चीन की अर्थव्यवस्था खतरे में, 1930 जैसे हो सकते हैं हालात.. खुलासे के बाद चीनी बिजनेस जर्नलिस्ट पर कसा शिकंजा

China bans financial journalist: चीन की शी जिनपिंग सरकार ने देश के प्रमुख फाइनेंशियल जर्नलिस्ट पर बुरी तरह से शिकंजा कस दिया है और माना जा रहा है, कि चीनी बिजनेस पत्रकार की जान को गंभीर खतर है।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने प्रमुख चीनी बिजनेल जर्नलिस्ट वू शियाबाओ को सोशल मीडिया से प्रतिबंधित कर दिया है। बिजनेस जर्नलिस्ट पर उस वक्त पाबंदियों लगाई गई हैं, जब उन्होंने अपने एक आर्टिकल में चीन की अर्थव्यवस्था पर गंभीर खतरा बताते हुए 1930 के दशक की महामंदी से देश की धीमी आर्थिक स्थिति की तुलना की और उन्होंने सरकार की आलोचना की थी।

China bans financial journalist

वू शियाबाओ की जान खतरे में..

बिजनेस जर्नलिस्ट वू शियाबाओ, चीन के प्रसिद्ध पत्रकार हैं और चीनी सोशल मीडिया पर उनके 47 लाख से ज्यादा फॉलोवर्स थे, लेकिन अब उनके अकाउंट को सस्पेंड कर दिया गया है। मंगलवार को उनके पेज पर एक नोटिफिकेशन जारी किया गया और कहा गया, कि "कानूनों का नियमों का उल्लंघन करने के लिए इस खाते पर प्रतिबध लगाया जाता है।"

चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वीबो की तरफ से जारी बयान में कहा गया है, कि जर्नलिस्ट वू शियाबाओ की सोमवार की रिपोर्ट चीन को बदनाम करने के लिए हैं, इसीलिए उनके अकाउंट को सस्पेंड किया जाता है।

वू शियाबाओ ने अपनी रिपोर्ट में चीन की मौजूदा स्थिति की 1930 की आर्थिक मंदी से तुलना करते हुए लिखा था, कि 'चीन की कोविड के बाद आर्थिक सुधार की गति लड़खड़ा गई है, हाल के हफ्तों में कमजोर आंकड़ों से संकेत मिलता है, कि चीन में बेरोजगारी बढ़ रही है और चीन सुधार की प्रक्रिया से बाहर जा रहा है।' उनकी रिपोर्ट को वीबो ने देश को बदनाम करने वाला और गलत जानकारी फैलाने वाला बताया और कहा, कि तीन वेरिफाइट अकाउंट को बंद कर दिया गया है।

जर्नलिस्ट वू शियाबाओ के वीबो अकाउंट से अप्रैल 2022 के बाद से पोस्ट की गई सभी सामग्री हटा दी गई है।

अपने खिलाफ हो रही कार्रवाई को लेकर फिलहाल जर्नलिस्ट शियाबाओ ने एएफपी की रिपोर्ट का कोई जवाब नहीं दिया है।

आपको बता दें, कि चीनी वित्तीय पत्रिका कैक्सिन की वेबसाइट पर उनके नियमित कॉलम में लंबे समय से देश की आर्थिक समस्याओं का विवरण दिया गया है, जिसमें घटती जन्मदर और आसमान छूती युवा बेरोजगारी को लेकर चिंता जताई गई है

मई महीने के एक कॉलम में उन्होंने लिखा था, कि "बेरोजगारों की विशाल सेना एक फ्यूज बन जाएगी जो बारूद के ढेर की तरफ विस्फोट कर सकती है।" उन्होंने 1930 के दशक की महामंदी के साथ स्थिति की तुलना की।

वहीं, अपने एक हालिया कॉलम में उन्होंने पूछा, कि "क्या मौद्रिक ढील "वर्तमान आर्थिक समस्याओं को हल करने" में सक्षम होगी।" फिलहाल, उनके इन कॉलम्स को वेबसाइट से हटाया नहीं गया है।

मीडिया पर चीन का नियंत्रण

आपको बता दें, कि चीन का घरेलू मीडिया राज्य-नियंत्रित है, और सोशल मीडिया की व्यापक सेंसरशिप का उपयोग अक्सर नकारात्मक कहानियों या आलोचनात्मक कवरेज को दबाने के लिए किया जाता है।

वहीं, चीन के रेग्युलेटर्स ने चीन के बारे में विदेशी समाचार रिपोर्ट पढ़ने से बचने का आग्रह किया है, जबकि विश्लेषकों और अर्थशास्त्रियों को निराशावादी विचार प्रसारित करने के लिए सोशल मीडिया से निलंबित कर दिया गया है।

चीन की अर्थव्यवस्था काफी खराब है और एक यही मोर्चा है, जिसको लेकर चीन काफी डरता है। विदेशी मीडिया में भी चीन की अर्थव्यवस्था को लेकर जो निगेटिव आर्टिकल्स लिखे जा रहे हैं, उसे तो चीन कंट्रोल नहीं कर सकता है, लिहाजा वो निवेशकों से कह रहा है, कि वो चीन के बारे में न्यूज रिपोर्ट्स ना पढ़े।

चीन में बेरोजगारी दर

चीन के नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स ने इसी साल मार्च में अपनी अर्थव्यवस्था को लेकर एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें दावा किया गया था, कि कोविड संकट के बाद देश की अर्थव्यवस्था में तेजी से सुधार हो रहा है, लेकिन इस रिपोर्ट में भी चीन, देश की बेरोजगारी के आंकड़ों को छिपा नहीं पाया।

चीनी सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल जनवरी से फरवरी की अवधि में 16 से 24 वर्ष के युवाओं की बेरोजगारी दर 18.1 प्रतिशत तक पहुंच गई, जबकि दिसंबर में यह 16.7 प्रतिशत थी। सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, चीन की कुल बेरोजगारी दर भी बढ़कर 5.6 प्रतिशत हो गई।

मई में बेरोजगारी दर में और तेजी आई है और ये बढ़कर 20.8 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इसके अलावा, नौकरी पाने के लिए लोगों को भारी संख्या में परेशान होना पड़ रहा है। चीन के नए प्रधान मंत्री ली कियांग ने स्वीकार किया, कि रोजगार सृजन एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

चीन में इस साल करीब साढ़े 1.5 करोड़ युवा कॉलेजो से ग्रेजुएशन पूरा कर नौकरी की तलाश में जुटेंगे, लेकिन उनके हाथों में कुछ नहीं होगा। Wion की एक रिपोर्ट के अनुसार, नौकरियों की कमी के कारण, नए चीनी स्नातक विद्रोह भी कर सकते हैं और चीन की तानाशाह कम्युनिस्ट सरकार जनता की बगावत से सबसे ज्यादा डरती है।

चीन की सबसे बड़ी दिक्कत ये है, कि उसके 80 प्रतिशत से ज्यादा कर्मचारी निजी क्षेत्र में काम करते हैं और कोविड संकट के बाद सबसे ज्यादा असर निजी कंपनियों पर ही पड़ा है, लिहाजा भारी तादाद में लोगों की नौकरी खत्म हो रही है, जिससे अब सरकार को विद्रोह का खतरा सता रहा है और शी जिनपिंग का सबसे बड़ा डर भी यही है।

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