ग्वादर बंदरगाह को लेकर बलूचों का विशालकाय प्रदर्शन, पाकिस्तान में बर्बाद होंगे अरबों के चीनी प्रोजेक्ट?
यह पहली बार नहीं है जब ग्वादर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, लेकिन इस बार प्रदर्शनकारी उठने के मूड में नहीं है। पिछले 26 दिनों से चीन और इमरान खान सरकार के खिलाफ कई लाख लोग सड़कों पर बैठे हैं।
इस्लामाबाद, दिसंबर 12: ग्वादर में अरबों रुपये का निवेश कर सीपीईसी के साकार होने का सपना देखने वाले चीन को ग्वादर के लोगों ने 440 वोल्ट का करंट देना शुरू कर दिया है और अब इमरान सरकार समझ नहीं पा रही है, कि आखिर ग्वादर में लोगों के विशालकाय प्रदर्शन को कैसे रोका जाए और चायनीज निवेश को लेकर लोगों को कैसे समझाया जाए। नवंबर के दूसरे हफ्ते से सीपीईसी के तहत बनने वाले ग्वादर बंदरगाह की मेगा विकास योजनाओं के खिलाफ बलूचिस्तान के ग्वादर में लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जिसने इमरान सरकार को टेंशन में ला दिया है।

ग्वादर में विशालकाय प्रदर्शन
'ग्वादर को हुकूक दो तहरीक' (ग्वादर आंदोलन को अधिकार दें) के तहत रैली कर रहे प्रदर्शनकारियों ने बंदरगाह के विकास में स्थानीय लोगों के हाशिए पर धकेलने के खिलाफ भारी प्रदर्शन कर रहे हैं। ग्वादर के स्थानीय लोग इस बात से नाराज हैं, कि न केवल उन्हें तमाम प्रोजेक्ट्स से बाहर किया जा रहा है, बल्कि उनकी वर्तमान आजीविका भी खतरे में है। ग्वादर और तटीय बलूचिस्तान के आसपास के इलाकों, जिनमें तुर्बत, पिशकन, ज़मरान, बुलेदा, ओरमारा और पासनी शामिल हैं, वहां के लोगों ने इमरान सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है।

26 दिनों से जारी है प्रदर्शन
यह पहली बार नहीं है जब ग्वादर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, लेकिन इस बार प्रदर्शनकारी उठने के मूड में नहीं है। पिछले 26 दिनों से चीन और इमरान खान सरकार के खिलाफ कई लाख लोग सड़कों पर बैठे हैं और मांगे मनवाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। बलूचिस्तान की घोर रूढ़िवादिता के बावजूद बड़ी संख्या में महिला प्रदर्शनकारी सामने आई हैं। विरोध का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व क्षेत्र के जमात-ए-इस्लामी नेता मलौना हिदायत उर रहमान कर रहे हैं। जो पारंपरिक रूप से पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान के सहयोगी रहे हैं। जेआई के राष्ट्रीय नेता सिराज उल हक ने भी प्रदर्शनकारियों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए ग्वादर का दौरा किया है।

स्थानीय लोगों की चिंता
पाकिस्तान के चार प्रांतों में बलूचिस्तान के पास सबसे ज्यादा प्राकृतिक संसाधन हैं, बावजूद इसके सबसे कम विकसित राज्यों में इसकी पहचान है। इस क्षेत्र के लोगों की आजीविका का मुख्य साधन मछली पकड़ना है। बलूचिस्तान में पीने के पानी, बिजली और यहां तक कि गैस की पर्याप्त मात्रा में है, लेकिन स्थानीय लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पाता है, जिसके खिलाफ लोगों का गुस्सा चमर पर रहता है। पाकिस्तान की डॉन अखबार के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों ने 19 मांगें रखी हैं।

सरकार के सामने 19 मांगे
जिनमें एक प्रमुख मांग तो यह है, कि बंदरगाह को विकसित करने वाली चीनी कंपनी को कहा जाए, कि स्थानीय ग्वादर के लोगों को रोजगार मिले, जबकि वहां काम करने वाले चीनी मजदूरों को निकाला जाए। लेकिन, पहली मांग मानना ही इमरान सरकार के लिए नामुमकिन है। इस वक्त प्रोजेक्ट में काम करने वाले सभी मजदूर चीन के हैं। वहीं, स्थानीय लोगों की दूसरी मांग विदेशी "ट्रॉलर माफिया" पर नकेल कसने की मांग है, जो ग्वादर सागर के समुद्री संसाधनों को छीन रहे हैं। ये काम भी चीन कर रहा है, लिहाजा इमरान सरकार ये मांग भी नहीं मान सकती है।

मछली पकड़ते हैं चीनी जहाज
यह मांगे पहली बार जून में उठाई गई थीं, जब सैकड़ों मछुआरों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज के सदस्यों ने चीनी मछली पकड़ने वाले ट्रॉलरों को सरकार द्वारा लाइसेंस दिए जाने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था। नेशनल पार्टी और बलूच छात्र संगठन और एक मछुआरा संगठन ने ग्वादर प्रेस क्लब के बाहर धरना भी दिया था। प्रदर्शनकारियों ने बताया कि, ग्वादर के मछुआरों ने इस आश्वासन के बाद बंदरगाह के विकास के लिए अपने मछली पकड़ने के स्थानों को छोड़ दिया था, कि इससे उनकी आर्थिक स्थिति में काफी सुधार होगा, लेकिन, उनकी मौजूदा स्थिति और बदतर हो गई, जब सिर्फ चीनी मछली पकड़ने वाले जहाजों को ही मछली पकड़ने की इजाजत है, जो पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान भी पहुंचा रहे हैं।

चीन के साथ पाकिस्तान सरकार
ग्वादर के लोगों का गुस्सा इस बात पर भी काफी भड़का हुआ है और लोग इसलिए भी निराश हैं, क्योंकि इमरान सरकार के मत्स्य मंत्री लगातार चीनी मछुआरों के पक्ष में बयान दे रहे हैं, लिहाजा स्थानीय लोग फौरन चीनी जहाजों के लाइसेंस रद्द करने की मांग कर रहे हैं। इस हफ्ते वॉयस ऑफ अमेरिका की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि, चीनी जहाज ग्वादर में ना सिर्फ मछलियों का भारी शिकार कर रही हैं, बल्कि दूसरे जलीय जीवों को भी मार रहे हैं। अमेरिकी रिपोर्ट को चीन की सरकारी मीडिया ने ग्लोबल टाइम्स ने खारिज कर दिया है और दावा कर दिया है कि, चीन की दिग्गज चायना कंस्ट्रक्शन कंपनी कम्युनिकेशन कंस्ट्रक्शन कंपनी (सीसीसीसी) 144 मिलियन डॉलर की लागत से एक्सप्रेसवे का निर्माण कर रही है, जिसने स्थानीय लोगों को 75 मछली पकड़ने का जहाज दान करने का फैसला किया है।

चीन की सबसे महत्वपूर्ण परियोजना
विश्लेषकों का कहना है कि, इस वक्त ग्वादर में बंदरगाह का विकास, शायद सीपीईसी प्रोडेक्ट के लिए रणनीतिक तौर पर सबसे महत्वपूर्ण परियोजना है, और वहां चीनी भागीदारी सीपीईसी प्रोजेक्ट डील से भी कम से कम 10 साल पहले की गई है। ग्वादर बंदरगाह पर काम जनरल परवेज मुशर्रफ के 10 साल के शासनकाल के दौरान शुरू हुआ था, जिन्होंने इसे एक रणनीतिक ऊर्जा गलियारे के रूप में पेश किया था, जो चीन को मध्य पूर्व से अपने तेल आयात के लिए समुद्री मार्ग का विकल्प प्रदान करेगा। अब यह राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बेल्ट एंड रोड पहल का अभिन्न अंग है।

चीनी प्रोजेक्ट से बलूचों में भारी नाराजगी
चीनी प्रोजेक्ट शुरू होने के साथ ही बलूच राष्ट्रवादी उनका बहिष्कार कर रहे हैं और उनमें काफी नाराजगी भी है। वहीं, बलूच लिबरेशन आर्मी के साथ साथ कई ग्रुप्स के निर्माण हो गये, जिन्होंने ग्वादर और उसके आसपास चीनी प्रोजेक्ट्स को काफी निशाना बनाया है। सीपीईसी के उड़ान भरने के बाद ही हमले बढ़े हैं। 2019 में एक आधिकारिक चीनी प्रतिनिधिमंडल की यात्रा के दौरान सेरेना पर हमला हुआ था। जवाब में, भारी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों को बंदरगाह पर तैनात किया गया था। वहीं, उस घटना के बाद से ग्वादर शहर में भारी संख्या में चौकियों का निर्माण किया गया और स्थानीय लोगों की हर 100 मीटर की दूरी पर जांच की जाती है, जिससे भी लोगों में भारी नाराजगी है और लोग चौकियों की संख्या कम करने की मांग कर रहे हैं।

भारत और पश्चिमी देशों की चिंता
ग्वादर बंदरगाह में चीनी निवेश को लेकर भारत और पश्चिमी देशों में कई चिंताएं हैं। भारत की प्रमुख चिंता ये है, कि ग्वादर बंदरगाह, चीन को अरब सागर और हिंद महासागर तक रणनीतिक पहुंच प्रदान करता है, जिसे चीन न केवल एक व्यापार एंट्रेपोट के रूप में विकसित कर रहा है, बल्कि पीएलएएन (चीनी नौसेना) द्वारा उपयोग के लिए दोहरे उद्देश्य वाले बंदरगाह के रूप में विकसित किया जा रहा है और इसका विस्तार करने का इरादा है हिंद महासागर क्षेत्र में म्यांमार में क्यौकप्यू और श्रीलंका में हंबनटोटा के साथ चीनी उपस्थिति को कनेक्ट करना। पश्चिम एशिया में महत्वपूर्ण सैन्य हितों के साथ, अमेरिका भी ग्वादर में चीनी उपस्थिति के बारे में चिंतित है।

पाकिस्तान ने किया इनकार
हालांकि, इस सप्ताह की शुरुआत में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में पाकिस्तान के एनएसए मोईद यूसुफ ने इस बात से इनकार किया कि, चीन को पाकिस्तान में किसी भी सैन्य ठिकाने की पेशकश की गई थी। उन्होंने कहा कि देश में चीनी-पाकिस्तानी "आर्थिक आधार" है, "जहां कोई भी देश निवेश कर सकता है। अमेरिका, रूस और मध्य पूर्व को भी यही पेशकश की गई थी।" लेकिन हिंद-प्रशांत में चीन की महत्वाकांक्षाओं और उसके साथ पाकिस्तान के घनिष्ठ सैन्य संबंधों को देखते हुए भारत के लिए चिंता हमेशा बनी रहेगी। संयुक्त अरब अमीरात में एक गुप्त चीनी सैन्य अड्डे की हालिया खोज ने भी भारत और अमेरिका की चिंताओं को बढ़ा दिया है।












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