अफ़ग़ान अभियान के दौरान ब्रितानी फ़ौज के हाथों में मारे गए थे 64 बच्चे

ब्रिटेन ने पहले बताई संख्या की तुलना में कम से कम चार गुणा अधिक अफग़ान बच्चों की मौत के लिए मुआवज़े का भुगतान किया है.

सरकार ने पहले सार्वजनिक तौर पर ये स्वीकार किया था कि अफ़ग़ानिस्तान में उसके सैन्य अभियान में 16 बच्चों की मौत हुई.

हालांकि अब तक 64 बच्चों के लिए मुआवज़ा दिया गया है.

ये सभी बच्चे 2006 और 2014 के बीच ब्रिटेन की सेना से जुड़े संघर्ष में मारे गए थे.

चैरिटी एक्शन ऑन आर्म्ड वॉयलेंस (एओएवी) की तरफ़ से जानकारी मांगे जाने पर फ़्रीडम ऑफ़ इन्फ़र्मेशन (सूचना का अधिकार) की ओर से ये नए आंकड़े बताए गए हैं.

हवाई हमले और गोलीबारी की चपेट में आने की वजह से सबसे अधिक मौते हुईं. एओएवी का मानना है कि 'ब्रिटिश सैन्य बलों’ की वजह से मरने वाले आम नागरिकों की दर्ज संख्या भी संभवतः कम है.

चैरिटी के अनुसार, आधिकारिक रूप से दर्ज की गई मौतों में मारे गए बच्चों की संख्या भी तकरीबन 135 तक हो सकती है.

ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय के दस्तावेज़ों में कई मौतों को सिर्फ़ बेटे और बेटियां बताकर दर्ज किया गया है. न तो इनकी उम्र बताई गई है और न ही इस बात का ज़िक्र है कि मौत किन परिस्थितियों में हुई.

एओएवी का कहना है कि हो सकता है इन 135 में से कुछ व्यस्क भी हों लेकिन अफ़ग़ानिस्तान की युवा आबादी को देखते हुए इनके 18 साल से कम उम्र के होने की संभावना अधिक है.

ब्रिटिश सरकार के सामने 881 मौतों के दावे किए गए लेकिन मुआवज़ा सिर्फ़ इनमें से एक चौथाई को ही मिला.

अफ़ग़ानिस्तान को क्यों कहते हैं 'साम्राज्यों की कब्रगाह'?

अगस्त 2007 में दक्षिणी अफ़ाग़ानिस्तान में ब्रिटेन का सैनिक
PA Media
अगस्त 2007 में दक्षिणी अफ़ाग़ानिस्तान में ब्रिटेन का सैनिक

मुआवज़ा पाने में जो सफ़ल हो सके उनमें से एक उस आठ परिवार वाले अफ़ग़ान परिवार के सदस्य हैं, जिनकी मौत हेलमंद के नवा ज़िले में मई 2009 में एक हवाई हमले में हुई थी.

एक शख़्स ने अपने भतीजे और भतीजे की दो पत्नियों, पाँच बच्चों की मौत के लिए मुआवज़ा मांगा था.

उन्हें 144 दिनों के लंबे इंतज़ार के बाद उस समय की दर के हिसाब से 8 हज़ार 260 डॉलर का भुगतान किया गया. ये राशि आज के समय में भारतीय मुद्रा के हिसाब से क़रीब 6 लाख 70 हज़ार के आसपास बनती है.

ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने वर्ष 2006 से 2014 के बीच 289 अफ़ग़ानों की मौत के लिए कुल 6 लाख़ 88 हज़ार पाउंड यानी करीब साढ़े छह करोड़ रुपये (मौजूदा विनिमय दर के हिसाब से) मुआवज़े के तौर पर बांटे थे.

एओएवी के अनुसार मुआवज़ा मांगने वालों को भुगतान से पहले अक़्सर तस्वीरें, जन्म प्रमाणपत्र और संबंधित चिट्ठियां जमा करनी पड़ती थीं. इनमें से कई लोगों को तो ब्रिटिश सैनिकों के सामने औपचारिक रूप से साक्षात्कार भी देना पड़ा ताकि ये साबित हो सके कि इनका तालिबान से कोई लेना-देना नहीं है.

इससे पहले भी सूचना के अधिकार के अंर्तगत मांगी गई जानकारियों से पता चलता है कि अफ़ग़ानिस्तान में मौतों का मुआवज़ा एक जैसा नहीं मिलता. कुछ केसों में एक व्यक्ति को माल-मवेशी और घर के नुकसान के लिए अधिक मुआवज़ा मिला और परिवार के सदस्य की मौत के लिए कम.

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अफ़ग़ान परिवारों को दिया गया मुआवज़ा

1. काबुल, 6 नवंबर 2007: एक बच्चे की मौत - मुआवज़ा - 54,348 पाउंड्स

2. संगीन, 24 जून 2008: तीन बच्चों की मौत-मुआवज़ा - 3746 पाउंड्स

3. नाद-ए-अली 16 अक्तूबर 2008: 11 व्यस्कों और 7 बच्चों की मौत- मुआवज़ा - 27255 पाउंड्स

4.नहर-ए-सराज 5 जून 2010: एक व्यस्क और चार बच्चों की मौत. मुआवज़ा - 6581 पाउंड्स

5. नहर-ए-सराज 4 मई 2012: एक व्यस्क और पांच बच्चों की मौत. मुआवज़ा - 19317 पाउंड्स

अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध
Getty Images
अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध

एक बयान में ब्रिटे के रक्षा मंत्रालय ने कहा, “युद्ध के दौरान किसी भी गैर-सैनिक की मौत एक त्रासदी है. विशेषकर तब जब इनमें बच्चे और परिवार के अन्य सदस्य शामिल हों.

बयान में कहा गया है कि ब्रितानी सेना आम लोगों को कम से कम नुकसान पहुंचाने की कोशिश करती है. लेकिन दुर्भाग्य से नुकसान को पूरी तरह से ख़त्म करना संभव नहीं है.

लेकिन चैरिटी संस्था एओएवी के इयेन ओवर्टन मौतों के बारे में पारदर्शिता के अभाव की आलोचना करते हैं. रक्षा मंत्रालय से जानकारी निकलवाने में शोधकर्ताओं को कई साल लगे हैं.

उनका ये भी कहना है कि इन मौतों के विषय में डिबेट का अभाव, इनसे मिले सबकों पर भी सवाल उठाता है.

मानवाधिकार संगठन और संस्थाएं अमेरिका और ब्रिटेन की सैन्य अभियानों में आम लोगों की मौत की तफ़्तीश के तरीकों पर सवाल उठाते रहे हैं.

ब्रिटेन का रक्षा मंत्रालय सीरिया और इराक़ में इस्मालिक स्टेट के ख़िलाफ़ अभियना के दौरान सिर्फ़ एक आम व्यक्ति की मौत की बात स्वीकार करता है.

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अफ़गानिस्तान में युद्ध
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उधर अमेरिकी विदेश मंत्री लॉयड ऑस्टिन ने हाल ही में आम लोगों की मौतों की जांच करने के तरीकों का रिव्यू करने का एलान किया है.

उनके ये आदेश बीते साल काबुल से बाहर निकलती अमेरिकी सेना के एक एयर स्ट्राइक के बाद आया है. उस हमले में दस आम लोग मारे गए थे.

पहले अमेरिका ने दावा किया था कि उसने चरमपंथियों पर हमला किया है लेकिन ज़मीन पर मौजूद पत्रकारों को इस बात के साफ सबूत मिले थे कि मरने वाले आम लोग हैं.

अमेरिका के सिविलियन हार्म मिटिगेशन और रेस्पांस एक्शन प्लान के तहत 150 मिलिट्री स्टाफ़ की ये ज़िम्मेदारी है कि वो आम लोगों को हुए नुकसान का निवारण करें. साथ ही ऐसी घटनाओं की बेहतर रिपोर्टिंग और डेटा इकट्ठा करें.

ब्रिटेन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वे अमेरिका में हो रहे रिवयू की प्रगति पर नज़र रख रहा है लेकिन मंत्रालय ने आम लोगों की मौत की तफ़्तीश के तरीकों में बदलाव करने के बारे में कुछ नहीं कहा है.

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