अनुमति देने के लिए राजमार्गों को खोल जाए और 2- पिछले सप्ताह से कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा गिरफ्तार किए गए उनके दर्जनों सदस्यों को रिहा किया जाए।
उस रात ग्वादर में सैकड़ों लोगों की भीड़ को संबोधित करते हुए, 31 साल की महरंग ने कहा, कि ग्वादर के लोग "राज्य उत्पीड़न" का विरोध करने के लिए बड़ी संख्या में बाहर आए हैं। उन्होंने कहा, "राज्य और उसके संस्थानों ने राजमार्गों को ब्लॉक करके और हमारे लोगों को गिरफ्तार करके हमें इस सभा को आयोजित करने से रोकने की कोशिश की है, लेकिन आज पूरा ग्वादर एक संदेश देने के लिए यहां है: हम बलूच राष्ट्र पर और अधिक उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं करेंगे।"
उन्होंने कहा, "मुझे पता है कि मैं इस सरकार का अगला निशाना हो सकती हूं, लेकिन एकता हमारी ताकत है, और हमें एकजुट रहना चाहिए।"
BYC सदस्य सादिया बलूच ने मंगलवार को क्वेटा से अल जजीरा को बताया, कि वे तब तक विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगे जब तक कि गिरफ्तार किए गए सभी लोगों को रिहा नहीं कर दिया जाता।
उन्होंने अल जजीरा को बताया, "बलूचिस्तान में हजारों लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, जिन्हें अधिकारियों ने ग्वादर जाने से रोक दिया है। सम्मी और सबीहा को धरने से उठा लिया गया और हमें नहीं पता कि वे कहां हैं। स्थानीय अधिकारियों में से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दे रहा है।"
अल जजीरा ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, कि ग्वादर और क्वेटा में स्थानीय अधिकारियों और सरकारी अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।

बलूचों पर सरकारी अत्याचार
बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री सरफराज बुगती ने सोमवार को विरोध प्रदर्शनों की निंदा की।
उन्होंने राज्य विधानसभा के अंदर से कहा, "हम उन्हें कहीं और रैली करने के लिए जगह की पेशकश कर रहे थे, लेकिन उन्होंने मना कर दिया और ग्वादर में रैली करने पर अड़े रहे। इस अराजकता के पीछे का मकसद प्रांत में हुए सभी विकास और प्रगति को बाधित करना है।"
बुगती ने कहा, कि नागरिकों को इकट्ठा होने का अधिकार है, लेकिन उन्हें "शांति और व्यवस्था को बाधित करने का इरादा" नहीं रखना चाहिए।
लेकिन मानवाधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेशनल ने मंगलवार को सरकारी अधिकारियों पर "शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को बदनाम करने और उनका अपराधीकरण करने" की कोशिश करने का आरोप लगाया।
अल जजीरा को दिए एक बयान में एमनेस्टी ने कहा है, कि "हर बार जब बलूच विरोध प्रदर्शन होते हैं, तो उनकी मांगों के खिलाफ सुरक्षाबल हिंसा और सामूहिक गिरफ्तारी से जवाब देते हैं।"
एमनेस्टी ने कहा है, कि बलूच प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा बंद होनी चाहिए।
एमनेस्टी ने कहा है, कि "एमनेस्टी इंटरनेशनल बलूच विरोध प्रदर्शनों पर क्रूर कार्रवाई को खत्म करने और शांतिपूर्ण सभा के अपने अधिकार का प्रयोग करने के लिए गिरफ्तार किए गए सभी लोगों की तत्काल और बिना शर्त रिहाई की मांग करता है।"
पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने भी बलूच प्रदर्शनकारियों के खिलाफ "अनावश्यक" बल प्रयोग और इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं के निलंबन की आलोचना की है। इसने एक बयान में कहा है, कि "उन्हें बलूच प्रतिनिधियों से मिलने और उनकी मांगों को ध्यान से सुनने के लिए एक उच्च स्तरीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल का गठन करना चाहिए।"












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