मुसलमान हैं नापसंद, अगर फ्रांस की राष्ट्रपति बनीं मरीन ले पेन, तो भारत से संबंधों पर क्या होगा असर?
फ्रांस चुनाव में रविवार यानि 24 अप्रैल को वोटों की गिनती होगी और तय किया जाएगा, कि फ्रांस का अगला राष्ट्रपति कौन बनेगा। फ्रांस के मौजूदा राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों मध्यवर्गीय राजनीति का बड़ा चेहरा माने जाते हैं....
पेरिस, अप्रैल 22: फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव के लिए वोटिंग दिलचस्प मोड़ है और देश का अगला राष्ट्रपति कौन बनेगा, इसका फैसला 24 अप्रैल को वोटों की गिनती के साथ हो जाएगा, लेकिन फ्रांस राष्ट्रपति चुनाव-2022 काफी कड़ी टक्कर में पहुंच चुका है। राष्ट्रपति चुनाव में मुख्य मुकालबा दक्षिण पंथी उम्मीदवार मरीन ले पेन की दूसरी बार इमैनुएल मैक्रॉन के बीच है और पहले दौर की वोटिंग में मैक्रों को 27.8 प्रतिशत वोट हासिल हुए हैं, तो मरीन ले पेन को 23.2 प्रतिशत वोट मिले हैं, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, दूसरे फेज की वोटिंग में दक्षिणपंथी उम्मीदवार मरीन ले पेन ने मैक्रों पर भारी बढ़त बना सकती हैं, लिहाजा कहना मुश्किल हो गया है, कि कौन विजेता होगा। मैंक्रों के रहते भारत और फ्रांस के संबंध काफी मजबूत हुए हैं, लेकिन अगर मरीन ले पेन फ्रांस की अगली राष्ट्रपति बनती है, तो फिर दोनों देशों के संबंध कैसे होंगे? आइये समझने की कोशिश करते हैं।

24 अप्रैल को वोटों की गिनती
फ्रांस चुनाव में रविवार यानि 24 अप्रैल को वोटों की गिनती होगी और तय किया जाएगा, कि फ्रांस का अगला राष्ट्रपति कौन बनेगा। फ्रांस के मौजूदा राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों मध्यवर्गीय राजनीति का बड़ा चेहरा माने जाते हैं, लेकिन उनका भी झुकाव दक्षिणपंथी राजनीति की तरफ रहा है। जब धूर दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन ने चुनाव प्रचार के दौरान खुलकर मुसलमानों के खिलाफ राजनीति की है, जिसमें उनका 'हिजाब पहनने पर जुर्माना' लगाने वाले बयान ने पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थीं। वहीं, वहीं बात अर्थव्यवस्था की करें, तो मरीन ले पेन अगर राष्ट्रपति बनती हैं, तो उनकी संरक्षणवादी विचारधारा भविश्य में यूरोपीय संघ के साथ फ्रांस के व्यापारिक रिश्तों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं।

नई दिल्ली-पेरिस संबंध
इमैनुएल मैक्रों के शासनकाल में नई दिल्ली और पेरिस के संबंध काफी नजदीक हो गये हैं और चूंकी यूरोपीय संघ की अध्यक्षता इस वक्त फ्रांस के बी पास है, लिहाजा फ्रांस अध्यक्षता में भारत-यूरोपीय संघ के संबंधों को और मजबूत करने की क्षमता है। इसके साथ ही, फ्रांस के लिए इंडो-पैसिफिक क्षेत्र एक भौगोलिक वास्तविकता है, जहां वैश्विक अर्थव्यवस्था का गुरुत्वाकर्षण केंद्र अटलांटिक से प्रशांत क्षेत्र में ट्रांसफर हो गया है। वहीं, फ्रांस यूरोप का इकलौता ऐसा देश है, जिसकी विदेश नीति पर अमेरिका का प्रभाव सबसे कम होता है और फ्रांस की कोशिश अमेरिकी प्रभाव से इतर इंडो-पैसिफिक में भारत के साथ संबंधों को विस्तार देने की रही है।
फ्रांस और इंडो-पैसिफिक

फ्रांस और इंडो-पैसिफिक
वहीं, G20 के छह सदस्य देश, ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, इंडोनेशिया, जापान और दक्षिण कोरिया, इंडो पैसिफिक में ही स्थित हैं और हिंद महासागर और दक्षिण पूर्व एशिया के माध्यम से यूरोप और फारस की खाड़ी को प्रशांत महासागर से जोड़ने वाले समुद्री व्यापार मार्ग इस लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं। लिहाजा, फ्रांस और भारत के संबंध इस लिहाज से इंडो पैसिफिक में काफी जरूरी हो जाते हैं। वहीं, हिंद प्रशांत क्षेत्र निवेश और व्यापार के लिहाज से आने वाले वक्त में वैश्वीकरण के शीर्ष पर होगा। वहीं, अब तक के उदाहरणों से पता चलता है कि, इंडो-पैसिफिक के लिए जो भी अंतर्राष्ट्रीय कदम उठाए गये हैं, उनमें फ्रांस हमेशा से आगे रहा है और इंटरनेशनल सोलर अलायंस, जो साल 2018 में भारत में लांच किया गया था, उसकी पहल भी फ्रांस ने ही की थी।

व्यापार पर ले पेन के रुख पर सवाल
अगर पेरिस में नया राष्ट्रपति आता है, तो स्थिति तेजी से बदलेंगी। यूरोपीय संघ के साथ मरीन ले पेन की लड़ाई, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ गहरी दोस्ती का इतिहास और हाल ही में नाटो और रूस के बीच तालमेल के आह्वान ने सवाल खड़े किए हैं। राजनयिकों और सुरक्षा विशेषज्ञों की अलग-अलग धारणाएं हैं, कि राष्ट्रपति के बदलाव के साथ क्या-क्या हो सकता है, क्योंकि भारत यूरोपीय संघ की नई जारी इंडो-पैसिफिक रणनीति में जापान जैसे पुराने और विश्वसनीय भागीदारों के साथ प्रमुखता से शामिल है, लिहाजा अगर मरीन ले पेन फ्रांस की राष्ट्रपति बनती हैं, तो इससे भारत भी प्रभावित होगा। फ्रांस में भारत के पूर्व राजदूत मोहन कुमार ने 'डीडब्ल्यू' को बताया कि, 'मुझे लगता है कि मैक्रों जीतेंगे, लेकिन 2017 की तुलना में कम अंतर से जीतेंगे।"

मरीन ले पेन भी जीत सकती हैं
पेरिस स्थित मार्केट रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन इप्सोस के अनुसार, हालांकि यह दूसरे दौर में एक कड़ी टक्कर है, लेकिन, मैक्रोन को 54% तो मरीन को 46% तक पसंद किया जा रहा है। पूर्व राजदूत मोहन कुमार कहते हैं कि, "ली पेन की जीत की अप्रत्याशित घटना में भी मुझे फ्रेंको-भारतीय राजनीतिक, रणनीतिक और रक्षा संबंधों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं दिखता है। हालांकि, व्यापार संबंधों में कुछ बदलाव हो सकते हैं। आव्रजन नियम भी बदल सकते हैं, लेकिन यह कुछ ऐसा है जो सभी देशों के साथ होगा, ना कि सिर्फ भारत को ही एडस्ट करना होगा'। वहीं, दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कूटनीति और निरस्त्रीकरण के असिस्टेंट प्रोफेसर हैप्पीमन जैकब ने डीडब्ल्यू को बताया कि, मैक्रों के शासनकाल में भारत-फ्रांस संबंध नई ऊंचाइयों पर पहुंचा है, जो कि विचारशील लेकिन वास्तविक हैं।

चीन का मुकाबला करने की प्रतिबद्धता?
जेएनयू के असिस्टेंट प्रोफेसर जैकब बताते हैं कि, "ली पेन की बयानबाजी के अनुसार, मैं इस बात से चिंतित हूं कि फ्रांस इंडो-पैसिफिक के लिए कितना प्रतिबद्ध होगा और चीनी खतरे का मुकाबला कितना करेगा? खासकर ऐसे समय में जब भारत में चिंताएं हैं कि यूक्रेन युद्ध में अमेरिका और पश्चिमी देश इतने व्यस्त हो गये हैं, कि इंडो- पैसिफिक की चिंताओं की अनदेखी कर रहे हैं'। प्रोफेसर जैकब ने संदेह जताते हुए कहा कि, 'मुझे संदेह है कि यूरोपीय संघ से दूर जाने वाले फ्रांस का भारत के लिए कोई तत्काल या प्रत्यक्ष प्रभाव होगा, यह देखते हुए कि भारत और फ्रांस के बीच हमेशा मजबूत द्विपक्षीय संबंध रहे हैं।

फ्रांस, भारत और यूरोप
दूसरे शब्दों में कहें तो भारत-फ्रांस द्विपक्षीय संबंध यूरोपीय संघ के सदस्य के रूप में फ्रांस के साथ भारत के संबंधों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। वहीं, मरीन ले पेन बार बार नाटो से फ्रांस को बाहर लाने की बात कर चुकी हैं, वहीं, यूरोपीय संघ के बजट में फ्रांस के हिस्से को कम करने की धमकी भी वो कई बार दे चुकी हैं। वहीं, वो पहले "फ़्रेक्सिट" (ईयू से फ्रांस के निकलने की बात) में रुचि जाहिर कर चुकी हैं, हालांकि बाद में उन्होंने फ्रांस के यूरोपीय संघ से बाहर निकलने पर अपनी राय को संशोधित कर लिया था। अगर फ्रांस यूरोपीय संघ से बाहर निकलने की कोशिश करता है, तो ये भारत के लिए बड़ा झटका होगा, क्योंकि ब्रिटेन पहले ही यूरोपीय संघ से बाहर आ चुका है।

भारत और फ्रांस की साझेदारी
फरवरी में पेरिस में आयोजित इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग के लिए मंत्रिस्तरीय फोरम में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था, कि फ्रांस के साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक क्षेत्रीय व्यवस्था बनाए रखने में 'बहुपक्षवाद' का वादा पूरा करने के लिए यूरोप को भारत से जोड़ने के लिए फ्रांस एक महत्वपूर्ण पुल है। जयशंकर ने कहा था कि, 'सुरक्षा के मामले में फ्रांस पहले से ही भारत के प्रमुख साझेदारों में से एक है'।

ईयू में भारत के लिए फ्रांस अहम
उन्होंने कहा कि, यूरोपीय संघ के साथ भारत की स्थिति अब साझेदारी तक ऑपरेशन के स्तर तक पहुंच चुकी है। इसके साथ ही मई 2021 में, भारत पहली बार बंगाल की खाड़ी में फ्रेंच ला पेरोस अभ्यास में शामिल हुआ था, जिसमें अन्य क्वाड सदस्यों की नौसेनाएं भी शामिल थीं। वहीं, भारतीय और फ्रांसीसी नौसेनाओं ने भी इस क्षेत्र में कई बहुपक्षीय अभ्यासों में भाग लिया है। दोनों देशों के बीच एक लंबे समय से चली आ रही 'रेग्यूलर मेरिटाइम सिक्योरिटी डायलॉग' भी है, जिसे 2016 में स्थापित किया गया था और दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों और रक्षा मंत्रियों के बीच लगातार बैठकें होती रहती हैं। लिहाजा, विशेषज्ञों का मानना है कि, फ्रांस में अगर राष्ट्रपति बदलता है, तो भारत की यूरोपीय देशों में स्थिति प्रभावित होगी और चीन को लेकर फ्रांस का नजरिए में भी परिवर्तन आ सकता है।












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