मोदी सरकार से बदला? जर्मनी ने रोकी भारत को अर्जुन टैंकों की इंजन की सप्लाई, चीन से तनाव के बीच बड़ा झटका
Germany Delays Arju Tank Engine: लड़ाइयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए बनाए गये भारत के अर्जुन टैंक प्रोजेक्ट को जर्मनी ने बहुत बड़ा झटका दिया और ऐसे संकेत मिल रहे हैं, कि अर्जुन टैंक के लिए इंजनों की डिलवरी में कम से कम चार सालों का देरी हो सकती है, जो भारत के लिए बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है।
भारत के अर्जुन मुख्य युद्धक टैंक का उत्पादन इतिहास उतार-चढ़ाव वाला रहा है। हालांकि, दावा तो किया गया है, कि MTU मिसाइल प्रोडक्शन की वजह से अर्जुन टैंक की इंजनों के निर्माण में देरी हो रही है, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है, कि ये देरी मोदी सरकार के खिलाफ बदले की कार्रवाई हो सकती है।

हालांकि, जर्मनी में इंजन निर्माण में हो रही देरी भारत में स्वदेशी इंजन के निर्माण का दरवाजा खोल सकता है, लेकिन इसके लिए काफी ज्यादा मेहनत और टेक्नोलॉजी हासिल करने की जरूरत होगी।
भारत ने अपने अर्जुन टैंक के बेड़े को विस्तार देने के लिए काफी संघर्ष किया है और किसी हथियार के लिए भारत का ये सबसे ज्यादा समय तक चलने वाला संघर्ष है, क्योंकि इसे इतनी शक्तिशाली बनाया जा रहा है, कि ये दुश्मन खेमे में तबाही मचा सकता है। जर्मनी ने संकेत दिए हैं, कि अर्जुन मार्क 1 ए टैंक के लिए आवश्यक, महत्वपूर्ण इंजन प्रदान करने में लगभग चार साल की देरी हो सकती है, जो भारत के MBT प्रोग्राम के ऊपर काला साया जैसा है।
भारत का अर्जुन टैंक प्रोजेक्ट क्या है?
साल 2021 में भारत ने 118 अर्जुन मार्क 1-A मेन बैटल टैंक (एमबीटी) के लिए 7,523 करोड़ रुपये, यानि करीब 900 मिलियन डॉलर का ऑर्डर दिया था, और इस टैंक को अकसर 'हंटर किलर' कहा जाता है।
अर्जुन एमके-1ए, अर्जुन एमके-1 मुख्य युद्धक टैंक का एडवांस वेरिएंट है, जो वर्तमान में भारतीय सेना की सक्रिय सेवा कर रहा है। अर्जुन मार्क 1-ए, मार्क-1 से ज्यादा अपडेटेड और ए़डवांस है और इसमें कई स्वदेशी उपकरण लगाए गये हैं, लिहाजा इसकी मारक क्षमता काफी ज्यादा होने के साथ साथ शक्तिशाली 120 मिमी राइफल वाली बंदूक और कंचन कवच जैसी नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है।
इन शक्तिशाली मशीनों का निर्माण चेन्नई के अवदी में भारी वाहन फैक्ट्री में किया जाता है। हालांकि, इंजन की उपलब्धता में कमी के कारण इन टैंकों की समय पर डिलीवरी फिलहाल खतरे में पड़ गई है। इन टैंकों के बाकी हिस्सों का निर्माण भारत में होता है, जबकि जर्मनी की हथियार कंपनी से इनकी इंजनों की सप्लाई की जाती है। और कंपनी ने ऑर्डर पूरा करने में काफी देरी का संकेत दिया है, जिससे निर्धारित डिलीवरी के लिए चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
ANI ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, कि जर्मन कंपनी से कम से कम 4 सालों की देरी के संकेत मिले हैं। हालांकि, भारत के पास पहले अर्जुन टैंक के पहले ही कई इंजनों की डिलीवरी हो चुकी है और रिपोर्ट के मुताबिक, कम से कम 118 नये टैंकों के निर्माण पर असर नहीं पड़ेगा।

क्या भारत बनाएगा अपना स्वदेशी इंजन?
हालांकि, जर्मनी की कंपनी से इंजन निर्माण में मिले देरी के संकेत का फायदा उठाने की कोशिश भारत में की जा रही है और इस प्रोजेक्ट में शामिल भारत की कंपनी अर्जुन मार्क 1ए टैंकों को शक्ति देने के लिए उपयुक्त स्वदेशी इंजन तैयार करने की कोशिश में जुट गई है।
इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक, रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने एक स्वदेशी समाधान विकसित करने के लिए एक परियोजना शुरू की है, जिसके तीन साल के भीतर उत्पादन के लिए तैयार होने की उम्मीद है।
DATRAN 1500 इंजन, जिसे शुरुआत में फ्यूचरिस्टिक मेन बैटल टैंक प्रोग्राम के लिए डिजाइन किया गया था, वर्तमान में उसका इंजन अर्जुन टैंकों के निर्माण में किया जा सकता है। नए इंजन ने पिछले साल भविष्य के टैंक कार्यक्रम के हिस्से के रूप में अपने टेस्ट का पहला स्टेप पास कर लिया है।
जर्मनी ने इंजन सप्लाई में देरी क्यों की?
ये कोई पहली बार नहीं है, जब जर्मनी ने इंजनों की आपूर्ति को लेकर धोखा दिया है। यह पहले भी झटके दे चुका है। इससे पहले भी जर्मन सरकार ने भारत को इंजन निर्यात के लिए BAFA (फेडरल ऑफिस फॉर इकोनॉमिक अफेयर्स एंड एक्सपोर्ट कंट्रोल) की मंजूरी रोक दी थी, जिससे स्वदेशी जोरावर लाइट टैंक प्रोटोटाइप का निर्माण प्रभावित हुआ था।
जिसके बाद भारत को अक्टूबर 2023 में टैंक इंजनों के लिए अमेरिकी कंपनी कमिंस की ओर रुख करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। उस समय, जर्मनी ने भारत को टैंक इंजनों की आपूर्ति रोकने के फैसले के पीछे के कारणों की जानकारी नहीं दी थी और अगर दी भी होगी, तो उसे सार्वजनिक नहीं किया गया।
जर्मनी हथियारों के निर्यात को नियंत्रित करने वाले कड़े नियमों का पालन करता है, जिसमें मानवाधिकार, क्षेत्रीय स्थिरता और संघर्ष क्षेत्रों जैसे विचारों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। ये नियम उस समय की मौजूदा राजनीतिक और सुरक्षा स्थितियों से प्रभावित होकर कभी-कभी प्रतिबंध लगा देते हैं या हथियारों की बिक्री में देरी कर देते हैं।
पहले भी मानवाधिकार और अल्पसंख्यकों को लेकर जर्मनी ने भारत को आंख दिखाने की कोशिश की थी, जिसका भारत ने उसी भाषा में जवाब दिया थे।
हो सकता है, कि भारत के साथ भी यही सलूक किया जा रहा हो, लेकिन हमें इसकी सटीक जानकारी नहीं है। हालांकि, कई दूसरे वजह भी हो सकते हैं, जैसे जर्मनी की आंतरिक उद्योग में आई चुनौतियां, या फिर ऑर्डर की गई इकाइयों की कम संख्या शामिल हो सकती है।
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