मिलिए भारत के ब्लॉकबस्टर 'राइस मैन' से, जो पूरी दुनिया को खाना खिला रहे हैं
85 साल के डॉक्टर गुरदेव सिंह खुश बताते हैं कि, वह जालंधर के एक छोटे से गांव रुड़की के रहने वाले हैं। उनका जन्म 1935 को नानके गांव खटकड़कलां में 22 अगस्त 1935 को जाट सिख किसान परिवार के घर में हुआ था।
लुधियाना/वाशिंगटन, 10 सितंबर : हरित क्रांति के जनक के तौर पर वैसे तो कृषि वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलॉग (Norman Borlaug) का नाम सबसे उपर है लेकिन भारत के डॉक्टर गुरदेव सिंह खुश (Gurdev Singh Khush) को लोग' राइस मैन' (Rice Man) के नाम से जानते हैं। उन्होंने अपने अथक प्रयासों से दुनिया में धान की 300 से ज्यादा किस्में ईजाद किए। कृषि के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान को लोग कभी नहीं भुला पाएंगे क्योंकि उन्होंने दुनिया को भुखे पेट कभी नहीं सोने दिया। इसलिए उन्हें धान के क्षेत्र में हरित क्रांति का जनक भी कहा जाता है। उन्हें लोग 'राइसमैन' के नाम से भी जानते हैं। हालांकि, बेहद कम लोग ही जानते होंगे कि डॉक्टर गुरदेव सिंह खुश डॉक्टर बनना चाहते थे। यह बात उन्होंने खुद बताया है।

गुरदेव सिंह खुश दुनि्या के 'राइस मैन'
एक तरफ जहां नॉर्मन बोरलॉग को लोग अनाज में गेंहू की क्रांति लाने के लिए जानते हैं ठीक उसी प्रकार गुरदेव सिंह खुश को लोग धान के क्षेत्र में किए गए उनके योगदान को लेकर जाने जाते हैं। उनकी आईआर 64 और आईआर 36 (IR64, IR36) धान काफी अच्छी नस्ल का धान है जो कम समय में बेहतर उपज देने के लिए जाना जाता है। गुरदेव सिंह खुश बताते हैं कि, वे चावल खाना पसंद नहीं करते हैं, मैं प्रत्येक दिन भोजन में गेहूं से बनी चपाती (रोटी) खाना पसंद करता हूं। उन्होंने उदहारण के तौर पर बताया कि, वे काफी हद तक मिल्कमैन ऑफ इंडिया वर्गीज कुरियन के जैसे ही हैं । गुरदेव कहते हैं कि, वर्गीज कुरियन को दूध पीना पसंद नहीं था, लेकिन उन्होंने भारत में दूध की क्रांति लाकर इतिहास रच दिया। बता दें कि, वर्गीज कुरियन, जिन्हें भारत में "श्वेत क्रांति के जनक" के रूप में जाना जाता है, उन्होंने देश में दूध की क्रांति लाने का काम किया था।

पिता के सपनों को पूरा किया
85 साल के डॉक्टर गुरदेव सिंह खुश बताते हैं कि, वह जालंधर के एक छोटे से गांव रुड़की के रहने वाले हैं। उनका जन्म 1935 को नानके गांव खटकड़कलां में 22 अगस्त 1935 को जाट सिख किसान परिवार के घर में हुआ था। वे अपने पिता करतार सिंह के सबसे बड़े बेटे हैं। उनके पिता ने उस समय 10वीं तक की पढ़ाई की थी। इस वजह से गांव में उनका काफी मान-सम्मान था। पहले के समय में 10वीं तक की पढ़ाई करना किसी भी व्यक्ति के लिए सम्मान का विषय हुआ करता था। उनके पिता अपने कारोबार के साथ-साथ गांव के लोगों के काम काज को देखते थे और इलाके की भलाई के लिए हमेशा प्रयासरत रहते थे। गुरदेव सिंह भी पढ़ लिखकर अपने पिता के नक्शे कदम पर चलकर दुनिया में मान-सम्मान और शोहरत हासिल की।

7 किमी दूर स्कूल पैदल जाते थे खुश
डॉक्टर खुश बताते हैं कि, उनके गांव में कोई स्कूल नहीं था इसलिए वह हर रोज 7 किमी पैदल चलकर खालसा स्कूल बंडाला में पढ़ने जाते थे। स्कूल जाने से पहले और आने के बाद वे खेती में अपने पिता का हाथ बंटाते थे। उन्होंने बंडाला स्कूल से 10वीं की पढ़ाई पूरी की। वे डॉक्टर बनना चाहते थे, लेकिन पिता चाहते थे कि, उनका बेटा कषि के क्षेत्र में बड़ा नाम करे। क्योंकि उस समय भारत के किसानों की हालत बेहद खराब थी और पिता चाहते थे कि गुरदेव कृषि के क्षेत्र में काम करके किसानों की बदहाली को दूर करे। अपने पिता के सपनों को पूरा करने के लिए गुरदेव सिंह खुश ने अपने सपनों को छोड़कर पिता के अरमानों को पूरा करने का प्रण लिया। इसके लिए उन्होंने लुधियाना स्थित कृषि कॉलेज (Punjab Agricultural University-(PAU)) में दाखिला लिया। जहां से उन्होंने 1955 में बीएससी एग्रीकल्चर की डिग्री हासिल की। उनका मुख्य विषय प्लांट ब्रीडिंग था। अब उच्च शिक्षा के लिए वे विदेश जाना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए अमेरिका को चुना लेकिन उनके लिए ये काम आसान नहीं था। पिता के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे अपने बेटे को अमेरिका पढ़ाई के लिए भेज सके।

पढ़ने के लिए काफी मेहनत की
गुरदेव सिंह ने अपने दोस्तों, रिश्तेदारों से कुछ पैसे जुटाकर इंग्लैंड चले गए जहां उन्होंने मेहनत करके इतनी धनराशि जुटाई, जिससे वे अमेरिका जाकर वहां के विश्वविद्यालय में दाखिला ले सके। उन्होंने कोशिश करके अमेरिका के कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी डेविस में साल 1957 में जेनेटिक्स में दाखिला लिया। उनके अच्छे ग्रेड को देखकर प्रोफेसर ने एमएससू किए बगैर सीधे पीएचडी करने की अनुमति दे दी। उन्होंने 1960 में जेनेटिक्स में पीएचडी की। इसके बाद उन्हें विश्वविद्यालय में ही नौकरी मिल गई। यहां से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 87 साल के गुरदेव सिंह खुश हाल ही में भारत की हरित क्रांति हब का रूपांतरण पर आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी में शामिल होने के लिए पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू), जहां से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की थी, आए थे। उन्होंने अपने पुराने दिनों के याद करते हुए कहा कि, उस समय पंजाब में चावल की ज्यादा फसलें नहीं उगाई जाती थीं। सिर्फ नदियों के आस-पास के निचले इलाकों में खेती की जाती थी, जो एक किसान के अपने परिवार के भरण-पोषण तक ही सीमित था।

डॉक्टर नहीं बने पाए लेकिन अफसोस नहीं
डॉक्टर खुश बताते हैं कि, उन्हें जीवन में कभी भी डॉक्टर नहीं बनने का अफसोस नहीं हुआ। क्योंकि वे आज अपने पिता के दिखाए राह पर चलकर कृषि के क्षेत्र में जिन बुलंदियों को हासिल किया है वो शायद डॉक्टर बनकर कभी भी पुरा नहीं कर पाते।
(Photo Credit : Social Media)












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