जिस अर्थशास्त्री ने की थी 2008 आर्थिक मंदी की भविष्यवाणी, उन्होंने 2022 के लिए दी डरावनी चेतावनी
जब दुनिया के एक बार फिर से आर्थिक मंदी की चपेट में आने की आशंका है, तो नूरील रूबिनी का मानना है, कि सरकारों के पास ज्यादा विकल्प नहीं होंगे और सरकारें इस स्थिति में नहीं होंगी, कि वो राजकोषीय पैकेज का ऐलान कर सके।
वॉशिंगटन, सितंबर 23: अमेरिका समेत कई बड़े देश आर्थिक मंदी की चपेट में पहले से ही आए हुए हैं और अब मशहूर अर्थशास्त्री नूरील रूबिनी ने साल 2022 के लिए डराने वाली चेतावनी जारी है। नूरील रूबिनी वही अर्थशास्त्री हैं, जिन्होंने सबसे पहले 2008 में आने वाले वित्तीय संकट की सटीक भविष्यवाणी की थी और उन्होंने जब आर्थिक संकट के बारे में सबसे पहले बात की थी, तो किसी ने उनकी बातों को सीरियस तरीके से नहीं लिया, लेकिन उसके बाद उनकी एक एक बात सही साबित हुई और अमेरिका में कई बैंक बंद हो गये और दुनिया में हजारों व्यवसाय हमेशा के लिए बंद हो गये। कई उद्योगपतियों ने तो खुदकुशी तक कर ली और कितने लाख लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा, इसकी कोई गणना नहीं है।

2022 के लिए डरावनी चेतावनी
अर्थशास्त्री नूरील रूबिनी ने अमेरिका में और विश्व स्तर पर 2022 के अंत में एक "लंबी और बदसूरत" मंदी की चेतावनी दी है और उन्होंने कहा है, कि ये आर्थिक मंदी 2023 तक चल सकती है। रूबिनी मैक्रो एसोसिएट्स के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी रूबिनी ने सोमवार को एक इंटरव्यू में कहा कि, "यहां तक कि एक सामान्य मंदी में भी एसएंडपी 500 अंकों तक, यानि 30 प्रतिशत तक गिर सकता है।" उन्होंने कहा कि, "एक वास्तविक हार्ड लैंडिंग" में, जिसकी उन्हें उम्मीद है, एसएंडपी में 40 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है।

2007-08 की सटीक भविष्यवाणी
नूरील रूबिनी को उनकी 2008 की सटीक भविष्यवाणी के लिए डॉ. डूम का उपनाम दिया गया था और उन्होंने 2007 में भयानक हाउसिंग बबल एक्सीडेंट होने की चेतावनी दी थी और उन्होंने अमेरिकी कारोबारियों और सरकार से फौरन इसे संभालने की कोशिश में लग जाने को कहा था, लेकिन उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया, जिसका नतीजा आज भी पूरी दुनिया भुगत रही है। 2008 में अमेरिका में हाउसिंग इंटस्ट्री में बवाल मच गया था और अब उन्होंने कहा था, कि उथली अमेरिकी मंदी की उम्मीद करने वालों को निगमों और सरकारों के बड़े ऋण अनुपात को देखना चाहिए। जैसे-जैसे दरें बढ़ती हैं, वैसे वैसे कर्ज चुकाने की लागत बढ़ती जाती है। उन्होंने कहा था कि, "कई संस्थान ऐसे हैं, जो इस आर्थिक संकट की भेंट चढ़ जाएंगे, जिनमें बैंक्स भी शामिल होंगे और आर्थिक संकट में देश के कॉर्पोरेट, बैंक्स फंसने वाले हैं, जिसकी कीमत पूरे देश को चुकानी होगी। उन्होंने कहा था कि, हाउसिंग सेक्टर पूरी तरह से बिखड़ जाएगा और हम देखेंगे, कि आखिर उस आर्थिक संकट में कौन तैर कर बाहर आता है।

नई चेतावनी में नूरील ने क्या कहा?
नूरील रूबिनी ने बुल मार्केट और बीयर मार्केट का हवाला देकर नई चेतावनी जारी की है और कहा है कि, वैश्विक ऋण स्तर, शेयरों को नीचे खींचने वाले हैं और हार्ड लैंडिंग के 2 प्रतिशत मुद्रास्फीति दर हासिल करना फेडरल रिजर्व (अमेरिकी मुख्या बैंक) के लिए "मिशन असंभव" होने जा रहा है। उन्हें मौजूदा बैठक में 75 आधार अंक और नवंबर और दिसंबर दोनों में 50 आधार अंकों की वृद्धि की उम्मीद है। इससे फेड फंड की दर साल के अंत तक 4 फीसदी से 4.25 फीसदी के बीच हो जाएगी। हालांकि, और विशेष रूप से लेबर एंड सर्विस सेक्टर में मुद्रास्फीति की काफी ज्यादा वृद्धि की आशंका जताई है। इसके अलावा उन्होंने, यूक्रेन युद्ध और कोविड महामारी को भी जिम्मेदार ठहराया है।

सरकारों के पास ज्यादा ऑप्शन नहीं
अब जब दुनिया के एक बार फिर से आर्थिक मंदी की चपेट में आने की आशंका है, तो नूरील रूबिनी का मानना है, कि सरकारों के पास ज्यादा विकल्प नहीं होंगे और सरकारें इस स्थिति में नहीं होंगी, कि वो राजकोषीय पैकेज का ऐलान कर सके। क्योंकि ज्यादातर देशों की सरकारें पहले ही भारी कर्ज में डूबी हुई हैं और वो भीषण राजकोषीय घाटे से जूझ रही हैं और ऐसे में उच्च मुद्रास्फीति का मतलब यह भी होगा, कि "यदि आप राजकोषीय प्रोत्साहन करते हैं, तो आप कुल मांग को बढ़ा रहे हैं।" नतीजतन, रूबिनी 1970 के दशक की तरह एक गतिरोध और वैश्विक वित्तीय संकट के रूप में बड़े पैमाने पर ऋण संकट की भविष्यवाणी की है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि, जो आर्थिक मंदी आने वाली है, वो कोई छोटी मंदी नहीं होगी और ना ही ये कम दिनों के लिए होगी, बल्कि यह काफी गंभीर और काफी बदसूरत होने वाली है। उन्होंने कहा कि, साल 2023 तक ये आर्थिक मंदी जारी रह सकती है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा, कि सप्लाई शॉक और फाइनेंशियल डिस्ट्रेस कितना गंभीर है। 2008 आर्थिक मंदी की वजह हाउसिंग सेक्टर का बिखरना था, लेकिन इस बार के आर्थिक संकट के पीछे हाउसिंग और बैंक्स के अलावा निजी इक्विटी फंड, निजी इक्विडी क्रेटिड फंड भी वजह होंगे।

कई वजहों से आर्थिक मंदी
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि, तेल संकट की वजह से मुद्रास्फीति काफी बढ़ी है और इसने देशों के राजकोषीय घाटे को काफी ज्यादा बढ़ा दिया है, वही मौद्रिक नीति ने भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बहुत खतरनाक दलदल में धकेल दिया है। इसके लिए अर्थशास्त्रियों का कहना है, कि 1979 के पॉल वोल्कर नीति को सरकारों को अपनाना चाहिए, जो गंभीर कदम होगा। साल 1979 में पॉल वोल्कर नीति के तहत सरकार ने फेड रिजर्व का अधिग्रहण नहीं किया, बल्कि दोहरे अंकों में पहुंच चुकी मुद्रास्फीति को रोकने के लिए ब्याज दरों को 20 प्रतिशत तक बढ़ा दिया गया और इसकी वजह से साल 1981-82 के चर्चित आर्थिक मंदी से बाहर निकलने का रास्ता मिल गया। दुनियाभर के अर्थशास्त्री भी आज पॉल वोल्कर नीति के मुताबिक ही ब्याज दरों में भारी इजाफा करने की मांग कर रहे हैं, ताकि आपूर्ति को सख्ती के साथ नियंत्रित किया जाए और अर्थव्यवस्था को जान-बूझकर धीमा कर दिया जाए। हालांकि, ये नीति जोखिमों से भरी हुई है, लेकिन अर्थशास्त्रियों का मानना है, कि असल में हम करो या मरो की स्थिति में फंस गये हैं।












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