मोदी सरकार की विदेश नीति के क्यों दीवाने हुए चीनी नागरिक, जमकर हो रही तारीफ, शी जिनपिंग पर प्रेशर

चीनी रणनीतिक समुदाय और राजनीतिक नेतृत्व के साथ साथ विदेश नीति विश्लेषक, पीएम मोदी को प्रमुख शक्तियों के साथ संबंधों को संतुलित करके भारत के राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने में राजनीतिक रूप से बुद्धिमान नेता बता रहे हैं।

बीजिंग, सितंबर 16: भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, उज्बेकिस्तान के समरकंद में शंघाई सहयोग संगठन के राष्ट्राध्यक्षों की 22वीं परिषद में कोविड के बाद की दुनिया में पहली बार मिल रहे हैं। भारत और चीन के बीच एलएसी पर पिछले दो सालों से भारी तनाव के बीच दोनों नेताओं की ये पहली मुलाकात हो रही है, जिसको लेकर पूरी दुनिया का ध्यान समरकंद की तरफ टिका हुआ है, जहां राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी मौजूद हैं। वहीं, काफी संभावना है, कि पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक भी हो सकती है और एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दिनों पीएम मोदी को लेकर चीन की जनता के बीच एक नई राय बन रही है, जिसे देखते हुए राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर पीएम मोदी के साथ बैठक के दौरान सीमा विवाद के मुद्दे पर बात करने का प्रेशर बन रहा है।

मोदी की नीति का दीवाना हुआ चीन

मोदी की नीति का दीवाना हुआ चीन

दरअसल, चीन की एक बड़ी आबादी पीएम मोदी की उस नीति की तारीफ कर रही है, जो उन्होंने यूक्रेन संकट के दौरान अपनाई है और यूक्रेन को लेकर भारत सरकार की नीति की चीन में काफी तारीफ की जा रही है। चीन के सोशल मीडिया पर यूक्रेन को लेकर स्टैंड, खासकर पीएम मोदी के रूख की काफी चर्चा की जा रही है और चीन में पिछले दिनों उनकी काफी तारीफ की गई है। मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस एंड एनालिसिस के ईस्ट एशिया सेंटर में एसोसिएट फेलो एमएस प्रतिभा ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने एक लेख में पीएम मोदी और शी जिनपिंग की संभावित मुलाकात को लेकर कहा है, कि चीन के राष्ट्रपति पर उनके ही देश में पीएम मोदी को लेकर बन रहे पब्लिक ओपिनियन का प्रेशर बन रहा है और इस बैठक के दौरान सीमा विवाद का मुद्दा प्रमुखता से उठ सकता है।

पीएम मोदी को लेकर क्या है चीन में राय

पीएम मोदी को लेकर क्या है चीन में राय

चीनी रणनीतिक समुदाय और राजनीतिक नेतृत्व के साथ साथ चीन के प्रमुख विदेश नीति विश्लेषक, पीएम मोदी को प्रमुख शक्तियों के साथ संबंधों को संतुलित करके भारत के राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने में राजनीतिक रूप से बुद्धिमान नेता के तौर पर देखते हैं। चीन में कई लोग यह भी मानते हैं, कि बीजिंग को यूक्रेन संघर्ष के लिए एक समान संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए था। चीन की जनता के ओपिनियन से यही पता चलता है, कि, चीन के मुकाबले भारत की सरकार अपनी जनता को ज्यादा अच्छे से समझाने में कामयाब रही है, कि यूक्रेन संकट पर सरकार का रूख क्या था और भारत ने तटस्थ नीति क्यों अपनाई है। जबकि, शी जिनपिंग सरकार की नीति को लेकर चीन के विश्वेषकों का मानना है, कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के बीच यही संदेश गया है, कि चीन ने सीधे तौर पर रूस का साथ लिया है।

भारत की रणनीति के हुए कायल

भारत की रणनीति के हुए कायल

यूक्रेन संकट के दौरान भारत ने जिस रणनीति के तहत अमेरिका और रूस जैसे सुपरवावर्स के बीच सामंजस्य बैठाया और बिना किसी से दुश्मनी लिए अपने स्टैंड पर कायम रहा, यह चीन के राजनीतिक विश्लेषकों और चीन की जनता के लिए चौंकाने वाला था, क्योंकि चीन के लोगों का मानना है, कि यूक्रेन संकट के बीच जिस तरह से दुनिया बंटी है और अलग अलग पावर सेंटर्स बन रहे हैं, उनके बीच तटस्थ नीति बनाते हुए आगे बढ़ना काफी कठिन है और यह एक जटिल कूटनीतिक अभ्यास है, जिसे भारत ने कामयाबी के साथ पूरा किया है। मोदी सरकार की इस नीति से चीन के अंदर एक संदेश यह गया है और चीन के अंदर बहुत से लोग अपनी ही सरकार की इस दृढ़ आधिकारिक दृष्टिकोण को चुनौती देने लगे हैं, कि भारत पहले ही चीन को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका के साथ गठबंधन कर चुका है। और उनका मानना है, कि भारत ने अमेरिका के साथ गठबंधन करने के बाद भी अपनी सामरिक स्वायत्तता हासिल कर ली है और भारत की विदेश नीति पर किसी का कोई प्रेशर नहीं है।

एस. जयशंकर भी बने चीन में स्टार

एस. जयशंकर भी बने चीन में स्टार

चीनी सोशल मीडिया पर इन दिनों भारतीय विचारोंको लेकर कई तरह की आवाजें काफी गुंज रही हैं और सोशल मीडिया के साथ साथ चीनी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया, जो सरकार के नियंत्रण में हैं, उनपर भी भारतीय विचारों पर बातचीत की जा रही है और भारत का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की गई है। इसके साथ ही चीनी मीडिया में पश्चिमी देशों की 'यूक्रेन नीति' को प्रोपेगेंडा कहा गया है। खासकर चीनी मीडिया में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर के उन बयानों के क्लीपिंग्स काफी घूम रहे हैं, जिसमें उन्होंने रूस से तेल खरीदने से लेकर, यूक्रेन संकट के दौरार उन्होंने पश्चिमी देशों को जो जवाब दिया है, उसपर चर्चा की जा रही है। रूसी तेल खरीदने को लेकर भारतीय विदेश मंत्री ने यूरोपीय मीडिया को जिस तरह से जवाब दिया था, उसने एस. जयशंकर को चीन में एक स्टार की तरह प्रोजेक्ट किया है।

पीएम मोदी को बुद्धिमान बता रहा है चीन

पीएम मोदी को बुद्धिमान बता रहा है चीन

चीनी सोशल मीडिया पर भारत की विदेश नीति की तारीफ की जा रही है और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में खेले जा रहे जटिल जियो पॉलिटिकल गेम को समझने में पीएम मोदी की बुद्धिमता से चीनी जनमत तेजी से प्रभावित हो रहा है। चीन में यह भी कहा जा रहा है, कि भारत ने उस वक्त भी अपनी अर्थव्यवस्था को संभाल कर रखा हुआ है, जब दुनिया की अर्थव्यवस्था काफी प्रभावित हुई है कोविज संकट के कारण ज्यादातर मजबूत अर्थव्यवस्थाओं पर गंभीर असर पड़ा है, लेकिन भारत ऐसे वक्त में एक महान ताकत के साथ उभरा है और अपनी तटस्थ नीति की बदौलत ने भारत ने प्रमुख अवसरों को कामयाबी के साथ भुनाया है। वहीं, यूक्रेन पर भारत के रुख ने चीन में एक सकारात्मक मनोदशा पैदा की है जो बदले में दो एशियाई पड़ोसियों के बीच चल रहे राजनयिक गतिरोध को हल करने में मदद कर सकती है। चीन के भीतर बढ़े हुए राजनयिक जुड़ाव के लिए अनुकूल माहौल के अलावा, नई दिल्ली सत्ता की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और एक नए भारत के उद्भव की स्पष्ट समझ से निकलने वाली एक स्वतंत्र विदेश नीति का अनुसरण कर रही है।

भारत की स्वतंत्र विदेश नीति

भारत की स्वतंत्र विदेश नीति

चीन में इस बात को लेकर भारत की तारीफ की जा रही है, कि भारत ने अपनी तटस्थ और स्वतंत्र विदेश नीति बरकरार रखी है और इसीलिए भारत ने अपनी राष्ट्रीय हितों या क्षेत्रीय संप्रभुता से समझौता किए बिना, रूस और चीन दोनों के लिए कूटनीति का दरवाजा खुला रखा है और भारत की विदेश नीति के पास विकल्पों को समझने की कुंजी है। पीएम मोदी के विचार में, रूस और चीन सभ्यतागत राज्य हैं और दोनों में से किसी एक का पूरी तरह से कमजोर होना खुद भारत की सुरक्षा के लिए जटिल स्थिति बना सकता है। विदेश नीति में पीएम मोदी की रणनीति प्रतिस्पर्धा और बचाव दोनों को प्राथमिकता देती है और यहां तक कि भारत के राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित करने के लिए प्रोत्साहित करती है। भारत यह मानता है कि, गैर-पश्चिमी सभ्यताओं का कमजोर होना, जो भारत के लिए दुश्मन नहीं है, वो भारत के लिए ही मुसीबत बन सकते हैं, लिहाजा भारत की विदेश नीति किसी को कमजोर होते हुए देखना नहीं चाहती है।

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