क्या लैंगिक स्टीरियोटाइप से लड़ पाएंगी अदालतें

सुप्रीम कोर्ट ने 16 अगस्त को इस हैंडबुक को जारी किया. इसे बनाने के पीछे उद्देश्य अदालत के आदेशों और कानूनी कागजात में अनुपयुक्त लैंगिक शब्दावली के इस्तेमाल से बचने के लिए जजों का मार्गदर्शन करना है.
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने बताया कि इस किताब में महिलाओं के प्रति स्टीरियोटाइप बनाने वाले उन शब्दों को चिन्हित किया गया है जिनका अदालतों ने अपने कई फैसलों में अनजाने में इस्तेमाल किया है.
किन शब्दों से बनता है स्टीरियोटाइप
उन्होंने कहा, "यह कानूनी संवाद में महिलाओं को लेकर स्टीरियोटाइपके बारे में है...इसका उद्देश्य फैसलों पर लांछन लगाना नहीं है. यह स्टीरियोटाइप बनाने वाली भाषा से बचने में जजों की मदद करेगी."
#SupremeCourt releases its handbook illustrating words perpetuating gender stereotypes, which should be avoided in Court language.
— Live Law (@LiveLawIndia) August 16, 2023
Some illustrations pic.twitter.com/XDZXpzt7PX
किताब की प्रस्तावना में मुख्य न्यायाधीश ने लिखा है कि पहले से बने हुए स्टीरियोटाइपों पर निर्भर रहने से हर मामले का फैसला उसके मेरिट के आधार पर करने के जजों के कर्तव्य की अवहेलना होती है.
उन्होंने आगे लिखा, "विशेष रूप से महिलाओं के बारे में बने स्टीरियोटाइपों पर निर्भर होने से महिलाओं पर कानून को नुकसानदेह तरह से लागू किया जा सकता है." इस किताब में ऐसे शब्दों और वाक्यांशों की एक लंबी सूची दी गई जो लैंगिक स्टीरियोटाइप बनाते हैं. साथ ही इनके विकल्प भी सुझाएगए हैं.
मिसाल के तौर पर, "पवित्र महिला" की जगह सिर्फ "महिला", "अच्छी पत्नी" और "आज्ञाकारी पत्नी" की जगह सिर्फ "पत्नी", "वेश्या" की जगह "यौन कर्मी", "हाउसवाइफ" की जगह "होममेकर", "भड़काऊ कपड़ों" की जगह सिर्फ "कपड़ों", "सेक्स चेंज" की जगह "सेक्स रिअसाइनमेंट या जेंडर ट्रांजिशन" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने के लिए कहा गया है.
कानून की भूमिका
इसके अलावा "अविवाहित मां" की जगह सिर्फ "मां", "ढीले चरित्र वाली महिला" की जगह सिर्फ "महिला", "हार्मोनल" की जगह किसी विशिष्ट भाव को चिन्हित करने वाले शब्दों, यौन हिंसा के मामलों में"पीड़ित" या "सर्वाइवर" में से जो भी शब्द संबंधित व्यक्ति चुने उस शब्द आदि का इस्तेमाल करने के लिए कहा गया है.
किताब में विस्तार से यह भी बताया गया है कि स्टीरियोटाइप क्या होते हैं, लैंगिक स्टीरियोटाइप क्या होते हैं, ये कैसे काम करते हैं और कैसे न्याय प्रक्रिया पर असर डालते हैं, 'जेंडर' और 'सेक्स' में क्या फर्क होता है और स्टीरियोटाइप और पितृसत्ता का मुकाबला करने में कानून की क्या भूमिका है.
किताब में सिर्फ स्टीरियोटाइप की शब्दावली ही नहीं बल्कि स्टीरियोटाइप बनाने वाली मान्यताओं पर भी चर्चा की गई है. जैसे "महिलाओं अति भावुक और तर्कहीन होती हैं और फैसले नहीं ले सकती हैं" को एक स्टीरियोटाइप बताया गया है.
आगे बताया गया है कि असलियत यह है कि कोई भी व्यक्ति तर्कसंगत तरीके से सोच सकता है या नहीं इसका फैसला उसके लिंग से नहीं होता है. इसी तरह "जो महिलायें पारंपरिक माने जाने वाले कपड़े नहीं पहनती हैं वो मर्दों के साथ यौन संबंध बनाना चाहती हैं" जैसी मान्यता को भी स्टीरियोटाइपबताया गया है.
इसकी जगह बताया गया है कि सच्चाई यह है कि महिला द्वारा पहने हुए कपड़े ना तो इस बात का संकेत होते हैं कि वो यौन संबंध बनाना चाहती है और ना ही वो उसे छूने का निमंत्रण होते हैं.
इसके अलावा किताब में सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का भी जिक्र किया गया है जिनमें अदालत ने लैंगिक स्टीरियोटाइपों को ठुकराया. साथ ही यह भी कहा गया है कि स्टीरियोटाइप सिर्फ महिलाओं ही नहीं बल्कि हर लिंग के व्यक्ति पर असर डालते हैं और जजों को हर किस्म के लैंगिक पूर्वाग्रह के खिलाफ सतर्क रहना चाहिए.












Click it and Unblock the Notifications