सीमा विवाद में क्या भारत को बड़ा नुकसान उठाकर समझौता करना पड़ा? चीन की सरकारी मीडिया का दावा
ग्लोबल टाइम्स ने भारत और चीन के बीच संबंधों में तनाव के पीछे भारत के 'अति-राष्ट्रवादियों' पर ठीकरा फोड़ा है और लिखा है कि, भारत के भीतर हमेशा चीन के प्रति एक द्वंद्व रहा है
बीजिंग, सितंबर 25: क्या चीन के साथ चल रहे सीमा विवाद में भारत को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है? ये सवाल इसलिए, क्योंकि चीन की सरकारी मीडिया और कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने ऐसा दावा किया है। ग्लोबल टाइम्स ने दावा किया है, कि भारत के साथ समझौते में चीन एक कदम भी पीछे नहीं हटी है। ग्लोबल टाइम्स ने कहा है कि, चीनी स्टेट काउंसलर और विदेश मंत्री वांग यी और भारतीय विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर, दोनों ने गुरुवार को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लिया, लेकिन आमने-सामने की बातचीत नहीं की। हाल के कई बहुपक्षीय अवसरों पर चीन और भारत के बीच कोई द्विपक्षीय बैठक नहीं हुई है। ग्लोबल टाइम्स ने अपने संपादकीय में कहा है कि, दोनों देशों के बीच संबंध वास्तव में सामान्य नहीं हुए हैं और "कठिन चरण" से बाहर नहीं हैं, हालांकि, कुछ सकारात्मक रुझान जरूर सामने आए हैं।

ग्लोबल टाइम्स का बड़ा दावा
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, दोनों देशों के बीच के संबंध में एक बड़ा डेवलपमेंट ये है, कि चीनी पीएलए और भारतीय सैनिकों ने कई दौर की सैन्य वार्ता के बाद 8 सितंबर को जियान डाबन (चीनी नाम) के क्षेत्र में विघटन शुरू कर दिया, जो सीमा स्थिरता की सामान्य दिशा में एक और कदम है। वहीं, बुधवार को भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि, "चीन के साथ हमारे (भारत) संबंध सामान्य होने के लिए यह महत्वपूर्ण है, कि सीमा विवाद का समाधान हो। इसलिए मुझे लगता है कि हमारा ध्यान वहीं है।" उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि, यह भारत और चीन के पारस्परिक हित में है कि वे एक-दूसरे को समायोजित करने का रास्ता खोजें, क्योंकि एशिया के उदय का पूरा विचार महाद्वीप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बिठाने पर निर्भर है। यह चीन की स्थिति के अनुरूप है, जिससे दोनों देशों के लिए संबंधों में और सुधार करना संभव हो गया है।

'मतभेद से ज्यादा महत्वपूर्ण साझा हित'
वहीं, इस साल जून में चीन में नए भारतीय राजदूत प्रदीप कुमार रावत से मुलाकात के दौरान चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि, चीन और भारत के बीच साझा हित उनके मतभेदों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं, और दोनों पक्षों को द्विपक्षीय संबंधों के समग्र हितों को ध्यान में रखना चाहिए, एक दूसरे को सफल होने में मदद करना चाहिए। एक-दूसरे के प्रति चौकन्ना रहने के बजाय सहयोग को मजबूत करें, और एक-दूसरे पर संदेह करने के बजाय विश्वास बढ़ाने की तरफ आगे बढ़ना चाहिए।' लेकिन, इसके बाद ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, ''लेकिन जब चीन-भारत संबंधों के बीच तनाव में कुछ कमी आई, तो चीन के खिलाफ भारत की घरेलू कट्टर आवाजें फिर से उठने लगी हैं। कुछ अति-राष्ट्रवादियों का मानना है कि, सीमा विघटन के मुद्दे पर "भारत को नुकसान हुआ", और कुछ लोगों ने मोदी सरकार पर "चीन को 1,000 वर्ग किमी क्षेत्र देने" का आरोप लगाया। उन्होंने भारत के लिए चीन के तथाकथित "समग्र खतरे" को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया और सरकार पर चीन के साथ सुलह का विरोध करने का दबाव डाला। वे यह नहीं कहेंगे कि क्या उन्हें चीन के साथ निरंतर टकराव से, या शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और चीन के साथ बढ़े हुए सहयोग से "नुकसान का सामना करना पड़ेगा"।

चीनी मीडिया का प्रोपेगेंडा जानिए
ग्लोबल टाइम्स ने भारत और चीन के बीच संबंधों में तनाव के पीछे भारत के 'अति-राष्ट्रवादियों' पर ठीकरा फोड़ा है और ग्लोबल टाइम्स ने अपने संपादकीय में लिखा है कि, 'इस वास्तविकता को स्वीकार करने से इनकार नहीं किया जा सकता है, कि भारत और चीन के बीच के जटिल संबंध का सामना करने से हम इनकार नहीं कर सकते हैं। लेकिन, एक तरफ, भारत के भीतर हमेशा चीन के प्रति एक द्वंद्व रहा है। जब भी दोनों देशों के बीच संबंध खराब होते हैं, कट्टरपंथी ताकतें हावी हो जाती हैं, और दूसरी तरफ, हमेशा ऐसी बुरी ताकतें हावी रही हैं, जो चीन और भारत को करीब नहीं देखना चाहतीं। हम उन्हें झाड़ू से कचरे की तरह साफ नहीं कर सकते। चीन-भारत संबंधों को इन आंतरिक और बाहरी गड़बड़ी पर काबू पाने और पार करते हुए स्वस्थ और स्थिर विकास प्राप्त करने की आवश्यकता है। चीन का रवैया स्पष्ट और दृढ़ है, लेकिन नई दिल्ली ने अतीत में घरेलू राष्ट्रवादी भावनाओं को भड़काने और उनका शोषण करने की भारी कीमत चुकाई है। यह नई दिल्ली के लिए एक रणनीतिक दायित्व है और इनका नुकाबला करके ही नई दिल्ली आगे बढ़ सकती है।"

'अप्रैल 2020 की स्थिति से पीछे नहीं हटेगा चीन'
चीन की सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने अपने संपादकीय में साफ शब्दों में लिखा है, कि चीन कथित अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति में नहीं लौटेगा। यानि, चीन ने अप्रैल 2020 में जितने हिस्से पर कब्जा कर लिया था, वो उस हिस्से से अब पीछे नहीं हटेगा। ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, 'आज, भारत में अभी भी कुछ लोग हैं जो सीमा मुद्दे के बारे में 'अवास्तविक कल्पनाएं' रखते हैं, और वे अक्सर "अप्रैल 2020 की यथास्थिति" पर वापस जाने की बात करते हैं। इस संबंध में चीन ने स्पष्ट कर दिया है, कि अप्रैल 2020 की तथाकथित यथास्थिति भारत द्वारा चीन और भारत के बीच सीमा को अवैध रूप से पार करने से बनी थी और चीन इसे स्वीकार नहीं कर सकता है। चीनी पक्ष ने भी कई बार यह स्पष्ट किया है, कि चीन-भारत सीमा संघर्ष के अधिकार और गलतियां बहुत स्पष्ट हैं, और इसकी जिम्मेदारी चीनी पक्ष की नहीं है'। ग्लोबल टाइम्स ने आगे लिखा है कि, 'हालांकि, कुछ भारतीय मीडिया संस्थान तथ्यों में छेड़छाड़ कर घरेलू राष्ट्रवादी भावनाओं को भड़काते हैं, जिसने चीन-भारत संबंधों में कुछ हद तक गड़बड़ी पैदा की है।

'भारत को लुभाने की कोशिश में अमेरिका'
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, 'भारत में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अमेरिका जैसी बाहरी ताकतों द्वारा लुभाए जाते हैं। उन्हें उम्मीद है कि, सीमा मुद्दा चीन-भारत संबंधों को तनावपूर्ण बनाए रखेगा और चीन को नियंत्रित करने में भूमिका निभाएगा। वर्तमान में, चीन और भारत ने परामर्श और बातचीत के माध्यम से सीमा की स्थिति को धीरे-धीरे ठंडा कर दिया है, जिससे ये लोग "चिंतित" महसूस करते हैं और इस उम्मीद में हैं, कि जनता की राय के माध्यम से दबाव बनाकर, वे भारत सरकार के प्रासंगिक कार्यों में बाधा डालेंगे और सीमा मुद्दे पर आगे के समझौते को प्रभावित करेंगे। ऐसी परिस्थितियों में, भारत सरकार को दृढ़ विश्वास रखना चाहिए, शोर-शराबे से परेशान नहीं होना चाहिए, और यह स्वीकार करना चाहिए, कि सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखना भारत के वास्तविक हित में है"।

'नई दिल्ली की समझदारी पर भरोसा'
इसके साथ ही ग्लोबल टाइम्स ने कहा है, कि चीन को भारत सरकार की समझदारी पर भरोसा है। ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि, 2020 में गलवान घाटी संघर्ष के बाद चीन-भारत संबंध निचले स्तर पर आ गए हैं। तब से, दोनों पक्षों ने अबाधित राजनयिक और सैन्य चैनल बनाए रखा है। सीमा की स्थिति आम तौर पर स्थिर रही है, और दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार में गति दिखाई दी है। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका चीन और भारत के बीच लगातार अनबन चला रहा है। जो यह इंगित करता है कि, दो प्रमुख शक्तियों को आसानी से मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है। हमें नई दिल्ली की राजनीतिक समझदारी और रणनीतिक संयम पर भी भरोसा है, और यह विश्वास है कि चीन और भारत सह-अस्तित्व और अलग-अलग विचारों को समायोजित करने का एक तरीका खोज लेंगे।"












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