Afghanistan: कितना बदल गया ‘काबुलीवाला’, अब इसके झोले में किशमिश नहीं बंदूक है
नई दिल्ली, 18 अगस्त। एक काबुलीवाला था रहमत। उसके झोले में मेवा भरा रहता। कलकत्ता की गलियों में घूम घूम कर वह मेवा बेचता। लंबा-तगड़ा लेकिन दिल मोम की तरह मुलायम। सौदा बेचते बेचते पांच साल की बच्ची मीनी से रहमत की ऐसी दोस्ती हुई कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर को एक कहानी लिखनी पड़ी- काबुलीवाला। ये कहानी उन्होंने 1941 के पहले लिखी।

अब एक कहानी 2021 के काबुलीवाले की। ये काबुलीवाला बिल्कुल अलग है। इसके झोले में किशमिश- मुनक्का नहीं बल्कि बम और बंदूक है। रहमत तो रहमदिल था लेकिन मौजूदा काबुल का 'काबुली' मुल्ला बरादर बेहद बेरहम है। उसके हथियारबंद लोगों ने एक लड़की को केवल इस लिए मार डाला क्यों कि उसने चुस्त लिबास पहन रखी थी। कितना फर्क आ गया है तब और अब के काबुलीवाले में।

गुरुदेव का काबुलीवाला
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की एक चर्चित कहानी है 'काबुलीवाला'। आजादी के पहली की बात है। अफगानिस्तान के किसी भी इलाके के रहने वाले लोगों को तब भारत में काबुली कहा जाता था। काबुल से लोग किशमिश, मुनक्का, बादाम, अखरोट लेकर भारत आते थे। शहर-शहर घूम कर वे उधार या नकद मेवा बेचते। जब सर्दियां शुरू होतीं तो वे अपना उधारी वसूल कर वतन लौट जाते। गुरुदेव टैगोर ने कलकत्ता की गलियों में मेवा बेचने वाले एक ऐसे ही काबुलीवाले की कहानी लिखी है। इस कहानी का मुख्य पात्र है रहमत। रहमत अपनी छोटी बेटी को अफगानिस्तान में छोड़ कर सौदागरी के लिए कलकत्ता आया है। उसके पास अपनी बेटी की एक निशानी भी है। एक कागज पर उसकी हथेलियों की छाप है।

दिल को छूने वाली कहानी
इस कागज को देख कर ही रहमत परदेश में अपनी बेटी को याद करते रहता है। मेवा बेचने के दौरान उसका परिचय एक छोटी बच्ची मिनी से होता है। मिनी की उम्र उसकी बेटी जितनी ही है। वह मिनी को बहुत मानने लगता है। मिनी भी उसे देख कर पुकारने लगती है, ओ काबुलेवाले, ओ काबुलीवाले ! इसके बाद का घटनाक्रम बहुत मार्मिक है। यह कहानी दिल को छू लेने वाली है। इस कालजयी कहानी पर पर दो फिल्में बनी हैं। 1957 में तपन सिन्हा ने इसी नाम से बांग्ला में फिल्म बनायी थी। 1961 में काबुलीवाला के नाम से एक हिन्दी फिल्म भी बनी जिसका निर्देशन हेमन गुप्त ने किया था और निर्माता थे बिमल रॉय। इस फिल्म में रहमत के किरदार को बलराज साहनी ने जीवंत कर दिया था।

इस काबुलीवाले के झोले में किशमिश नहीं बंदूक है
17 अगस्त 2021 का काबुल। हाथों में असॉल्ट राइफल लिये सड़कों पर गश्त करते लड़ाके। हर तरफ खौफ है। अनिश्चित भविष्य को लेकर गहरी हताशा है। सत्ता पर काबिज होने वाले तालिबान के नुमाइंदे लोगों को अमन चैन का भरोसा दिला रहे हैं। वे कुछ शर्तों के साथ महिलाओं को हक देने की भी बात कर रहे हैं। वे यहां तक सफाई दे रहे हैं कि उन पर औरतों को जबरन उठाने का आरोप बेबुनियाद है। लेकिन आम अफगानी लोगों को इन बातों पर भरोसा नहीं। खास कर औरतों को। लोगों का कहना है कि अभी तालिबान अपनी सत्ता को मान्यता दिलाने को लिए दुनिया के सामने उदारवादी चेहरा दिखा रहा है। जैसे ही शरिया कानून लागू होगा और उस पर कड़ाई से अमल शुरू होगा, जुल्म का सिलसिला शुरू हो जाएगा। तालिबान के आये एक दो दिन ही हुए हैं कि रोजमर्रा की जिंदगी अचानक से बदल गयी है। जिन सड़कों पर युवा लड़कियां जींस, ओवरकोट और स्कार्फ में चलती थीं अब वे दिखायी भी नहीं देती। एक दो औरतें दिख भी जाती हैं तो उनका पूरा शरीर भारीभरकम बुरके में ढंका रहता है। बाजार में भीड़ दिखायी नहीं पड़ रही। औरतों को अपने पुरुष रिश्तेदार के साथ ही बाहर निकलने की इजाजत है।

जब एक अफगानी हिंदू को मिला संवैधानिक पद
महाभारत के मामा शकुनी तो सबको याद होंगे। शकुनी मामा गांधार के राजा सुबल के पुत्र थे। राजा धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी उनकी बहन थीं। प्राचीन गंधार अब आधुनिक अफगानिस्तान का कंधार है। प्राचीन काल में यहां हिंदू धर्म का प्रभाव था। लेकिन कालांतर में अफगानिस्तान में इस्लाम धर्म का विस्तार हुआ। अब अफगानिस्तान में हिंदुओं की आबादी बहुत कम रह गयी है। सिख और सिंधी लोग व्यापार करने के लिए अफगानिस्तान में बसे थे। इनकी अधिकतर आबादी काबुल शहर में ही है। पंजाबी लोग पंजाबी और सिंधी लोग सिंधी भाषा में बोलते हैं। 2002 में अफगानिस्तान की संसद लोया जिरगा में हिंदूओं के लिए दो निर्वाचन क्षेत्र रिजर्व थे। अब हिंदू और सिख के लिए सम्मिलत रूप से केवल एक सीट है। हामिद करजई 2004 से 2014 तक अफगानिस्तान के राष्ट्रपति थे। उन्होंने भारतवंशी अफगानी शामलाल भथीजा को अपना आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया था। यह अफगानिस्तान में किसी हिंदू द्वारा प्राप्त किया गया सर्वोच्च पद था। शामलाल राष्ट्रपति के वरीय आर्थिक सलाहकार थे और उनका पद कैबिनेट मिनिस्टर के समकक्ष था। शामलाल का जन्म कंधार में हुआ है। इनकी उच्च शिक्षा भारत में हुई। शामलाल के पूर्वज 350 साल से कंधार में रह रहे थे। वे कनाडा में अफगानिस्तान के राजदूत भी रहे।

अफगान सांसद नरिंदर सिंह खालसा
2018 में सिख व्यापारी नरिंदर सिंह खालसा अफगानिस्तान संसद के लिए निर्विरोध चुने गये थे। उनके पिता अवतार सिंह खालसा ने संसदीय चुनाव के लिए नामांकन किया था। लेकिन इसी दरम्यान एक आत्मघाती बम हमले में उनके पिता समेत 18 लोगों की मौत हो गयी थी। बाद में इसी सीट पर नरिंदर ने चुनाव लड़ा था। नरिंदर सिंह खालसा ने एक इंडरव्यू में कहा था कि अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए हालात अच्छे नहीं हैं। हम बहुत कठिनाई से धार्मिक त्यौहार मना पाते हैं। हमलोगों की कई सम्पत्तियां हड़प ली गयीं। मेरे परिवार के नौ लोग इस गृहयुद्ध में मारे जा चुके हैं। 2018 में केवल एक हजार एक सौ अल्पसंख्यकों (हिंदू, सिख, सिंधी) ने वोटर लिस्ट में नाम दर्ज कराया था। ये तब की बात है जब अफगानिस्तान में अशरफ गनी का शासन था। अब जब तालिबान फिर आ गया है तो हालात की बदतरी का अंदाजा लगाया जा सकता है।












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