Diego Garcia: भारत के नीचे वो आईलैंड जिसके लिए भिड़े ब्रिटेन और अमेरिका, 1947 से अब तक पूरा समझें
Diego Garcia: भारत से 1796 किलोमीटर दूर हिंद महासागर के दक्षिण में स्थित डिएगो गार्सिया (Diego Garcia) इन दिनों ग्लोबल पॉलिटिक्स का बड़ा मुद्दा बना हुआ है। इसकी वजह है अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की वह चेतावनी, जिसमें उन्होंने यूनाइटेड किंगडम (UK) से कहा कि इस रणनीतिक आईलैंड हाथ से जाने न दें। इस आईलैंड पर एक बेहद स्ट्रेटजिक अमेरिकी-ब्रिटिश मिलिट्री बेस है। साथ ही, यूके और मॉरीशस के बीच इसके भविष्य के नियंत्रण और 100 साल की लीज़ को लेकर बातचीत चल रही है।
चैप्टर-1: समझौते का प्लान?
प्रस्तावित समझौते के मुताबिक, ब्रिटेन चागोस आईलैंडों की संप्रभुता मॉरीशस को सौंप देगा। बदले में, यूके डिएगो गार्सिया को 100 साल के लिए लीज़ पर लेगा ताकि वहां का सैन्य अड्डा चालू रहे। इस पूरे सौदे पर लंदन को लगभग 35 बिलियन पाउंड (.3.8 लाख करोड़ भारतीय रुपए) खर्च हो सकते हैं। ट्रम्प ने इस डील को मिलिट्री मिशन के लिए बेहद अहम बताते हुए कहा कि नियंत्रण ढीला करना 'बड़ी गलती' होगी।

चैप्टर-2: क्यों इतना खास है डिएगो गार्सिया?
डिएगो गार्सिया दुनिया के सबसे रणनीतिक सैन्य ठिकानों में गिना जाता है। इस मिलिट्री बेस को अमेरिका और ब्रिटेन साझा तरीके से चलाते हैं जो कि बॉम्बर ऑपरेशन, नौसैनिक मिशन, निगरानी उड़ानों और लॉजिस्टिक सपोर्ट के लिए इस्तेमाल होता है। हिंद महासागर में इसकी स्ट्रेटजिक लोकेशन अमेरिका को मध्य पूर्व, अफ्रीका और एशिया के बड़े हिस्सों में कम समय में मिलिट्री ऑपरेशन चलाने में मदद करती है। जिससे इन इलाकों में इन दोनों देशों के दुश्मन काबू में रहते हैं।
चैप्टर-3: युद्धों में इस्तेमाल और विनिंग फैक्टर
अफगानिस्तान और इराक युद्धों के दौरान अमेरिकी बॉम्बर जेट्स ने यहीं से उड़ान भरकर हमले किए थे। 1991 के खाड़ी युद्ध, 2001 के अफगानिस्तान युद्ध और 2003 के इराक युद्ध में भी इस मिलिट्री बेस ने निर्णायक भूमिका निभाई जो विनिंग फैक्टर साबित हुई। B-52 और B-2 जैसे अमेरिकी बॉम्बर जेट्स यहीं से ऑपरेट हुए। मौजूदा दौर में भी यह बेस मध्य पूर्व और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में तनावों की निगरानी में अहम भूमिका निभा रहा है।
चैप्टर-3: खासियत और कई देशों का लालच
डिएगो गार्सिया, चागोस आईलैंड समूह का सबसे बड़ा और एकांत आईलैंड है। यहां कोई नागरिक आबादी नहीं रहती। यह भारत से लगभग 1,796 किमी दक्षिण, अफ्रीका से 2,200 किमी पूर्व और ऑस्ट्रेलिया से 4,700 किमी पश्चिम में स्थित है। फिलहाल यह ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरिटरी के तहत यूके के कंट्रोल में है। इसकी लोकेशन एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक रणनीतिक लोकेशन पर है, जिससे नेवी के जहाज और एयरफोर्स के फाइटर जेट्स अलग-अलग क्षेत्रों को टारगेट किया जा सकता है। यही कई देशों के लालच की वजह भी है, कि किसी न किसी तरह डिएगो गार्सिया उन्हें मिल जाए।
चैप्टर-4: इतिहास और मॉरीशस का दावा
मॉरीशस का कहना है कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान चागोस आईलैंड्स को उससे अवैध रूप से अलग किया गया था, इसलिए उसकी संप्रभुता मान्य होनी चाहिए। ब्रिटेन ने भी मॉरीशस के दावे को माना है, लेकिन लीज़ के जरिए रक्षा उपयोग जारी रखने की योजना बनाई है। ब्रिटिश अधिकारियों का कहना है कि यह समझौता अड्डे की लंबे समय तक सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। चूंकि भारत भी ब्रिटिश औपनिवेशवाद का हिस्सा था तो भारत से ब्रिटेश अधिकारी भी यहां दखल देते थे। लेकिन 1947 में भारत आजाद हो गया और फिर 1965 में चागोस आईलैंड को भी ब्रिटेन ने मॉरीशस से अलग कर दिया। हालांकि भारत ने औपनिवेशवाद के समय से अभी तक इसे मॉरीशस का हिस्सा माना है।
चैप्टर-5: ट्रम्प का बयान और ब्रिटेन में विवाद
डोनाल्ड ट्रम्प ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर को निशाना बनाते हुए सोशल मीडिया पर इस योजना की आलोचना की।उन्होंने कहा कि मॉरीशस से आईलैंड को लीज़ पर लेना 'कमजोर नियंत्रण' साबित हो सकता है। ट्रम्प का तर्क था कि अगर ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की जरूरत पड़ी तो यह बेस बेहद अहम साबित होगा, इसलिए यूके को अपना नियंत्रण कमजोर नहीं करना चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी सरकार पहले ही यूके-मॉरीशस समझौते का समर्थन कर चुकी थी। ट्रम्प के बयान के बाद ब्रिटेन में राजनीतिक बहस तेज हो गई। हालांकि ब्रिटिश अधिकारियों ने कहा कि इंटरनेशनल प्रेशर को देखते हुए यही इकलौता और प्रैक्टिल रास्ता था जिससे अड्डे पर दोनों देशों का दखल बना रह सकता।
चैप्टर-5: चीन फैक्टर और इंडो-पैसिफिक की टेंशन
पिछले कुछ सालों में चीन ने हिंद महासागर में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है। ऐसे में डिएगो गार्सिया को अमेरिका का बड़ा रणनीतिक संतुलन माना जाता है। यह अड्डा नौसैनिक गतिविधियों, शिपिंग लेन और सैन्य मूवमेंट पर नजर रखने में मदद करता है। चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच यह बेस अमेरिका के लिए काउंटर-बैलेंस की तरह काम करता आया है। जब तक अमेरिका जैसे ताकतवर देश का दखल रहेगा तब तक चीन भी ज्यादा उपद्रव नहीं मचा सकेगा।
चैप्टर-6: भारत के लिए क्यों अहम है?
भारत के लिए डिएगो गार्सिया की अहमियत इसलिए ज्यादा है क्योंकि यह उसके रणनीतिक दायरे के काफी करीब है। मात्र 3-4 घंटे के फ्लाई टाइम में यहां पहुंचा जा सकता है। साथ ही, हिंद महासागर वैश्विक व्यापार का बड़ा रास्ता है और भारत की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इन्हीं समुद्री रास्तों से आता है। ऐसे में इस क्षेत्र में स्थिरता भारत के लिए बेहद जरूरी है। अगर इस क्षेत्र का इस्तेमाल जंग लड़ने में होता है तो भारत को काफी व्यापारिक घाटा झेलना पड़ सकता है। चीन-अमेरिका के तनाव के बीच भारत भी अपनी नौसैनिक ताकत बढ़ा रहा है, इसलिए डिएगो गार्सिया का भविष्य क्षेत्रीय भू-राजनीति पर सीधा असर डाल सकता है।
चैप्टर-7: डिएगो गार्सिया और हिंद महासागर का भविष्य
डिएगो गार्सिया सिर्फ एक आईलैंड नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का अहम केंद्र है। यूके-मॉरीशस समझौता, ट्रम्प की चेतावनी, चीन का बढ़ता प्रभाव और भारत की रणनीतिक चिंताएं- ये सब मिलकर इसे एक बड़ा जियो-पॉलिटिकल मुद्दा बनाते हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह डील किस दिशा व किस देश के पक्ष में जाती है और इसका असर हिंद महासागर की राजनीति पर क्या पड़ता है।
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