ट्रंप ने ईरान न्यूक्लियर डील को ठुकराया, महंगा होगा तेल, भारत पर पड़ेगा बुरा असर
नई दिल्ली। अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को आखिरकार वो ही निर्णय लिया, जिसकी पूरी दुनिया में एकतरफा आशंका जताई जा रही थी। डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में ईरान पर हमला बोलते हुए 2015 में हुई न्यूक्लियर डील से हटने का फैसला लिया है। ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ पिछले सरकार के दौरान हुई न्यूक्लियर डील बिल्कुल भी जायज नहीं है, क्योंकि यह आतंकवाद का समर्थन करती है। साथ ही ट्रंप ने कहा कि अमेरिका उनके सहयोगी देशों से बात कर ईरान पर नए सेंक्शन के बारे में भी विचार करेगी। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के इस फैसले से ना सिर्फ मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ेगा, बल्कि पूरे अंतराष्ट्रीय राजनीति में तेजी से बदलाव होगा। इस बीच ट्रंप के इस फैसले को लेकर भारत ने भले ही अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है, लेकिन ईरान के साथ नई दिल्ली के कई हित जुड़े होने की वजह से इसका विपरीत प्रभाव देखने को मिलेगा।

ऑयल के दाम बढ़ेंगे, तो होगी महंगाई
ट्रंप के इस फैसले से ग्लोबल ऑयल मार्केट में बहुते तेजी से बदलाव देखने को मिलेगा। ऑयल इंपोर्ट के मामले में सऊदी और ईराक के बाद भारत के लिए ईरान तीसरा सबसे बड़ा मुल्क है। यहां तक कि अक्टूबर 2016 में ईरान भारत के लिए सबसे बड़ा ऑयल सप्लायर्स था। इस निर्णय के बाद प्रति बेरल ऑयल के दाम बढ़ेंगे, जिसका सीधा प्रभाव भारत पर पड़ेगा। तेल के दाम बढ़ने से देश में महंगाई बढ़ने के पूरे-पूरे आसार है। इसी साल फरवरी में ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी जब नई दिल्ली आए थे, तब भारत सरकार ने तेहरान के साथ 2018-19 में लगभग डबल 3,96,000 bpd (बैरल प्रति दिन) इंपोर्ट करने का फैसला लिया था। यहां तक कि भारत अपनी करेंसी (नॉन-डॉलर) में भी ईरान से तेल खरीद सकता है। ईरान पर सेंक्शन लगने से दोनों देशों के व्यापार पर भी असर पड़ेगा।

चाबहार पड़ेगा धीमा, तो चीन-पाक करेगा एंट्री
ईरान के साथ ओमान सागर में भारत चाबहार बंदरगाह को खड़ा कर रहा है, जो कम समय में अफगानिस्तान के साथ व्यापार करने और स्ट्रैटजिक पॉलिटिक्स के हिसाब से बहुत महत्वपूर्ण है। अब अमेरिका अगर ईरान पर सेंक्शन लगाएगा तो चाबहार प्रोजेक्ट पर चल रहा काम धीमा पड़ेगा। पोर्ट पर 500 मिलियन डॉलर खर्च करने की योजना में भारत अभी तक 85 मिलियन डॉलर खर्च करने की सहमति बना चुका है। पिछले साल भारत ने अपने चाबहार पोर्ट से 1.1 मिलियन टन गेहूं भेजा था, तब उस वक्त अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने अपना उदार रवैया अपनाते हुए कहा था कि हमारा टार्गेट ईरान की सरकार है, वहां के लोग नहीं। लेकिन, टिलरसन के जाने के बाद अब व्हाइट हाउस में पोंपेयो आए हैं, जो ईरान के खिलाफ बहुत ही कठोर निर्णय लेने की पहले से ही बात कह चुके हैं और इसका परिणाम भी दिख गया है। साथ ही यह भी डर है कि अगर चाबहार प्रोजेक्ट इससे प्रभावित हुआ तो रूहानी सरकार चीन और पाकिस्तान को इसमें शामिल कर सकता है, जो भारत बिल्कुल नहीं चाहता।

SCO में ईरान हुआ शामिल, तो अमेरिका के साथ रिश्तों पर पड़ेगा असर
भारत पिछले साल पाकिस्तान के साथ शंघाई को-ऑपरेशन ऑग्रेनाइजेशन (SCO) का मेंबर बना था। इस बीच इस साल चीन ने कहा है कि वे इस ग्रुप में ईरान को भी शामिल करने की योजना बना रहे हैं। चीन और रूस मिलकर ईरान को एससीओ में शामिल करने का काम कर रहे हैं और अगर इस साल एससीओ इस प्रपोजल को एक्सेप्ट करता है, तो भारत ऑटोमेटिक ही उस ब्लॉक में शामिल हो जाएगा, जो एंटी-अमेरिका की तरह दिखेगा। इस कदम से सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इजरायल जैसे ईरान के अन्य प्रतिद्वंद्वियों के साथ भारत के रिश्तों पर असर पड़ेगा।












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