पृथ्वी की सतह से 660 किलोमीटर नीचे एक विशाल 'महासागर' की खोज, एक दुर्लभ हीरे में छिपा था ये 'रहस्य'
वाशिंगटन, 29 सितंबर: अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने पता लगाया है कि धरती की बहुत ही ज्यादा गहराई में भी एक 'महासागर' समाया हुआ है, जिसमें इतना पानी जमा है, जिसमें हमारे मौजूदा 6 महासागर समा सकते हैं। रिसर्च टीम इस अभियान पर 2014 से भी पहले से लगी हुई थी, लेकिन अब उन्हें इसका ठोस आधार मिल गया है और बोत्सवाना के एक दुर्लभ में से भी दुर्लभ हीरे में छिपे रहस्यों ने उन्हें उस विशाल 'महासागर' तक पहुंचने में मदद की है। यह शोध धरती की गहराइयों में छिपे अनंत रहस्यों पर से भी भविष्य में पर्दा उठाने में सक्षम साबित हो सकता है।

पृथ्वी के 660 किलोमीटर नीचे विशाल 'महासागर' की खोज
पृथ्वी के ऊपरी और नीचले आवरण के बीच ट्रांजिशन जोन में बहुत ही विशाल मात्रा में 'पानी' का भंडार है। यह जानकारी एक अंतरराष्ट्रीय शोध से मिला है। इस रिसर्च के लिए शोधकर्ताओं ने धरती की सतह से 660 किलोमीटर नीचे से मिले एक दुर्लभ हीरे की जांच की है। इस शोध के लिए रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी और एफटीआईआर स्पेक्ट्रोमेट्री तकनीकों का भी इस्तेमाल हुआ है। यह शोध उस दावे की पुष्टि करता है, जो सिद्धांत के तौर पर लंबे समय से मौजूद रहा है। यानी समुद्र का काफी पानी धीरे-धीरे पृथ्वी के अंदरूनी हिस्से में भी जमा होता है। यह एक बहुत ही बड़ी खोज है।

पृथ्वी के चल चक्र का हो सकता है विस्तार!
नई खोज का अर्थ हुआ कि पृथ्वी के चल चक्र में इसका बहुत भीतरी भाग भी शामिल है। फ्रैंकफर्ट के गोएथे यूनिवर्सिटी में भूविज्ञान संस्थान के प्रोफेसर फ्रैंक ब्रेंकर इसके बारे में बताते हैं, 'खनिज में हुआ यह परिवर्तन मेंटल में चट्टान की आवाजाही को बहुत ज्यादा प्रभावित करता है।' उन्होंने कहा है, 'ये तलछट बड़ी मात्रा में पानी और कार्बन डायऑक्साइड रख सकते हैं। लेकिन अभी तक ये स्पष्ट नहीं था कि अधिक स्थिर, हाइड्रस खनिजों और कार्बोनेट के रूप में ट्रांजिशन जोन में कितना प्रवेश करता है- और इसलिए यह भी स्पष्ट नहीं था कि क्या बड़ी मात्रा में पानी सही में वहां पर मौजूद है।'

सैद्धांतिक दावों पर मुहर लगी
वैज्ञानिकों के मुताबिक अभी की परिस्थितियां वहां बड़ी मात्रा में पानी की मौजूदगी बताती है। घने खनिज जैसे कि रिंगवूडाइट बड़ी मात्रा में पानी जमा रख सकते हैं। यह (ट्रांजिशन जोन में) पानी की इतनी बड़ी मात्रा हो सकती है कि सैद्धांतिक तौर पर हमारे महासागरों के 6 गुना ज्यादा तक हो सकता है। ब्रेंकर का कहना है, 'इसलिए ये तो हम जानते थे कि सीमा की परत में पानी के भंडारण की बहुत बड़ी क्षमता रहती है...' 'लेकिन, हम यह नहीं जानते थे कि वास्तव में ऐसा है।' लेकिन, नई रिसर्च से सारी गुत्थी सुलझ गई है।

बोत्सवाना में मिला वह दुर्लभ हीरा
शोधकर्ताओं को यह कामयाबी अफ्रीकी देश बोत्सवाना के एक दुर्लभ हीरे के विश्लेषण से मिली है। यह हीरा धरती की 660 किलोमीटर की गहराई में बनी थी। यह क्षेत्र पृथ्वी के ऊपरी और नीचले आवरण के बीच ट्रांजिशन जोन वाला हिस्सा है। इस क्षेत्र का हीरा बहुत ही दुर्लभ है और बहुत ही गहराई से मिलने वाले हीरे में से भी यह सिर्फ 1 फीसदी वाले में से शामिल है। इस पत्थर में बहुत ज्यादा रिंगवूडाइट हैं, जो कि बहुत ज्यादा मात्रा में पानी का संकेतक है।

जलयुक्त चट्टानों ने धरती के अंदरूनी भाग को लेकर बदली सोच
यही नहीं रिसर्च ग्रुप ने पत्थर की रासायनिक संरचना को भी निर्धारित किया है। यह लगभग वैसा ही था जैसा कि दुनिया में कहीं भी बेसाल्ट में पाए जाने वाले मेंटल रॉक के लगभग हर टुकड़े में होता है। इससे पता चलता है कि हीरा निश्चित तौर पर पृथ्वी के मेंटल के सामान्य हिस्से से निकला है। प्रोफेसर फ्रैंक ब्रेंकर ने कहा कि 'इस शोध से पता चलता है कि ट्रांजिशन जोन सूखे स्पंज की तरह नहीं है, बल्कि यहां बहुत अधिक मात्रा में पानी जमा है।' उन्होंने कहा,'ये हमें जूल्स वर्ने के धरती के भीतर एक महासागर के विचार के एक कदम और नजदीक लाता है।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अंतर यह है कि यह बिल्कुल महासमुद्र तो नहीं है, लेकिन जलयुक्त चट्टान की तरह है, जो हमें ना तो गीला महसूस होगा और ना ही उससे पानी टपकता दिखेगा।

2014 में भी मिला था ऐसा दुर्लभ हीरा
हाइड्रस रिंगवूडाइट पहली बार 2014 में भी हीरे की शक्ल में ट्रांजिशन जोन से मिला था और उस शोध में भी ब्रेंकर शामिल थे। लेकिन, वह इतना छोटा था कि उसके रासायनिक संरचना का पता लगाना संभव नहीं था। लेकिन, अब बोत्सवाना से मिले जिस हीरे पर रिसर्च हुआ है, वह 1.5 सेंटीमीटर का है, यह इतना बड़ा है, जिससे इसकी रासायनिक संरचना स्थापित करना आसान है और इससे 2014 के शुरुआती जानकारी की पुष्टि करने में मदद मिली है।

पृथ्वी विज्ञान को मिलेगी नई दिशा
यह एक ऐसा शोध है, जो भविष्य में पृथ्वी के अंदर छिपे रहस्यों की और परतें खोल सकता है। भविष्य में यह पृथ्वी विज्ञान को नई दिशा दे सकता है और विभिन्न तरह के खनिजों के निर्माण, चट्टानों के निर्माण की प्रक्रिया पर भी नई रोशनी डाल सकता है। जाहिर है कि इस शोध ने आगे और कई तरह की रिसर्च के लिए रास्ता खोल दिया है। (इनपुट-एएनआई और तस्वीरें-प्रतीकात्मक)












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