धमाकों के लिए दुनिया में इस्तेमाल होते है 8 अजीबो-गरीब बम
नयी दिल्ली। दुनिया आतंकवाद से त्रस्त है। लोगों की खून से होलियां खेलने वाले दहशतगर्द आए दिन आतंकी वारदातों को अंजाम देकर आतंक का परचम लहराने में जुटे है। हाल ही में नौरोबी का मॉल हादसा आपको याद होगा, या फिर पटना की
राजधानी में सिलसिलेवार धमाका। आतंकवादी धमाकों के लिए अजीबों-गरीब तरीकों के साथ-साथ अलग-अलग तरह के विस्फटकों का ऐजाज कर रहे है।
अगस्त 2013 में लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर आतंकी हमले की चेतावनी से अफरातफरी मच गई। चेतावनी दी गई कि अलकायदा की महिला आतंकी ब्रेस्ट बम से धमाके को अंजाम दे सकती है। ब्रेस्ट बम का नाम यहां पहली बार खुला। आतंकी नए-नए तरीके आजमा रहे है ताकि सुरक्षा अपकरणों से बचते हुए वो अपने मकसद में कामयाब हो सके।
जहां आतंकवादी अजीबोगरीब और घातक बमों का इस्तेमाल कर रहे है, वहीं हमारे सुरक्षा एजेंसी इन बमों के बारे में जानते तक नहीं है। ऐसा नहीं है कि पहली बार हुआ है। पहले भी इसी तरह से अलग-अलग तरीकों से विस्फटकों का इस्तामल होता रहा है। ये बम आम बमों से हटकर थे। इनको बनाने में बिल्लियों, कबूतरों, समुद्री जीवों, चमगादड़ों तक का उपयोग किया गया। हम यहां आपको यहां 8 अजीबो गरीब बमों के बारे में बता रहे है जिनका इस्तेमाल दशहतगर्द कर रहे है।

स्तन बन जाता है घातक हथियार
आतंकवादी महिला फियादिनों के साथ इस तरह के एक्सपेरीमेंट कर रहे है। महिलाओं के ब्रेस्ट बम बनाने में किसी धातु का इस्तेमाल नहीं किया जाता, इसलिए इसे सिक्योरिटी स्कैनर भी पहचान नहीं पाते है। इस बम को बनाने के लिए स्तनों में सर्जरी के जरिए तरल विस्फोटक डाला जाता है, जिसे इंजेक्शन या रेडियो डिवाइस से एक्टिव करते हैं।

गे बम से होगा धमाका
ये हथियार पहली बार अमेरिकी सेना में सामने आया। पह ली बार 1994 में अमेरिका में इस रासायनिक हथियार के बारे में बताया गया था। इस के मुताबिक दुश्मन सेना पर बेहद कामोत्तेजक केमिकल गिराया जाएगा, जो उन सैनिकों को गे यानी समलैंगिक बना देगा। हलांकि इस बम को कभी बनाया नहीं जा सका, क्योंकि ऐसा कोई केमिकल नहीं मिल पाया, जो सैनिकों के व्यवहार में परिवर्तन कर उन्हें तुरंत गे बना दे।

भूखे कुत्तों का धमाका
धमाके का अजीबों-गरीब तरीका। इसे डॉग बॉम या डॉग माइंस के नाम से भी जाना जाता है। सबसे पहली बार इसका इस्तेमाल द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हुआ था। इस बम को बनाने के लिए कुत्तों को कई दिन तक बिना भोजन के बाद उन्हें टैंक के नीचे खाना खोजने की ट्रेनिंग दी जाती थी। उन्हें अहसास दिलाया जाता था कि खाना सिर्फ टैंकों के नीचे मिलता है। ट्रेनिंग के बाद जब कुत्ता तैयार हो जाता था तो मैदान में उतारा जाता था।

आग वाले चमगादड़
सबसे पहली बार इस बम का इस्तेमाल द्वितीय विश्वयुद्द के दौरान अमेरिका ने किया। इस बम के जरिए अमेरिका जापान के औद्योगिक इलाकों के भवनों में आग लगाना चाहता था। इस बम को बनाने के लिए आग भड़काने वाले विस्फोटकों को चमगादड़ से बांधा दिया जाता था और टाइमर के साथ अपनी मन मुताबिक जगहों पर विस्फोट किया जाता था।

बदबू से अपमानजनक करने वाला
सबसे पहले द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकन ऑफिस ऑफ स्ट्रेटेजिक सर्विसेज ने इस बम का इस्तेमल किया। इस बम को बनाने के लिए सल्फर कंपाउंड का इस्तेमाल किया गया था। इससे तेज दुर्गंध आती था।

आग के गुब्बारे
साल 1944 के आखिरी में इस बम का इस्तामल अमेरिका ने किया। गुब्बारे में हाइड्रोजन गैस भरी होती थी, जिसमें विस्फोटक बंधे होते थे। इन विस्फटकों के साथ गुब्बारे को उड़ाया जाता था और धमाके किए जाते थे।

चूहे के इस्तेमाल से धमाका
इस रैट बम का इस्तेमाल सबसे पहले ब्रिटिश सेना ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान किया था। इस बम को बनाने के लिए मरे हुए चूहों के अंदर प्लास्टिक विस्फोटक भरकर बम के रूप में इस्तेमाल किया जाता था।

समंदर में धमाका
अमेरिका और रूस ने समुद्री युद्ध के लिए डॉल्फिन को ट्रेनिंग देते थे। इसके लिए डॉल्फिंस को समुद्र के अंदर विस्फटक बिछाने, दुश्मनों पर हमला करने, मारने और पनडुब्बियों को नष्ट करने की ट्रेनिंग दी जाती थी।

कबूतर के रुप में धमाका
इस बम के द्वारा कबूतरों को मिसाइल चलाने की ट्रैनिंग दी जाती थी। मिसाइल में बैठे 3 कबूतर धमाकों को अंजाम देते थे। सबसे पहले इस बम का इस्तेमाल द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी सेना ने किया था।












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