C-17 ग्लोबमास्टर: भारतीय रेस्क्यू मिशन का ब्रह्मास्त्र कैसे बना?

C17 ग्लोबमास्टर को साल 2013 में अमेरिका से पहली बार ख़रीदा गया था और तब 10 हवाई जहाज़ों की क़ीमत पाँच अरब अमेरिकी डॉलर थी.

C-17 ग्लोबमास्टर
Getty Images
C-17 ग्लोबमास्टर

साल 2023 की शुरुआत ही हुई थी और दिल्ली से सटे हिंडन के भारतीय वायु सेना के एयर बेस में हैंगरों, हवाई पट्टी और टेक्निकल चीज़ों का रेग्युलर निरीक्षण जारी था.

तारीख़ छह जनवरी थी और दुनिया भर में तुर्की में आए भयावह भूकंपों की ख़बर फैल रही थी. बताया जा रहा था कि ऐसा भयावह भूकंप दशकों बाद आया है.

भारत सरकार ने इस आपदा पर खेद प्रकट करते हुए कहा था, "भारत किसी भी तरह की मदद के लिए तैयार है."

इस बीच तैयारियां शुरू हो चुकी थीं. हिंडन एयरबेस पर काम करने वाले एक सीनियर अफ़सर के मुताबिक़, "हमारे पास सबसे बड़े, बेहतरीन मालवाहक और रेस्क्यू करने वाले हवाई जहाज़ C17 हैं, जो छोटे या बड़े किसी भी मिशन के लिए हमेशा तैयार रहते हैं."

एक तरफ़ हवाई जहाज़ तैयार थे, दूसरी तरफ़ इस बात का फ़ैसला हो चुका था कि पहले वे एनडीआरएफ़ की टीम को लेकर उड़ेंगे और उसके बाद मेडिकल टीमें जाएंगी.

अगले दिन भारत का C17 हवाई जहाज़ कई टन मशीनरी, एनडीआरएफ़ के 46 कर्मचारी, तीन वरिष्ठ अधिकारी और हताहतों को मलबे से ढूँढने में मदद के लिए एक डॉग स्क्वॉड को लेकर तुर्की में लैंड कर चुका था.

अगले कई दिनों तक 'ऑपरेशन दोस्त' के चलते भारतीय सेना के C17 हवाई जहाज़ों ने क़रीब एक दर्जन से ज़्यादा उड़ानें भरते हुए हज़ारों टन राहत सामग्री, डॉक्टरों की एक बड़ी टीम, ऑपरेशन थिएटर, कई ट्रक, गाड़ियाँ और हर तरह का समान तुर्की पहुँचा दिया.

C17 ग्लोबमास्टर

दो दिन पहले भी भारतीय वायु सेना के C17 ग्लोबमास्टर हवाई जहाज़ ने सूडान में फँसे भारतीयों को वहाँ से निकाल कर हिंडन एयरबेस पर सुरक्षित पहुँचाया है.

ख़ास बात ये भी है कि इस प्रतिष्ठित हवाई दस्ते की अकेली महिला पायलट 'हर राज कौर बोपराय' ने भी इस मिशन में भारतीय वायु सेना के सबसे बड़े हवाई जहाज़ C17 ग्लोबमास्टर को उड़ाया.

दरअसल, C17 ग्लोबमास्टर को साल 2013 में अमेरिका से पहली बार ख़रीदा गया था और तब 10 हवाई जहाज़ों की क़ीमत पांच अरब अमेरिकी डॉलर थी. एक उड़ान में इस जहाज़ की क्षमता 80 टन का वज़न और साथ में पूरी तरह अस्त्र-शस्त्र से लैस 150 सैनिकों को दुनिया के किसी भी कोने में पहुँचा देने की क्षमता है.

भारतीय वायु सेना के रिटायर्ड विंग कमांडर केएस बिष्ट के मुताबिक़, "जब इन्हें वायु सेना में लिया गया था, तब से इनकी क्षमता फ़ौजी टैंकों और भारी आर्टिलरी को सीमावर्ती इलाक़ों में पहुँचाने की है."

"इनकी ख़ूबी ये भी है कि ये छोटे रनवे पर भी लैंड कर सकते हैं और टेक-ऑफ़ भी आसानी से कर सकते हैं."

2013 में तत्कालीन वायु सेना प्रमुख एनएके ब्राउन ने कहा था, "C17 ग्लोबमास्टर मालवाहक हवाई जहाज़ आने के बाद से उत्तर और उत्तर-पूर्वी सीमा पर हमारी मौजूदगी ज़्यादा मज़बूत होगी."

C-17 ग्लोबमास्टर
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C-17 ग्लोबमास्टर

C-17 ग्लोबमास्टर क्यों है ख़ास

अगस्त, 2021 में भी भारत ने अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में फंसे सैकड़ों भारतीय और भारत में रहने वाले लेकिन वहां फँसे अफ़ग़ान नागरिकों को C17 ग्लोबमास्टर में ही रेस्क्यू किया था.

अमेरिका में बने इस हवाई जहाज़ की कुछ बातें बेहद ख़ास हैं, जो इसे दुनिया के दूसरे मालवाहक जहाज़ों की तुलना में ज़्यादा सफल बनाती हैं.


• 53 मीटर की लंबाई और विंग्स समेत 51 मीटर की चौड़ाई इसे दुनिया के सबसे बड़े जहाज़ों में शुमार करती है.

• 28,000 फ़िट तक की ऊँचाई पर उड़ सकने वाले इस हवाई जहाज़ को एक उड़ान में 2,400 मील यानी 3,862 किलोमीटर तक बिना रिफ़ुएल किए उड़ाया जा सकता है.

• इसे लैंड करने के लिए 3,500 मीटर वाले किसी छोटी हवाई पट्टी पर भी उतारा जा सकता है और इसके चालक दल में तीन सदस्य होते हैं.


भारतीय सेना ने C17 ग्लोबमास्टर को जितना बढ़िया इस्तेमाल किया है, उसकी तारीफ़ ख़ुद अमेरिका ने हाल ही में की है.

अमेरिकी वायु सेना के मेजर जनरल जूलियन चीटर ने इसी साल फ़रवरी में कहा था, "ऑपरेशन दोस्त के ज़रिए भारत ने तुर्की और सीरिया में जिस तरह से मदद की है वो सराहनीय है. इसमें उनके C17 ग्लोबमास्टर जहाज़ों ने भी अहम भूमिका निभाई है".

क्या C17 ग्लोबमास्टर काफ़ी हैं?

भारतीय वायुसेना फ़िलहाल अमेरिकी और रूसी मालवाहक हवाई जहाज़ों पर निर्भर है.

अमेरिका की बोइंग वाले C-17 ग्लोबमास्टर, अमेरिका की लॉकहीड मार्टिन वाले C-130J, रूस के इल्यूशिन IL-76s और एंटोनोव AN-32 हवाई जहाज़ विशालकाय भारतीय सेना की और सीमा पर तैनात सैकड़ों हज़ारों फ़ौजियों की रसद और असलहों की ज़रूरतें पूरी करते हैं.

लेकिन जानकारों का मत है कि पाकिस्तान और चीन की सीमाओं पर ज़रूरतें बढ़ रही हैं.

डिफ़ेंस एक्सपर्ट मारूफ़ रज़ा को लगता है, "चीन की सीमा पर भारतीय सेनाएं अपनी मौजूदगी पहले के मुक़ाबले ज़्यादा मज़बूत करती दिख रहीं हैं और इसमें वायुसेना के मालवाहक जहाज़ों की अहम भूमिका रहेगी क्योंकि कम समय में वही उस विशालकाय और मुश्किल बॉर्डर पर ज़रूरत पूरी करेंगे."

एक दूसरी चुनौती इस बात की भी रहेगी कि वायुसेना में ज़्यादातर रूसी मालवाहक विमान 1980 के दशक या 90 के शुरुआती सालों में ख़रीदे गए थे और इनके रखरखाव में खर्च भी ज़्यादा आता है और समय भी ख़ासा लगता है.

साल 2015 में भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की एक रिपोर्ट में भी इस बात का ज़िक्र मिलता है कि ज़्यादा मालवाहक जहाज़ों की ज़रूरत है.

लेकिन फ़िलहाल तो यही लगता है कि एक के बाद एक रेस्क्यू मिशन में भारत का भरोसा C17 ग्लोबमास्टर हवाई जहाज़ों पर अटल होता जा रहा है.

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