Adani-Hindenburg Case: अमेरिका आया साथ, लेकिन अ‍डानी की बदनामी के पीछे चीन का हाथ? SC के वकील ने खोले राज़

Adani-Hindenburg Case: शॉर्ट सेलिंग फॉर्म हिंडेनबर्ग भले बंद हो गया लेकिन उनके द्वारा अडानी ग्रुप पर लगाए गए विवादित आरोपों की तह खुलने लगी है। हाल ही में प्रसिद्ध वकील महेश जेठमलानी ने हिंडेनबर्ग और चीन के रिश्ते को लेकर कुछ प्रश्न उठाए हैं और अपनी दलील के समर्थन में कुछ फैक्ट्स भी रखें हैं, जिससे यह मामला और भी पेंचीदा बन गया है। आखिर दुनिया‍ का एक सबसे शक्तिशाली देश भारत के महज एक व्यापारी के पीछे क्यों पड़ा था?

अमेरिका में निज़ाम बदलते ही आनन-फानन में हिंडेनबर्ग को अपना अमला क्यों समेटना पड़ गया? क्या अमेरिका अडानी के साथ खड़ा है? आइए इसकी क्रोनोलॉजी समझते हैं।

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2017 में, राहुल गांधी ने गुप्त रूप से चीनी दूतावास का दौरा किया था और वहां के मंत्रियों से मुलाकात की थी। राहुल गांधी बड़े नेता हैं और बड़े नेता देश-विदेश का दौरा करते ही रहते हैं लेकिन सवाल यह है कि यह दौरा गुप्त क्यों था? उन्होने और उनकी पार्टी ने इस दौरे की पुष्टि करने से इनकार क्यों किया था? फिर इनकार करने के बाद, जब दूतावास ने बैठक की तस्वीर जारी की, तो इसे स्वीकार क्यों किया? 2018 में कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने दोबारा चीनी मंत्रियों से गुप्त मुलाकात क्यों की? उस मीटिंग में ऐसा क्या हुआ था जो कांग्रेस अपने देश के ही एक उद्यमी अडानी के पीछे पड़ गई?

अब समझते हैं कि अडानी से चीन की क्या अदावत है। और इस कहानी के फ्लैशबैक में आपको लिए चलते हैं ऑस्ट्रेलिया। चीन अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लेकर अग्रेसिव रहता है और पूरी दुनिया में जैसे चीन का व्यापारिक साम्राज्य कायम है ऑस्ट्रेलिया भी उससे अछूता नहीं था। चीन के बाद ऑस्ट्रेलिया में बिजनेस सेट करने वाले पहला भारतीय समूह अडानी ही था। वैश्विक चुनौतियों के बावजूद अडानी ग्रुप ने ऑस्ट्रेलिया में लकभग 9 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश किया था।

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अदानी की एंट्री को एशिया-पेसिफिक क्षेत्र में चीनी प्रभाव के लिए खतरे के रूप में देखा गया। 2020 में, यानकोल (Yancoal) चीन की एक दिग्गज कंपनी जो ऑस्ट्रेलिया में कई कोयला खदानों का स्वामित्व रखती है, ने ऑस्ट्रेलिया में अदानी से 20 गुना ज्यादा कोयला उत्पादन किया और कुल निर्यात का लगभग 40% हिस्सा दिया। हालांकि चायनिज कंपनी को वैसे प्रायोजित एनजीओ के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा जैसा कि अडानी को झेलना पड़ा था जबकि ऑस्ट्रेलिया के लिए दोनों विदेशी कंपनी ही थी।

2010 में अडानी ने ऑस्ट्रेलिया में कार्मिशेल माइंस का अधिग्रहण किया और 2011 में अबॉट प्वाइंट कोल टर्मिनल खरीदी। 2012 में #STOPADANI कैंपेन शुरु हो गया और अब तक अडानी समूह को पर्यावरन कार्यकर्त्ताओं से लेकर तमाम तरह के हज़ारों प्रोटेस्ट का सामना करना पड़ा है जबकि अडानी समूह ऑस्ट्रेलिया में मुश्किल से 2 प्रतिशत कोयले का उत्खनन करता है वहीं ऑस्ट्रेलिया के कोयला खदानों में चाइनिज कंपनियों की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत है।

फिर 2014 में दुनिया के सबसे बड़े कोल पोर्ट द न्यू कैशल और 2015 में ऑस्ट्रेलिया के नॉर्दन टेरेटरी में डार्विन पोर्ट का अधिग्रहन चीन करता है। 2017 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे, ऑस्ट्रेलियन पीएम मैल्कॉम टर्नबुल और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच क्वाड को पुनर्जिवित करने का समझौता होता है ताकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढते सैन्य एवं कूटनितिक प्रभाव को रोका जा सके। इसके बाद 2018 में ऑस्ट्रेलिया और चीन के रिश्ते बिगड़ने लगते हैं और 2020 में तो चीन ऑस्ट्रेलिया से कोयला आयात पर अघोषित प्रतिबंध लगाकर कनाडा से कोयला लेने लगता है।

केवल ऑस्ट्रेलिया ही नहीं इजरायल, अफ्रीका, तंजानिया, म्यांमार, बांग्लादेश और श्रीलंका तक में अडानी चीनी व्यापर समूहों के रास्ते में आते रहते हैं। 2023 में भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हाइफ़ा पोर्ट पर कब्जा जमाकर अडानी ने चीन को करारा झटका दिया था। लेकिन क्या इसके बाद आई हिंडेनबर्ग रिपोर्ट एक सोची-समझी साजिश थी?

इज़राइल का हाइफ़ा पोर्ट, स्वेज़ नहर के बेहद करीब होने के कारण पूरब और पश्चिम के व्यापार का सबसे छोटा और अहम रास्ता है। चीन पहले ही इज़राइल में दो बंदरगाहों पर नियंत्रण रखता था - एक हाइफ़ा बेपोर्ट टर्मिनल (जिसका संचालन शंघाई इंटरनेशनल पोर्ट ग्रुप के पास है) और दूसरा अशदोद पोर्ट, जो अपेक्षाकृत कम सक्रिय है। लेकिन जब अडानी ने हाइफ़ा पोर्ट को खरीदने के लिए चीन को पछाड़ दिया, तो यह भारत के लिए एक बड़ी जीत साबित हुई।

अडानी का यह कदम चीन के रणनीतिक हितों के खिलाफ गया, क्योंकि चीन BRI (बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव) के जरिए दुनिया भर के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर प्रभुत्व कायम करना चाहता है। इज़राइल जैसे संवेदनशील क्षेत्र में अडानी की मौजूदगी ने चीन को बैकफुट पर ला दिया।

हिंडेनबर्ग रिपोर्ट: अडानी को हराने की साजिश?
जनवरी 2023 में आई हिंडेनबर्ग रिपोर्ट ने अडानी ग्रुप को भारी नुकसान पहुंचाया। इस रिपोर्ट के बाद अडानी ग्रुप के शेयरों में भारी गिरावट आई और भारत की वैश्विक छवि पर भी असर पड़ा। लेकिन क्या यह सिर्फ एक वित्तीय जांच थी या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश थी? प्रसिद्ध वकील महेश जेठमलानी ने दावा किया है कि यह रिपोर्ट चीन समर्थित साजिश का हिस्सा थी। उनके अनुसार, एक चीनी जासूस अनला चेंग और उनके पति मार्क किंगडन ने इस रिपोर्ट को तैयार करवाया था। इसके लिए उन्होंने कोटक महिंद्रा इंवेस्टमेंट लिमिटेड (KMIL) का इस्तेमाल किया ताकि अडानी के शेयरों की शॉर्ट-सेलिंग की जा सके और चीन के बड़े एजेंडे को आगे बढ़ाया जा सके।

कौन हैं अनला चेंग?
अनला चेंग ने 2016 में SupChina नाम से एक डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म की स्थापना की थी, जो चीन से जुड़ी खबरों को पश्चिमी दृष्टिकोण से पेश करता था। 2022 में इसे The China Project के रूप में रीब्रांड किया गया। माना जाता है कि उनकी गहरी जड़े चीनी खुफिया एजेंसियों और कारोबारी नेटवर्क से जुड़ी हुई हैं।

अमेरिका की अडानी को खुला समर्थन
हलांकि तेजी से बदलते भू-राजनीतिक समीकरण में एक अलग तस्वीर भी आ रही है। डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति चुने जाते हैं। हिंडेनबर्ग पर ताला लग जाता है। अमेरिका द्वारा टैरिफ लाने की बात होती है। जिस यूएस में अडानी पर न्यायिक मामला दर्ज़ करने की बात हुई थी, वही अब अडानी ग्रुप के साथ खडा नजर आ रहा है। हाल ही में अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने गुजरात में अडानी के मुंद्रा और खवड़ा प्रोजेक्ट्स का दौरा किया और इसे सोशल मीडिया पर खुलकर साझा किया। यह कदम स्पष्ट संकेत देता है कि अमेरिका अडानी का समर्थन कर रहा है, भले ही उसके कुछ सरकारी विभाग उनके खिलाफ जांच कर रहे हों।

DFC का अडानी पर भरोसा, हिडनबर्ग की विश्वसनीयता पर सवाल
अमेरिकी सरकार से जुड़ी डिवेलपमेंट फाइनेंस कॉरपोरेशन (DFC) ने नवंबर 2023 में अडानी के कोलंबो पोर्ट प्रोजेक्ट के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की थी। यह वही समय था जब Hindenburg रिपोर्ट के चलते अडानी ग्रुप भारी दबाव में था। लेकिन DFC ने इस रिपोर्ट को 'अप्रासंगिक' करार देते हुए इसे पूरी तरह से नकार दिया। इस समर्थन के बाद अडानी ग्रुप के शेयरों में तेज़ रिकवरी देखी गई और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा फिर से मजबूत हुआ। यह दर्शाता है कि हिंडेनबर्ग रिपोर्ट को लेकर पश्चिमी जगत में भी एकमत राय नहीं है।

अमेरिका की रणनीति: अडानी के जरिए चीन पर दबाव?

यह साफ दिख रहा है कि अमेरिका के अलग-अलग संस्थानों के बीच अडानी को लेकर विरोधाभासी रवैया है। एक तरफ, न्याय विभाग अडानी के खिलाफ जांच कर रहा है, तो दूसरी तरफ, अमेरिकी प्रशासन और वित्तीय संस्थाएँ उन्हें समर्थन दे रही हैं।

इसका एक बड़ा कारण हो सकता है कि अमेरिका चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का मुकाबला करने के लिए अडानी जैसे वैश्विक कारोबारी समूहों पर दांव लगा रहा है।

1. हाइफ़ा पोर्ट: अडानी ने इज़राइल के रणनीतिक हाइफ़ा पोर्ट का अधिग्रहण कर चीन को झटका दिया था।
2. इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप कॉरिडोर (IMEC): अमेरिका और भारत मिलकर इस परियोजना को आगे बढ़ा रहे हैं, जो चीन की BRI का मजबूत विकल्प हो सकता है।
3. कोलंबो पोर्ट: DFC का अडानी को फंड देना इस बात का संकेत है कि अमेरिका भारत के व्यापारिक वर्चस्व को बढ़ावा देकर चीन की पकड़ को कमजोर करना चाहता है।

अमेरिका का अडानी को समर्थन करना यह दिखाता है कि वह हिंडेनबर्ग रिपोर्ट के प्रभाव को सीमित करना चाहता है। भारत के व्यापारिक और भू-राजनीतिक महत्व को देखते हुए, अडानी अब सिर्फ एक कॉरपोरेट नाम नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का एक अहम हिस्सा बन चुके हैं।

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