कंबोडिया के तानाशाह PM 40 सालों के बाद छोड़ेंगे पद, बेटे को सौंपी विरासत.. विपक्षी नेताओं के लिए थे काल
Cambodian PM Hun Sen Step down: दुनिया के सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले नेताओं में से एक, कंबोडियाई प्रधान मंत्री हुन सेन ने बुधवार को कहा है, कि वह लगभग चार दशकों के कट्टरपंथी शासन के बाद इस्तीफा दे देंगे और अपने सबसे बड़े बेटे को सत्ता सौंप देंगे। यानि, पिता के बाद अब पुत्र देश की सत्ता को चलाएगा।
पूर्व खमेर रूज कैडर ने 1985 से कंबोडिया की सरकार का नेतृत्व किया है और इस दौरान उन्होंने देश में अपने तमाम विरोधियों को जड़ से मिटा दिया। कंबोडिया में फिलहाल इक्का-दुक्का आवाजें ही हैं, जो प्रधानमंत्री के खिलाफ हैं।

तानाशाह बनकर चलाई सरकार
प्रधान मंत्री हुन सेन ने अपनी सत्ता के सभी विरोधों को खत्म कर दिया है, विपक्षी दलों पर प्रतिबंध लगा दिया है, चुनौती देने वालों को देश छोड़कर भागने के लिए मजबूर किया गया है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबा दिया गया है।
उनकी कंबोडियन पीपुल्स पार्टी (सीपीपी) ने रविवार को बिना किसी सार्थक विरोध के चुनाव में 82 प्रतिशत वोट लेकर भारी जीत हासिल की है, जिससे उनके सबसे बड़े बेटे के लिए वंशवादी उत्तराधिकार का मार्ग प्रशस्त हो गया है, जिसकी तुलना कुछ आलोचकों ने उत्तर कोरिया से की है।
70 साल के प्रधानमंत्री हुन सेन ने देश के सरकारी टेलीविजन पर एक विशेष प्रसारण में कहा, कि "मैं लोगों को इस बात के लिए समझाना चाहता हूं, क्योंकि मैं घोषणा करता हूं कि मैं प्रधान मंत्री पद छोड़ रहा हूं।"
आपको बता दें, कि कंबोडिया में रविवार को हुए चुनाव में एकमात्र गंभीर चुनौती देने वाली विपक्षी पार्टी कैंडललाइट पार्टी को वहां के चुनाव आयोग ने तकनीकी आधार पर चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराते हुए उसके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया था। जिसके बाद संसद में कंबोडियन पीपुल्स पार्टी को ही बहुत मिलेगा।
प्रधानमंत्री हुन सेन ने चुनाव के बाद 84.6 प्रतिशत मतदान को लेकर देश की "लोकतांत्रिक परिपक्वता" बताते हुए उसकी सराहना की है, लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ सहित पश्चिमी शक्तियों ने मतदान की निंदा करते हुए, इसे न तो स्वतंत्र और न ही निष्पक्ष बताया।
अभी वोटों की गिनती नहीं हुई है, मगर उम्मीद है, कि लोकसभा में पांच सीटों को छोड़कर बाकी सभी सीटों पर प्रधानमंत्री हुन सेन की ही पार्टी जीतेगी।
प्रधानमंत्री हुन सेन ने कहा, कि उनके बेटे और देश के फोर स्टार जनरल हुन मानेट, 22 अगस्त की शाम को नई सरकार के प्रमुख के तौर पर शपथ लेंगे और प्रधानमंत्री का पद संभालेंगे।
उन्होंने कहा, "मैं लोगों से हुन मानेट का समर्थन करने के लिए कहता हूं, जो नए प्रधान मंत्री होंगे।"
कंबोडिया पर है चीन का प्रभाव
आपको बता दें, कि प्रधानमंत्री हुन सेन पिछले डेढ़ साल से अपने बेटे को सत्ता सौंपने की कोशिश कर रहे थे और उनके 45 वर्षीय बेटे ने रविवार को हुए मतदान के लिए प्रचार में अग्रणी भूमिका निभाई थी।
हालांकि, प्रधानमंत्री ने ये भी साफ किया, कि पद छोड़ने के बाद भी देश के ऊपर उनका प्रभाव बना रहेगा और उन्होंने इस बात को भी नकारा, कि उनके पद छोड़ने के बाद देश की दिशा बदल सकती है।
बुधवार को अपनी घोषणा में उन्होंने कहा, कि वह सीनेट के अध्यक्ष बनेंगे और जब राजा विदेश में होंगे, तो राज्य के प्रमुख के रूप में कार्य करेंगे।
आपको बता दें, कि हुन सेन के शासनकाल में, कंबोडिया ने बीजिंग के करीब पहुंच कर भारी चीनी निवेश और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से लाभ उठाया है, जिसमें नौसैनिक अड्डे का पुनर्विकास भी शामिल है, जिसने वाशिंगटन को चिंतित कर रखा है।
वहीं, चीन ने रविवार के चुनाव का स्वागत किया, राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने हुन सेन को बधाई का एक व्यक्तिगत संदेश भी भेजा है।
हालांकि, चीनी धन की वजह से कंबोडिया में कई तरह की समस्याएं आ गई हैं। एक तो देश कर्ज में डूब गया है, दूसरी तरफ कैसिनो, ऑनलाइन घोटाले और भारी तस्करी की वजह से देश कई मुश्किलों में घिर गया है।
आलोचकों का कहना है, कि हुन सेन के शासन को पर्यावरण विनाश और भ्रष्टाचार का उदाहरण कहना चाहिए।
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक में कंबोडिया 180 में से 150वें स्थान पर है। एशिया में, सिर्फ म्यांमार और उत्तर कोरिया निचले स्थान पर हैं।

तानाशाह नेता हैं हुन सेन
हुन सेन ने सत्ता में रहने के दौरान, कई विपक्षी राजनेताओं को दोषी ठहराया है और उन्हें जेल में डाल दिया। सबसे दिलचस्प बात ये है, कि 40 सालों से हुन सेन की पार्टी सरकार में है और भ्रष्टाचार के आरोप में विपक्षी नेता जेल भेजे जाते हैं।
इस बार भी रविवार के चुनाव से पहले कानून में बदलाव कर मतदाताओं से मतपत्रों को खराब करने के लिए कहना, गैरकानूनी बना दिया गया।
मतदान के दिन से पांच दिन पहले, अधिकारियों ने लोगों से अपने मतपत्रों को रद्द करने का आग्रह करने के लिए, निर्वासित विपक्षी नेता सैम रेन्सी के 25 सालों तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
वहीं, विपक्षी नेता केम सोखा को मार्च में हुन सेन की सरकार को गिराने की कथित साजिश के लिए देशद्रोह का दोषी ठहराया गया और 27 साल जेल की सजा सुनाई गई है। वह फिलहाल घर में नजरबंद होकर अपनी सजा काट रहे हैं।












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