बांग्लादेश में चुनाव हाईजैक, विपक्षी उम्मीदवार भी शेख हसीना के, लोकतंत्र का हरण चुप देख रहा भारत.. जानें सबकुछ
Bangladesh Election 2024: बांग्लादेश में रविवार यानि 7 जनवरी को मतदान होने वाला है, जिसमें अवामी लीग की निवर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना एक और जीत की तरफ बढ़ रही हैं, क्योंकि ज्यादातर विपक्षी दलों ने चुनाव का बहिष्कार कर दिया है।
शेख हसीना की अवामी लीग की सरकार पर ये आरोप लग रहा है कि वह चुनाव को निष्पक्ष बनाने के लिए स्वतंत्र या "डमी" उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की कोशिश कर रही है।

बांग्लादेश में यह पहली बार नहीं है जब विपक्ष ने चुनाव बहिष्कार का आह्वाहन किया है। इससे पहले 2014 में भी विपक्ष ऐसा कर चुका है। तब अवामी लीग को 300 में से 263 सीटों पर सफलता हासिल हुई थी। इस बार भी माना जा रहा है कि अवामी लीग उसी प्रदर्शन को दोहरा सकता है।
बांग्लादेश में कैसे होते हैं चुनाव?
बांग्लादेश की एक सदनीय जातीय संसद में 350 सदस्य होते हैं, जिनमें से 300 सांसद हर पांच साल में होने वाले राष्ट्रीय चुनावों में चुने जाते हैं। सत्तारूढ़ दल/गठबंधन द्वारा नियुक्त महिलाओं के लिए पचास सीटें आरक्षित हैं।
यानि, बांग्लादेश के संसद में राज्यसभा नहीं होते हैं।
भारत की तरह, बांग्लादेश भी फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली का पालन करता है। प्रधानमंत्री सरकार का मुखिया और देश का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति होता है।
रविवार को सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक वोट डाले जाएंगे और इस बार कुल 1,896 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। प्रति सीट औसतन 6.32 उम्मीदवार। लगभग 5 प्रतिशत उम्मीदवार महिलाएं हैं।
कौन कौन सी हैं बड़ी पार्टियां?
जबकि बांग्लादेश एक बहुदलीय प्रणाली है, लेकिन 1990 के दशक से बांग्लादेश में सिर्फ एक ही पार्टी का देश में एकाधिकार रहा हैष दो प्रमुख पार्टियां हैं, जिनमें एक शेख हसीना की अवामी लीग और दूसरी मुख्य विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी हैं, जिसकी सर्वेसर्वा बेगम खालिदा जिया हैं। 1991 के बाद से, अवामी लीग ने चार बार सत्ता का आनंद लिया है, जबकि बीएनपी ने दो बार सरकार का नेतृत्व किया है।
अवामी लीग की स्थापना 1949 में पूर्वी पाकिस्तान में मुस्लिम लीग के विकल्प के रूप में बांग्लादेशी राष्ट्रवादियों द्वारा की गई थी। शेख मुजीबुर रहमान के तहत, अवामी लीग ने बांग्लादेश की आजादी के लिए संघर्ष का नेतृत्व किया। शेख हसीना, जो 2009 से प्रधान मंत्री हैं, वो मुजीब की बेटी हैं।

बीएनपी की स्थापना 1978 में पूर्व सेना जनरल जियाउर रहमान ने की थी। 1981 में ज़ियाउर रहमान की हत्या के बाद, उनकी पत्नी खालिदा ज़िया ने 2018 तक पार्टी का नेतृत्व किया, जब उन्हें जेल में डाल दिया गया। वह 2020 से घर में नजरबंद हैं। बीएनपी का नेतृत्व वर्तमान में खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान कर रहे हैं, जो लंदन में निर्वासन में रह रहे हैं।
बीएनपी पिछले कई वर्षों से उथल-पुथल वाली स्थिति में है। हालांकि, 2022 के बाद से शेख हसीना के कार्यकाल के खिलाफ भी लोगों का गुस्सा भड़का है, बावजूद कई लोगों ने इसे खारिज कर दिया है। बीएनपी इस बार चुनाव का बहिष्कार कर रही है। बीएनपी ने चुनाव को फर्जी करार दिया है।
बांग्लादेश में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी जातीय पार्टी (इरशाद) है, जिसके पास वर्तमान में जातीय संसद में 27 सीटें हैं। वह इस चुनाव में हिस्सा ले रही है।
चुनाव में कौन कौन से हैं मुद्दे?
बांग्लादेश में चुनाव एकतरफा होने वाले हैं और शेख हसीना का चुनाव जीतना तय है, लिहाजा चुनावी मुद्दे गौण माने जा रहे हैं।
बांग्लादेश की पक्षपातपूर्ण सरकारों के तहत चुनाव हमेशा विवादास्पद रहे हैं। 1973 में मुजीब की जीत से लेकर 1979 में जियाउर रहमान के तहत हुए चुनाव और फिर 1986 और 1988 में एच एम इरशाद के तहत हुए चुनाव से लेकर 1996, 2014 और 2018 में हुए चुनाव तक.. हर चुनाव सवालों के घेरे में रहे हैं।
यही कारण है, कि 1990 में एक कार्यवाहक सरकार प्रणाली स्थापित की गई थी, और न्यायमूर्ति शहाबुद्दीन अहमद की सरकार के तहत 1991 के चुनाव को अब तक के सबसे निष्पक्ष चुनावों के रूप में देखा गया था।
1996 में (खालिदा के 12-दिवसीय शासन के बाद), 2001 और 2008 में कार्यवाहक सरकारों के तहत हुए चुनावों को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निष्पक्ष माना गया।
लेकिन, साल 2006-07 में कार्यवाहक आर्मी सरकार ने अपना कार्यकाल बढ़ा लिया और तमाम लोकतांत्रिक नेताओं को जेल भेज दिया। लिहाजा, जब 2011 में फिर से शेख हसीना प्रधानमंत्री बनीं, तो उन्होंने कार्यवाहक सरकार का तंत्र खत्म कर दिया।
उन्होंने कहा था, ''हम अनिर्वाचित लोगों को राष्ट्रीय चुनावों की निगरानी करने की अनुमति नहीं दे सकते।''
लेकिन विपक्ष ने आरोप लगाया है, कि इससे शेख हसीना को बांग्लादेश में चुनावों में धांधली जारी रखने और विपक्ष को खत्म करने की अनुमति मिली है। बीएनपी 2014 से चुनावों का बहिष्कार कर रही है। बीएनपी की मांग रही है, कि देश में आम चुनाव एक कार्यवाहक सरकार के नेतृत्व में हो।

चुप क्यों देख रहा है भारत?
शेख हसीना की निरंकुश शासन के बावजूद, वह भारत की पक्की दोस्त बनी हुई हैं और बांग्लादेश का नेतृत्व करने के लिए नई दिल्ली की पसंदीदा उम्मीदवार हैं।
भारत के साथ उनका रिश्ता 1970 के दशक से है, जब भारत उनके पिता मुजीब के नेतृत्व में बांग्लादेश के मुक्ति आंदोलन का सबसे बड़ा समर्थक था। सत्ता में उनके चार कार्यकाल भारत-बांग्लादेश संबंधों को आगे बढ़ाने में बेहद उपयोगी रहे हैं - अधिकांश सीमा मुद्दों को सुलझा लिया गया है, आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाया गया है, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हसीना ने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा हितों का दृढ़ता से समर्थन किया है।
महत्वपूर्ण रूप से, खालिदा जिया की बीएनपी, भारत के लिए बिल्कुल अच्छी नहीं रही हैं। खालिदा के शासनकाल के दौरान, बांग्लादेश भारत विरोधी मंसूबों वाले आतंकवादी और उग्रवादी संगठनों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह बन गया, क्योंकि उन्होंने इस्लामी कट्टरपंथियों को सत्ता साझा करने दी। पाकिस्तान की आईएसआई द्वारा समर्थित इन संगठनों ने पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश सीमा पर आतंक मचाया।
इसके अलावा, बांग्लादेश सीमा पर झड़पें लगातार बढ़ती गईं। 2001 में, बांग्लादेशी अर्धसैनिक बलों ने सीमा संघर्ष में 16 बीएसएफ गार्डों की हत्या कर दी और उनके अंग-भंग कर दिए थे।
दूसरी तरफ, हसीना बांग्लादेश में आईएसआई और इस्लामी कट्टरपंथियों को सत्ता से बाहर रखने की अपनी प्रतिबद्धता पर दृढ़ रही हैं, खासकर 2004 में जब उनकी हत्या की नाकाम कोशिश की गई थी। उनकी हत्या की कोशिश जमात-ए-इस्लामी सहित कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों ने की थी, और उस वक्त बीएनपी की सरकार थी, लिहाजा उन्होंने इस्लामिक कट्टरपंथियों को सत्ता से काफी दूर रखा है और ढाका में आईएसआई की गतिविधियां भी अब नगण्य हैं। लिहाजा, भारत के हित में शेख हसीना का ही फिर से जीतना अच्छा है।












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