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Afghanistan: तालिबान के राज में रख सकते हैं गुलाम, सालों पुरानी मुगलों की परम्परा दोबारा लागू, महिलाओं को खतरा

Afghanistan: तालिबान ने अफगानिस्तान में एक नई Criminal Procedure Code को औपचारिक रूप से लागू कर दिया है। इस कानून पर तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने साइन किए हैं। इस फैसले के बाद देश के अंदर और बाहर मानवाधिकार संगठनों में गुस्सा और चिंता दोनों देखने को मिल रही है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को डर है कि यह कानून अफगानिस्तान की कानूनी और राजनीतिक व्यवस्था को और ज्यादा सख्त के साथ-साथ भेदभाव भरा बना देगा।

जारी हुई नई आपराधिक संहिता

ये नया कानून 4 जनवरी 2026 को जारी किया गया था और इसे पूरे अफगानिस्तान की अदालतों में भेजा गया है। अफगान मानवाधिकार संगठन 'रवादारी' ने इस दस्तावेज़ को हासिल किया है। यह संगठन मानवाधिकार उल्लंघनों पर नजर रखता है और जवाबदेही की मांग करता है। इस संहिता में कुल 3 खंड, 10 अध्याय और 119 अनुच्छेद शामिल हैं।

Afghanistan

अनुच्छेद 9 और समाज का चार वर्गों में बंटवारा

इस विवाद के केंद्र में अनुच्छेद 9 है। इसमें अफगान समाज को चार वर्गों में बांटा गया है -
1. धार्मिक विद्वान (उलेमा या मुल्ला)
2. अभिजात वर्ग (अशरफ)
3. मध्यम वर्ग
4. निम्न वर्ग

इस व्यवस्था के तहत अब किसी अपराध की सजा अपराध की गंभीरता से नहीं, बल्कि आरोपी की सामाजिक स्थिति से तय होगी।

एक ही अपराध, लेकिन अलग-अलग सजा

संहिता के मुताबिक अगर कोई धार्मिक विद्वान अपराध करता है, तो उसे सिर्फ सलाह दी जाएगी। अगर अपराधी अभिजात वर्ग से है, तो उसे अदालत में बुलाकर सलाह दी जाएगी। वहीं मध्यम वर्ग के व्यक्ति को उसी अपराध के लिए जेल भेजा जा सकता है।

निचले तबकों के लिए सबसे कठोर सजा

लेकिन अगर वही अपराध कोई "निम्न वर्ग" का व्यक्ति करता है, तो उसे जेल के साथ-साथ शारीरिक दंड भी दिया जा सकता है। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इससे साफ है कि गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों को सबसे ज्यादा सजा झेलनी पड़ेगी।

धर्मगुरुओं को पूरी कानूनी छूट

मानवाधिकार समूहों का कहना है कि यह कानून धार्मिक नेताओं और प्रभावशाली लोगों को लगभग पूरी आपराधिक छूट देता है। वहीं आम और गरीब अफगान नागरिकों के लिए सजा ज्यादा सख्त और हिंसक हो जाती है।

कानून में 'स्वतंत्र' और 'गुलाम' का जिक्र

इस कानून का एक और बेहद विवादित पहलू यह है कि इसमें "स्वतंत्र व्यक्ति" और "गुलाम" जैसे शब्दों का बार-बार इस्तेमाल किया गया है। कई अनुच्छेदों में सजा तय करते समय इन दोनों के बीच फर्क किया गया है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक इससे महिलाओं के लिए और ज्यादा खतरा बढ़ जाएगा।

अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ गुलामी की मान्यता

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह शब्दावली गुलामी को कानूनी मान्यता देने जैसी है, जबकि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत गुलामी हर हाल में प्रतिबंधित है। इसके बावजूद तालिबान की संहिता इसे एक सामान्य कानूनी श्रेणी मानती है।

कबूलनामा और गवाही पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता

यह कानून अपराध साबित करने के लिए मुख्य रूप से "कबूलनामे" और "गवाही" पर निर्भर करता है। स्वतंत्र जांच की जरूरत को लगभग खत्म कर दिया गया है और कई अपराधों के लिए न्यूनतम या अधिकतम सजा भी तय नहीं की गई है।

यातना और जबरन कबूलनामे का खतरा

अधिकार समूहों ने चेतावनी दी है कि इससे यातना और जबरन कबूलनामे का खतरा बहुत बढ़ जाएगा, खासकर ऐसी व्यवस्था में जहां न्यायाधीश और पुलिस पर कोई निगरानी या जवाबदेही नहीं है।

शारीरिक दंड और अस्पष्ट अपराधों का विस्तार

यह संहिता शारीरिक दंड जैसे कोड़े मारने को और ज्यादा बढ़ावा देती है। इसमें "नृत्य" या "भ्रष्टाचार के जमावड़े में शामिल होना" जैसे अस्पष्ट अपराध जोड़े गए हैं, जिससे न्यायाधीशों को मनमानी की पूरी छूट मिल जाती है।

तालिबान का असली इरादा क्या है?

कई जानकारों का मानना है कि यह कानून साफ दिखाता है कि तालिबान सिर्फ सख्त कानून नहीं ला रहा, बल्कि पूरे कानूनी सिस्टम को विशेषाधिकार, वफादारी और धार्मिक हैसियत के आधार पर दोबारा बना रहा है।

कुछ लोग कानून से ऊपर, बाकी हमेशा कमजोर

रवादारी ने कहा, "धर्मगुरुओं और धार्मिक अभिजात वर्ग को कानून से ऊपर रखकर तालिबान ने साफ कर दिया है कि कुछ लोग अछूत हैं और बाकी हमेशा कुचले जाएंगे।"

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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