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Defence News: रूस से भारत खरीदेगा S-400 का जखीरा, कहां दागने की तैयारी? पाक-चीन में अभी से दहशत

Defence News: ऑपरेशन सिंदूर(Operatin Sinoor) के दौरान भारत ने जिन रूसी मिसाइल S-400 को दम पर पाकिस्तान के 9 आतंकी ठिकानों और अलग-अलग एयरबेसों को नेस्तनाबूत किया अब उसी को बड़ी तादाद में खरीदने के लिए रूस से डील कर ली है। जिसके बाद एक बार फिर पाकिस्तानी नेताओं के माथे पर बल पड़ना शुरू हो गया है।

DAC ने दी मंजूरी

भारत की डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (Rajnath Singh) की अध्यक्षता में रूस से करीब 10,000 करोड़ रुपये की 288 S-400 मिसाइलें खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी (AoN) दे दी है। इस डील में 120 छोटी दूरी और 168 लंबी दूरी की मिसाइलें शामिल हैं। इनकी खरीद फास्ट ट्रैक प्रक्रिया (FTP) के तहत की जाएगी, यानी डील को तेजी से पूरा किया जाएगा ताकि समय बर्बाद न हो।

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कितने की पड़ेगी एक S-400 मिसाइल?

यह पूरी डील 10 हजार करोड़ भारतीय रुपयों के हिसाब से तय हुई है जिसमें कुल 288 S-400 मिसाइलें खरीदी जानी हैं। अगर इस हिसाब से देखें तो एक मिसाइल की कीमत तकरीबन 3.47 करोड़ रुपए बैठती है। वहीं इस डील की खबर आते ही पाकिस्तान और चीन दोनों में अभी से दहशत का आलम है।

क्यों जरूरी है S-400?

S-400 एक ऐसी मिसाइल है जिससे किसी देश की सेना, दुश्मन देश पर हमला भी कर सकती है और दुश्मन की तरफ से दागी गई मिसाइलों को काउंटर भी कर सकती है। साथ ही, इसे जमीन से हवा में (Surface To Air), जमीन से जमीन (Surface To Surface) पर दागा जा सकता है। वहीं अगर इसे राफेल जैसे फाइटर जेट में जोड़ दिया जाए तो यह हवा से जमीन पर (Air To Surface) और हवा से हवा (Air To Air) भी दागा जा सकता है। यह ऐसी मिसाइल है जिसका इस्तेमाल चार तरीकों से किया जा सकता है।

S-400 और पैंटसिर मिलकर बनाएंगे दो-लेयर डिफेंस सिस्टम

S-400 और पैंटसिर मिसाइल सिस्टम साथ मिलकर एक दो-स्तरीय (Two-Layer) एयर डिफेंस शील्ड तैयार करते हैं। इसका मतलब है कि अगर दुश्मन देश की तरफ से फाइटर जेट, मिसाइल, ड्रोन या कामिकेज ड्रोन हमला करते हैं, तो यह सिस्टम उन्हें हवा में ही रोक सकता है। यह खास तौर पर सीमा पार से आने वाले हवाई खतरों से निपटने के लिए बेहद असरदार माना जाता है। सूत्रों की मानें तो भारत को इस साल जून और नवंबर में रूस से दो और S-400 सिस्टम मिलने वाले हैं, जिससे देश की एयर डिफेंस ताकत और मजबूत होगी।

नवंबर 2026 तक पूरी होगी खरीद योजना

केंद्र सरकार की योजना है कि नवंबर 2026 तक इन मिसाइलों की खरीद पूरी कर ली जाए। बताया जा रहा है कि यह खरीद 'ऑपरेशन सिंदूर' में इस्तेमाल हुए स्टॉक की भरपाई के लिए की जा रही है। साथ ही, लंबी और छोटी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों का भंडार बढ़ाना भी इसका मकसद है।

भारतीय वायुसेना आगे चलकर पैंटसिर शॉर्ट-रेंज सिस्टम के साथ रूस से पांच और S-400 सिस्टम खरीदने का लक्ष्य बना रही है, ताकि देश की एयर शील्ड और ज्यादा मजबूत हो सके।

3.60 लाख करोड़ रुपये की अलग डिफेंस डील

गुरुवार को जारी एक आधिकारिक बयान के अनुसार, रक्षा मंत्री ने करीब 3.60 लाख करोड़ रुपये के कई अन्य रक्षा प्रस्तावों को भी 'आवश्यकता की स्वीकृति' दी है। इन प्रस्तावों का मुख्य मकसद भारतीय सशस्त्र बलों की ऑपरेशनल क्षमता बढ़ाना और देश की रक्षा तैयारियों को और बेहतर बनाना है।

इंडियन एयरफोर्स मिलेंगे पावरफुल फाइटर जेट्स

भारतीय वायुसेना (IAF) के लिए जिन बड़े प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिली है, उनमें मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA), Rafale जेट, आधुनिक लड़ाकू मिसाइलें और एयर-शिप आधारित हाई-एल्टीट्यूड स्यूडो-सैटेलाइट शामिल हैं। ये सभी खरीद वायुसेना की ताकत, टेक्नोलॉजी और रणनीतिक बढ़त को नई ऊंचाई देंगी। इससे भारत की एयर पावर पहले से ज्यादा एडवांस और मजबूत हो जाएगी।

MRFA से बढ़ेगी हवाई प्रभुत्व की ताकत

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, MRFA (Medium Multi-Role Fighter Aircraft) की खरीद से इंडियन एयरफोर्स को हर तरह के युद्ध हालात में Air Superiority हासिल करने की ताकत मिलेगी। साथ ही लंबी दूरी से दुश्मन पर हमला करने की क्षमता और हमलों को रोकने की शक्ति भी बढ़ेगी। सरकार का प्लान है कि ज्यादातर MRFA विमान भारत में ही बनाए जाएं। इससे 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' पहल को भी मजबूती मिलेगी और डिफेंस सेक्टर में घरेलू उत्पादन बढ़ेगा।

स्टैंड-ऑफ अटैक में बढ़ेगी सटीकता

मंत्रालय ने साफ किया है कि नई लड़ाकू मिसाइलें स्टैंड-ऑफ ग्राउंड अटैक में बेहद सटीक साबित होंगी। इसका मतलब है कि भारतीय सेना दुश्मन के ठिकानों पर दूर से और ज्यादा सटीक हमला कर सकेगी। इससे गहरी मारक क्षमता (Deep Strike Capability) में बड़ा इजाफा होगा।

कैसे होती है रक्षा खरीद की पूरी प्रक्रिया?

भारत की रक्षा खरीद प्रक्रिया काफी सख्त और कई स्तरों वाली होती है। सबसे पहले 'मामले के विवरण' (Statement of Case) तैयार किया जाता है, जिसमें सेना की जरूरतें तय होती हैं। इसके बाद रक्षा खरीद बोर्ड और रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) मंजूरी देता है। इसके बाद मोल-भाव (Price Negotiation) और वित्तीय मंजूरी की प्रक्रिया होती है। आखिर में सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCS) अंतिम मंजूरी देती है। इसके बाद ही किसी रक्षा सौदे पर आधिकारिक मुहर लगती है।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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