क्या चुनावों में मध्य प्रदेश को सुषमा और सुमित्रा की कमी खलेगी?

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क्या चुनावों में मध्य प्रदेश को सुषमा और सुमित्रा की कमी खलेगी?

मध्यप्रदेश की 29 लोकसभा सीटों पर चुनाव चार चरणों में हो रहे है. इसमें से दो चरणों के चुनावों में 13 सीटों पर मतदान हो चुका है.

लेकिन इस बार प्रदेश से चुनकर पहुंचने वाली भारतीय राजनीति की दो कद्दावर महिलाएं चुनावी मैदान में नही हैं.

तीन दशकों से लोकसभा में इंदौर की नुमाइंदगी करती आ रहीं सुमित्रा महाजन ने यहां से आठ चुनाव जीते हैं.

ज़ाहिर है कि इंदौर में उनके समर्थकों को सुमित्रा की कमी खलेगी और कुछ ऐसा ही हाल विदिशा का भी है जो सुषमा स्वराज की सीट है.

सुमित्रा महाजन लोकसभा की स्पीकर रही हैं. वहीं, विदेश मंत्री रही सुषमा स्वराज भी इस बार मैदान में नहीं है.

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सुमित्रा का इंदौर

सुमित्रा महाजन ने 1989 में प्रदेश के मुख्यमंत्री और देश के गृहमंत्री रहे कांग्रेस के प्रकाशचंद्र सेठी को हराया था. उसके बाद से इंदौर में कभी कोई दूसरा नही जीत पाया.

सुमित्रा महाजन ने 1989, 1991, 1996, 1998, 1999, 2004, 2009 और 2014 में जीत हासिल की.

सुमित्रा महाजन इस बार भी चुनाव लड़ना चाहती थीं लेकिन अंत में उन्होंने पार्टी हाई कमान की मंशा भांपकर खुद ही अपनी दावेदारी वापस ले ली ताकि पार्टी को किसी अन्य को प्रत्याशी घोषित करने में दिक्क़त न आए.

इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अरविंद तिवारी कहते हैं, "सुमित्रा महाजन के मैदान में नही होने की वजह से बरसों बाद कांग्रेस पार्टी टक्कर में आ गई है."

उन्होंने कहा, "कांग्रेस ने सुमित्रा महाजन के ख़िलाफ़ पिछले 30 सालों में कई प्रयोग किए लेकिन कोई भी कामयाब नही हुआ."

"इंदौर का नाम सुमित्रा महाजन के नाम से ही जुड़ गया. उन्होंने भाजपा के वोट बैंक के अलावा अपना ख़ुद का वोट बैंक तैयार किया था."

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क्या कहते हैं इंदौर के लोग

वहीं, इंदौर के आम लोगों को ये महसूस हो रहा है कि सुमित्रा महाजन का टिकट काटा गया है. इसी वजह से स्थानीय लोगों में नाराज़गी देखी जा सकती है.

स्थानीय नागरिक अतुल पाटनकर मानते है कि सुमित्रा महाजन के साथ धोखा किया गया है.

वो कहते, "मुझे लगता है कि उन्हें एक मौका और दिया जाना चाहिए था. वो आसानी से इस चुनाव को न सिर्फ जीतती बल्कि अच्छे से काम करतीं."

2014 में हुए चुनाव में सुमित्रा महाजन ने साढ़े चार लाख से भी ज्यादा वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी.

इंदौर वालों को ये भी पता है कि जो भी प्रत्याशी जीतेगा और अगर केंद्र में उसकी सरकार बनती भी है तो उन्हें केंद्र में कोई बड़ा पद नही मिलना है.

उन्हें मालूम है कि सुमित्रा महाजन के कद से इनका कोई मुक़ाबला नही है. इंदौर के लोग अपने को उनसे जोड़कर ही देखते रहे हैं.

इस बार इंदौर में मुक़ाबला भाजपा के शंकर लालवानी और काग्रेंस के पंकज संघवी के बीच हो रहा है.

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सुषमा की विदिशा

वहीं, विदिशा संसदीय सीट से इस बार सुषमा स्वराज भी ग़ायब हैं.

सुषमा स्वराज ने भी स्वयं ही चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था जिसकी वजह से उनकी जगह भाजपा ने रमाकांत भार्गव को मैदान में उतारा है.

उनके सामने कांग्रेस के शैलेंद्र पटेल हैं. ख़ास बात ये है कि दोनों ही उम्मीदवार बाहरी हैं.

सुषमा स्वराज यहां पर दो बार चुनाव लड़ चुकी हैं. साल 2009 और 2014 में और दोनों ही बार उन्होंने बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी.

लेकिन विदिशा की ख़ास बात यह है कि ये हमेशा से भाजपा का गढ़ रहा है. यहां पर चुनाव विचारधारा को लेकर लड़ा जाता है.

विदिशा वो क्षेत्र है जहां पर काग्रेंस को जीत सिर्फ दो बार ही मिली है वह 1980 और 1984 में.

विदिशा से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी जीत चुके हैं.

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विदिशा का इतिहास

जिस तरह से इंदौर के लोगों के दिलों में सुमित्रा महाजन बसती हैं उस तरह की सोच सुषमा स्वराज के लिए यहां के लोगों की नही है.

सुषमा स्वराज ने क्षेत्र में काम ज़रूर किया लेकिन उनका आना-जाना यहां पर न के बराबर रहा.

इसलिये यहां के लोग प्रत्याशी बदल जाने के बावजूद कोई ख़ास फर्क महसूस नही कर रहे हैं.

विदिशा को करीब से जानने वाले अनिल यादव कहते है कि विदिशा का अपना इतिहास यहां पर प्रत्याशी की बजाय पार्टी को ज्यादा महत्व दिया जाता है.

उन्होंने बताया, "सुषमा स्वराज के आने से कोई विशेष बात हुई हो या नहीं रहने से कोई विशेष बात हो ऐसा तो समझ में नही आता है."

"लोगों को उनसे कोई बहुत ज्यादा लगाव नही था क्योंकि वो न के बराबर आती थीं और लोग भी अपने काम के लिए उनके स्थानीय प्रतिनिधि के पास ही जाते थे."

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मध्य प्रदेश में महिला उम्मीदवार

इन दो बड़े नेताओं के चुनाव नही लड़ने के बाद अगर हम मध्य प्रदेश में इस लोकसभा चुनाव में महिला प्रत्याशियों की बात करें तो कांग्रेस ने पांच और भाजपा ने चार महिलाओं को टिकट दिया है.

साल 2014 में भी 9 महिलाओं का प्रत्याशी बनाया गया था जिनमें पांच लोकसभा पहुंचने में कामयाब रही थीं.

लेकिन इस बार भी महिलाओं का आकड़ां नही बढ़ा है. प्रदेश की शहडोल ही एक मात्र सीट है जहां कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने ही महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है.

भाजपा से हिमाद्री सिंह और कांग्रेस से प्रमिला सिंह चुनाव लड़ रही है.

एमपी इलेक्शन वॉच की संयोजक रोली शिवहरे का मानना है कि जब बात पंचायत स्तर के छोटे चुनाव की होती है तो महिलाओं को हिस्सेदारी दे दी जाती है लेकिन अगर बात बड़े चुनाव जैसे विधानसभा या लोकसभा की हो तो कोई भी राजनीतिक पार्टी गंभीर नही दिखती.

वो कहती हैं, "साफ दिखता है कि जब बात महिलाओं की हो तो किसी भी पार्टी पर भरोसा नही किया जा सकता है. हर पार्टी महिलाओं को लेकर बात बड़ी-बड़ी करती है लेकिन हक़ीक़त में वो उन्हें उनका अधिकार नही देना चाहती है."

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