बनारस में मोदी को कितनी चुनौती दे पाएंगे तेजबहादुर?

नई दिल्ली। काशी की अपनी तासीर है। काशी शिव है। काशी भोला है। काशी द्रष्टा है। काशी सृष्टा है। बनारस की बात हो तो ये बातें जेहन में आ ही जाती हैं।
गत लोकसभा चुनाव में देश ही सांस्कृतिक नगरी बनारस ने नरेन्द्र मोदी को दोनों हाथ से आशीर्वाद दिया था। बकौल मोदी , मैं आया नहीं हूँ, गंगा माँ ने मुझे बुलाया है और अपना आशीर्वाद दिया है। तब से अबतक गंगा में बहुत पानी बह चुका है। वर्तमान लोकसभा चुनाव में मोदी अब फिर से बनारस के दर पर खड़े हैं। इस बार वो खुद आये हैं। इसबार बनारस की फकीरी में रम जाने की बात उन्होंने कही है।
देश में विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच बने नए राजनीतिक समीकरण ने प्रचंड बहुमत वाले एनडीए गठबंधन की राह मुश्किल तो जरूर की है। अकारण नहीं है कि काशी में मोदी जी को अपने नामांकन से पहले भव्य रोड शो करना पड़ा। अपने सहयोगियों के साथ एकजुटता का शक्ति प्रदर्शन यह संदेश देने के लिए भी करना पड़ा कि उनकी लोकप्रियता आज भी लोगों के सर चढ़कर बोल रही है। खैर, यहाँ हम फिलहाल इस पर बात नहीं करते हैं।

तेज बहादुर कौन हैं और इतनी चर्चा में क्यों हैं?
पूर्व सैनिक तेज बहादुर यादव ने नौकरी में रहते हुए सैनिकों के राशन में भ्रष्टाचार की बात उजागर की थी। उसके नौकरी के कुछ ही दिन बचे हुये थे लेकिन उसे सरकार द्वारा बर्खास्त किया गया। कोर्ट मार्शल किया गया। उसकी पेंशन रोक दी गयी। उसके कहीं और नौकरी करने से मनाही और साथ ही सारे एजुकेशनल सर्टिफिकेट पर रेड मार्क भी लगा दिया गया। हालांकि उनपर अनुशासनहीनता का मामला बनाता था लेकिन सरकार द्वारा ऐसी सजा देना कितना विवेकसम्मत था, यह बहस का बिंदु हो सकता है।
इस तरह मोदी राज में भ्रष्टाचार से लड़ना कितना जोखिम भरा काम है, इसका प्रतीक तेज बहादुर यादव बन गए।
प्रारंभ में तेज बहादुर बनारस से मोदी के विरुद्ध निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ रहे थे। उनके समर्थन में देश से सैनिक नौजवान भी आये हुये हैं। बीबीसी से बात करते हुए वह बताते हैं कि उन्हें न्यायालय से न्याय नहीं मिला इसलिए अब उन्होंने ये रास्ता चुना है। संसद में वो न्याय की आवाज बुलंद करेंगे। प्रधानमंत्री नकली चौकीदार हैं वो असली चौकीदार हैं। वो भले अकेले हों लेकिन जैसे एक चिंगारी सैलाब बन जाती है वैसे ही उनका कारवां बढ़ता जाएगा।
और ऐसा हुआ भी। निर्दलीय से अब तेज बहादुर सपा- बसपा गठबंधन के उम्मीदवार हो गए हैं। सपा के तरफ से घोषित उम्मीदवार शालिनी राय की उम्मीदवारी वापस ले ली गयी है।

आखिर तेज बहादुर इतने महत्वपूर्ण क्यों हो गए हैं?
मोदी के विरुद्ध तेज बहादुर का चुनाव लड़ना नैतिक रूप से मोदी सरकार के भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस पर सवाल खड़े करेगी। मोदी जहाँ एक तरफ जवानों के नाम पर जनादेश मांग रहे हैं तो दूसरी तरफ उनके विरुद्ध चुनाव लड़ने वाला राशन में भ्रष्टाचार की शिकायत करने पर बर्खास्त हुआ एक जवान है। ऐसी स्थिति में, निश्चित रूप से मोदी असहज होंगे। सर्जिकल स्ट्राइक, सेना, पाकिस्तान आदि की बात बनारस से करना उनके लिए इतना भी आसान नहीं रह जायेगा। राष्ट्रवाद की बात करने में हिचकेंगे तो जरूर ही। जबकि यही मोदी और भाजपा का बेस है। हां हिंदुत्व के मुद्दे पर वो उग्र जरूर होंगे लेकिन इस मामले में तेज बहादुर का प्रारंभिक फेसबुक एकाउंट भी उग्र हिंदुत्व का समर्थन करते दिखता है। वैसे भी मुख्य मुद्दा यह नहीं होगा, इसकी उम्मीद कर सकते हैं।
तेज बहादुर के होने से मुख्य मुद्दा भ्रष्टाचार का होगा जिसका जबाब मोदी को देना होगा। अन्य पार्टियां यहाँ मुखर होंगी, और भाजपा को यहाँ डिफेंड करना होगा। विपक्ष द्वारा अन्य मुद्दों से लेकर राफेल तक में जो भी आरोप भ्रष्टाचार के लगाए गए हैं उनसब पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध तेज बहादुर का प्रतीक भाजपा के लिये भारी होगा। कांग्रेस भी अगर तेज बहादुर का समर्थन कर देती है तो नैतिकता के स्तर पर मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध बढ़त संयुक्त विपक्षी दल की होगी। तेज बहादुर को संयुक्त उम्मीदवार बनाने पर दिल्ली प्रदेश के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने सपा-बसपा गठबंधन को धन्यवाद भी दिया है।
यहाँ जातिगत खांचों में वोटों की गणना करना ज्यादा प्रासंगिक नहीं है। गत लोकसभा चुनाव में भी अरबिंद केजरीवाल को मिले 2,09,238 वोट उनकी भ्रष्टाचार विरोधी छवि को मिले वोट ही थे।
यहां करीब 2.5 लाख ब्राह्मण मतदाता हैं। वैश्य करीब 3.25 लाख। पटेल 2 लाख के लगभग, भूमिहार 1.25 लाख, दलित 1.50 लाख, यादव 80 हजार और तकरीबन 3 लाख मुस्लिम वोटर हैं। अगर जातिगत गोलबंदी होती तो फिर बसपा प्रत्याशी विजय प्रकाश जायसवाल को मात्र 60 हजार 534 वोट ही नहीं मिलने चाहिए थे।
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मोदी को कितनी चुनौती दे पाएंगे तेज बहादुर?
मोदी भाजपा के आइकॉन हैं। एनडीए के उम्मीदवार अपनी चुनावी सभा में प्रमुखता से इस बात को रखते हैं कि जनता उन्हें वोट देकर मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में चुनें। लोक सभा चुनाव में अन्य चेहरे या तो दबे हुए हैं या फिर गौण ही हैं। 5 साल सरकार में रहने के बाद अपने चुनावी सभा मे अपने सरकार द्वारा किये गए विकास कार्य के ऊपर राष्ट्रवाद को रखकर भीड़ जुटाने का कौशल मोदी ही कर सकते हैं। उनके संबोधन में आकर्षण है। मोदी वाकपटु हैं। उन्हें पता होता है कि कैसे भीड़ को वोट में बदलना है। गत लोकसभा चुनाव में उनकी जबरदस्त जीत इस बात को जायज भी ठहराता है। लेकिन लोकतंत्र में जनता ही मालिक होती है। अंततः वह अपने हिसाब से ही चीजों को देखती है। और यह लोकतंत्र की खूबसूरती भी है।
फिर जब बात बनारस की हो तो इसे समझने के लिए फिर हमें वहीं आना होगा जहाँ से बात शुरू हुई थी। काशी की अपनी तासीर है। काशी शिव है। काशी भोला है। काशी द्रष्टा है। काशी सृष्टा है। बनारसी किसके ऊपर कब, क्यों और कैसे मेहरबान हो जाये, इस फक्कड़पन को समझना इतना आसान नहीं है।
लेकिन इतना तय हो गया है कि तेज बहादुर अब बनारस लोकसभा क्षेत्र से मोदी के विरुद्ध एक प्रमुख चेहरा बन गए हैं। बनारस के चुनाव ने अब देश में कौतूहल पैदा कर दिया है। सबकी निगाहें यहाँ टिक गई हैं।












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