अमेरिका के व्हाइट हाउस तक पहुंची नरेंद्र मोदी की लहर, ठंडा पड़ा विरोध

परिणाम आने के तुरंत बाद सात समुंदर पार अमेरिकी कांग्रेस में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का विरोध धीरे-धीरे ठंडा पड़ने लगा है। इस प्रस्ताव को पटरी से उतारने के प्रयास में जुटी अमेरिका भारत राजनीतिक कार्रवाई समिति ने इस प्रस्ताव की निंदा की है और कहा है कि इस प्रस्ताव का मकसद 2002 के गुजरात दंगों को कोई 11 वर्षो बाद रेखांकित करके भारत में आगामी चुनाव को प्रभावित करने का है।
रिपब्लिकन सदस्यों -जो पिट्स और फ्रैंक वोल्फ द्वारा प्रस्तावित हाउस रिसोल्यूशन 417 में पिछले महीने कहा गया था कि धार्मिक आजादी का उल्लंघन करने के आधार पर मोदी को वीजा न देने की अमेरिकी सरकार से सिफारिश की जाती है। इसमें यह आग्रह भी किया गया था था, "सभी पार्टियां, धार्मिक संगठन धार्मिक शोषण, उत्पीड़न और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा का सार्वजनिक तौर पर विरोध करेंगी, खासतौर से भारत में 2014 में होने वाले आम चुनावों की तैयारी में।"
सदन में विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष एड रॉयस, जिनके पास प्रस्ताव भेजा गया था, ने सप्ताहांत में एक बयान में कहा था, "दोनों देश बहुत से समान मूल्यों और सामरिक हितों को साझा करते हैं। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि एशिया में पुर्नसंतुलन के लिए भारत अमेरिका का केंद्र है।"
सुप्रीम कोर्ट को नहीं मिले सबूत
सदन की विदेशी मामलों की एशिया प्रशांत उपसमिति के रिपब्लिकन अध्यक्ष स्टीव चेबोट ने दो दिन पहले प्रस्ताव के मूल सहप्रस्तावक से अपना नाम वापस ले लिया है। एशिया प्रशांत उपसमिति में शामिल शीर्ष डेमोक्रेट एनी फेलिओमावेगा ने प्रस्ताव की अलोचना करते हुए कहा, "प्रस्ताव इस बात पर ध्यान देने में विफल रहा कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय को मोदी के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिले हैं। समिति यह सुनिश्चित करने में कोई कसर नही छोड़ेगी कि अमेरिकी कांग्रेस जानबूझकर या अनजाने में भारत के होने वाले चुनावों के परिणामों को प्रभावित न करे। भारत संप्रभु राज्य है और इसके नागरिकों को अपना नेता चुनने का अधिकार है।"












Click it and Unblock the Notifications