क्या भाजपा के हिंदू वोट बैंक को ध्वस्त करने के लिए फेंका गया है जातीय जनगणना का पासा ?
नई दिल्ली ,अगस्त 24: क्या भाजपा के हिंदू वोट बैंक को ध्वस्त करने के लिए जातीय जनगणना का पासा फेंका गया है ? अगर हिंदू समाज करीब पांच हजार पिछड़ी जातियों में बंट जाएगा तो धार्मिक गोलबंदी की कोई गुंजाइश ही नहीं बचेगी। तब बोट का आधार धर्म नहीं जाति होगी। अगर ऐसा हुआ तो भाजपा का मजबूत किला भरभरा कर ढह जाएगा। जिस नरेन्द्र मोदी को हराने के लिए 17 विपक्षी दल खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं वह एक झटके में संभव हो जाएगा। इसलिए ओबीसी की राजनीति करने वाले दल जातीय जनगणना की मांग को आंदोलन का रूप दे रहे हैं। लेकिन इसकी आड़ में जिस तरह से जातीय भावनाओं को उकसाया जा रहा है, उसका अंजाम क्या होगा ?

चुनाव जाति का खेल
चुनाव जीतने के लिए अधिक से अधिक वोट चाहिए। इसके लिए अधिकतम वोटरों की गोलबंदी जरूरी है। ये गोलबंदी कैसे होगी ? इसके लिए जाति ही सबसे बड़ा आधार है। जो सबसे अधिक जातियों को साधेगा उसकी ही गोटी लाल होगी। दरअसल भारत में चुनाव जातियों का खेल है। चूंकि चुनाव जातियों का खेल है इसलिए यह जानना जरूरी है कि किस जाति की कितनी संख्या है। विकास और जनहित के मुद्दे केवल मुखौटे हैं। इन्हीं मुखौटों को पहन कर जातियों क खेल खेल जाता है। नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव कह रहे हैं कि अगर पिछड़े वर्ग की सभी जातियों की वास्तविक संख्या मालूम हो जाएगी तो उनके लिए कल्याणकारी योजनाओं को बनाने में सहूलियत होगी। लेकिन क्या यही सच्चाई है ? क्या नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव जैसे नेता वंचित लोगों की भलाई के लिए जातीय जानगणना की मांग कर रहे हैं ?

ओबीसी की राजनीति
राष्ट्रीय पिछड़ावर्ग आयोग ने 2006 में पिछड़ी जातियों की कुल संख्या 5013 बतायी थी। मंडल आयोग की सूची में 3743 पिछड़ी जातियों का जिक्र है। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने 2015 में कहा था कि मंडल आरक्षण का अधिकांश लाभ ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) की कुछ प्रभावशाली जातियों तक ही सीमित है। इसलिए ओबीसी को तीन समूहों (पिछड़ा वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग और अधिक पिछड़ा वर्ग) में बांट दिया जाना चाहिए। अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लिए कोटा के अंदर कोटा का निर्धारण होना चाहिए ताकि उनको वाजिब हक मिल सके। इसके बाद केन्द्र सरकार ने ओबीसी जातियों की उपश्रेणियां निर्धारित करने के लिए 2017 में रोहिणी आयोग का गठन किया। इस आयोग ने 2018 में एक अध्ययन किया था। उसने पिछले पांच साल में ओबीसी कोट के तहत दी गयी एक लाख 30 हजार सरकारी नौकरियों का विश्लेषण किया। इस विश्लेषण में पाया गया कि इन नौकरियों में ओबीसी की 983 जातियों का एक भी प्रतिनिधित्व नहीं है। मंडल आरक्षण का 97 फीसदी लाभ ओबीसी की केवल 25 फीसदी जातियों ने ही उठा लिया। अब सवाल ये है कि पिछड़े वर्ग की 75 फीसदी जातियां आरक्षण के लाभ से वंचित क्यों रह गयी ? मंडल आरक्षण तो 1990 में लागू कर दिया गया था। फिर इतना बड़ा अन्याय कैसे होते रहा ?

भाजपा की मुश्किल
जब मंडल के मसीहा 27 साल में पिछड़े वर्ग की सभी 3743 जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं दिला सके तो क्या वे पांच हजार तेरह जातियों के लिए अब कल्याणकारी योजनाएं बना लेंगे ? जाहिर है जातीय जनगणना एक सियासी मुहिम है। लेकिन समस्या यह है कि कोई दल इसका सार्वजनिक रूप से विरोध नहीं कर सकता। अगर किसी दल ने इसका विरोध किया तो उस पर पिछड़ा विरोधी होने का ठप्पा लगते देर नहीं लगेगी। इसलिए भाजपा खुल कर इसका विरोध नहीं कर पा रही। लेकिन वह इसके नतीजे को जान रही है। अगर समाज का धुव्रीकरण जाति के आधार पर होगा तो फिर हिंदुत्व के नाम पर वोट कौन देगा ? भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में हिंदुत्व के बल पर ही पिछड़े (गैर यादव) वर्ग के वोटरों को अपने पाले में कर बहुत बड़ी जीत हासिल की थी। धार्मिक ध्रुवीकरण के कारण ही जाति की राजनीति करने वाली सपा और बसपा की करारी हार हुई थी।

जातीय ध्रुवीकरण से भाजपा को जबर्दस्त नुकसान
जब जब चुनावी राजनीति में जाति के आधार पर गोलबंदी हुई है, भाजपा को करारी हार झेलनी पड़ी है। 2015 के बिहार विधानसभा के समय लालू यादव ने संघ प्रमुख मोहन भागवात के उस बयान को लपक लिया जिसमें उन्होंने आरक्षण की समीक्षा की बात कही थी। इसके बाद लालू यादव ने भाजपा को आरक्षण विरोधी बता कर बिहार में जातीय भावना को खूब उभारा था। बैकवार्ड-फॉरवार्ड की फीलिंग ने चुनाव के पूरे परिदृश्य को बदल दिया। भाजपा का हिंदू कार्ड बेअसर हो गया। यहां तक कि नरेन्द्र मोदी का करिश्मा भी काम न आया। भाजपा की हार हुई और वह तीसरे स्थान लुढ़क गयी। इसी तरह 2018 में गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में जब बसपा और सपा की समर्थक जातियां एक हो गयीं तो भाजपा को हार झेलनी पड़ी। योगी आदित्यनाथ की हिंदूवादी राजनीति खुद उनके घर में नाकाम हो गयी। इसलिए भाजपा ने जातीय जनगणना के मुद्दे पर फूंक फूंक कर कदम बढ़ाने का फैसला किया है। दूसरी कतार के नेता भले इसे गैरजरूरी बता रहे हों लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस पर खामोशी ओढ़ रखी है। वे कोई जोखिम नहीं लेना चाहते। इसलिए वे नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से मिलने के लिए राजी भी हो गये। पहले तो भाजपा के पास राममंदिर जैसा करिशमाई मुद्दा था जिसने मंडल राजनीति को बेसर कर उसके लिए सत्ता की राह आसान की। लेकिन अब जब मंडल पार्ट टू वजूद में आएगा तो क्या होगा ? भाजपा फिलहाल इसी सवाल का जवाब खोज रही है।












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