मोदी सरकार के कैबिनेट विस्तार की ज़रूरत अभी क्यों आन पड़ी?

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मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में पहला कैबिनेट विस्तार होने की अटकलें पिछले कई दिनों से चल रही हैं.

मंगलवार को जिस तरह से चार राज्यों के राज्यपाल बदले गए और चार नए राज्यपाल बनाए गए, इससे कैबिनेट विस्तार की अटकलों को और बल मिला है.

नए मंत्रालय 'मिनिस्ट्री ऑफ़ को-ऑपरेशन' के बाद अटकलें और पुख़्ता हो गईं.

बुधवार को इन अटकलों पर विराम तब लगा, जब दूरदर्शन न्यूज़ ने कैबिनेट विस्तार के समय के साथ ट्वीट कर दिया.

समाचार चैनल डीडी न्यूज़ के मुताबिक़ 7 जुलाई को शाम 6 बजे मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला कैबिनेट विस्तार होगा.

https://twitter.com/DDNewslive/status/1412647469532401665

केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत को कर्नाटक का राज्यपाल बनाया गया है. इसके बाद कैबिनेट में एक और पद खाली हो गया है. वो राज्यसभा के सदस्य थे.

इसके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के निधन के बाद और अकाली दल के एनडीए से निकलने की वजह से कई कैबिनेट बर्थ खाली पड़ी थीं और कुछ मंत्री एक साथ दो मंत्रालयों का कार्यभार संभाल रहे हैं. कैबिनेट विस्तार के बाद ऐसे मंत्रियों के काम के बोझ को कम करने की संभावना जताई जा रही है.

इतना ही नहीं पुराने साथी जो अब तक सरकार में शामिल नहीं थे, बदलते समीकरण में उनको भी नए विस्तार में जगह मिलने की उम्मीद है.

ऐसा नहीं की ये कैबिनेट बर्थ पहले खाली नहीं थीं. ना ही अकाली दल का एनडीए से निकलना कोई नई बात है. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस विस्तार के पीछे अगले साल राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव भी एक कारण हैं.

किसान आंदोलन की वजह से पश्चिम यूपी में बीजेपी की सीट पर ज़्यादा असर ना पड़े, इसकी भी कोशिश इस फ़ेरबदल में दिख सकती है.

दरअसल इस बार मोदी एक तीर से कई शिकार एक साथ करना चाह रहे हैं.

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मोदी कार्यकाल में पहले कब-कब हुए हैं कैबिनेट विस्तार

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल की बात करें तो उसमें तीन बार कैबिनेट विस्तार हुआ था.

मई 2014 में प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद उन्होंने पहला कैबिनेट विस्तार नवंबर 2014 में किया था. उसके अगले साल यानी 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव होने वाले थे.

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल का दूसरा विस्तार 2016 में हुआ था, उसके एक साल बाद 2017 में उत्तर प्रदेश और गुजरात में चुनाव थे.

पहले कार्यकाल का तीसरा विस्तार 2017 में हुआ था, जब अगले साल 2018 में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव होने थे.

उनके दूसरे कार्यकाल का पहला विस्तार 2021 में 7 जुलाई को होने जा रहा है, तो इसे उत्तर प्रदेश और गुजरात में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़ कर देखना, ऊपर लिखे वजहों से भी आश्चर्यजनक नहीं लगता है.

मोदी के काम करने के स्टाइल को समझने वाले कहते हैं, महत्वपूर्ण राज्यों के विधानसभा चुनाव के पहले कैबिनेट के विस्तार को वो एक 'मैसेजिंग स्टाइल' के तौर पर इस्तेमाल करते हैं.

इसके ज़रिए समाज के सभी वर्गों को एक संदेश देने की कोशिश होती है, जैसे कि राज्यपाल की नियुक्ति में भी मंगलवार को देखने को मिला.

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किन चेहरों को जगह मिल सकती है जगह?

केंद्रीय मंत्रिमंडल में फ़िलहाल 50 से ज़्यादा मंत्री शामिल हैं, जबकि लोकसभा सीटों के मुताबिक़ 81 मंत्री कैबिनेट में हो सकते हैं.

इसी वजह से तक़रीबन दो दर्जन नए चेहरों को नई टीम में जगह मिलने की बात चल रही है.

हालांकि नए चेहरों के नाम की पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई हैं, लेकिन वो नेता जो आनन-फानन में दिल्ली पहुँचे हैं उन्हें इस रेस में आगे बताया जा रहा है.

दिल्ली पहुँचने वालों में पूर्व कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया और महाराष्ट्र से सांसद और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रहे नारायण राणे का नाम सबसे आगे हैं. हालांकि नारायण राणे ने मीडिया से बातचीत में कहा, "संसद सत्र के पहले दिल्ली आना जाना लगा ही रहता है."

इसके अलावा, अगले साल विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र उत्तर प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड से भी कुछ चेहरों को मंत्रिमंडल में जगह मिलने की गुंजाइश बन सकती है.

जिसमें सबसे आगे नाम अनुप्रिया पटेल का चल रहा है. उन्हें ओबीसी का बड़ा चेहरा माना जाता है. उनके नाम की अटकलें तब से चल रही हैं जब से उनकी मुलाक़ात अमित शाह से हुई थी.

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जनता दल यूनाईटेड के मंत्रिमंडल में शामिल होने की संभावना

दिल्ली में पिछले दिनों जिन नेताओं के चक्कर लगे हैं, उनमें से एनडीए गठबंधन का बड़ा दल जेडीयू के अध्यक्ष आरसीपी सिंह का भी नाम है. नई टीम में उन्हें भी जगह मिल सकती है.

हालांकि बिहार के मुख्यमंत्री ने उनके नाम का ऐलान किए बिना मोदी कैबिनेट में शामिल होने की बात ज़रूर स्वीकार की है.

मंगलवार को नीतीश कुमार से पटना में संवाददाताओं ने जब इस पर जानकारी माँगी तो उन्होंने इससे इनकार नहीं किया.

नीतीश कुमार ने कहा, "हम शामिल नहीं होंगे, ऐसी कोई बात नहीं है, हमको ऐसा किसी ने नहीं कहा है".

हालाँकि उन्होंने साथ ही कहा कि इस बारे में जो भी फ़ैसला होगा वो पार्टी अध्यक्ष आरसीपी सिंह ही बताएँगे.

नीतीश ने कहा, "फ़ैसले के बारे में मुझे जानकारी नहीं है, इस बारे में हमारी पार्टी के अध्यक्ष को ही कुछ बोलने का अधिकार है. वो बातचीत कर रहे हैं, उसमें जो होना है वो होगा."

जेडीयू एनडीए की एक महत्वपूर्ण सहयोगी पार्टी है. 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में इसने बिहार में 16 सीटें जीती थीं.

पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी से कम सीटें जीतने के बाद भी, जेडीयू नेता नीतीश कुमार से किया वादा निभाया और उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया.

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अच्छा काम करने वालों को मिलेगा ईनाम

राजनीतिक गलियारों में एक नाम पशुपति पारस का भी चल रहा है जिन्हें हाल ही में एलजेपी का लोकसभा में नेता चुना गया है.

हालांकि चिराग पासवान इस बात से ख़ासे नाराज़ दिख रहे हैं.

मंगलवार को तो उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि अगर पशुपति पारस को एलजेपी कोटे से मंत्री बनाया जाता है तो वो इस मामले को लेकर कोर्ट जाएंगे.

इसके अलावा 2021 में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए और बीजेपी ने बेहतर प्रदर्शन किए उनको भी कैबिनेट में जगह दे कर ईनाम देने की एक कोशिश की जा सकती है.

ऐसे लोगों में सबसे बड़ा नाम सर्वानंद सोनोवाल का है.

असम में मुख्यमंत्री पद की कुर्सी उन्होंने जब से छोड़ी है तभी से उनके केंद्र में आने की चर्चा चल रही है.

चर्चा तो सुशील मोदी की भी है, जिन्होंने डिप्टी सीएम का पद छोड़ा है. लेकिन बताया जा रहा है कि वो अभी तक पटना में ही हैं.

कॉपी : सरोज सिंह

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