हरियाणा-महाराष्ट्र के चुनाव नतीजों पर चुप क्यों हैं राहुल गांधी ?
नई दिल्ली- हरियाणा और महाराष्ट्र दो राज्यों के चुनाव हुए हैं। हरियाणा में कांग्रेस पार्टी की स्थिति 2014 के मुकाबले काफी मजबूत हुई है। महाराष्ट्र में भी पार्टी ने अपनी सीटों में इजाफा किया है। लेकिन, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी इन नतीजों को लेकर चुप्पी साधे हुए हैं। न ही उन्होंने अपनी भावना जताने के लिए ट्विटर का ही सहारा लिया है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि उन्होंने नतीजों पर अबतक कोई प्रतिक्रिया दी क्यों नहीं है? अगर हम लोकसभा चुनावों के बाद कांग्रेस में बदले अंदरूनी समीकरणों का विश्लेषण करें तो उससे अंदाजा लग सकता है कि राहुल की चुप्पी की वजह क्या हो सकती है? जबकि, हरियाणा के नतीजे तो ऐसे हैं कि भूपिंदर सिंह हुड्डा और सोनिया गांधी ने वहां सरकार बनाने की उम्मीदें अभी तक बरकरार रखी हैं।

चुनाव नतीजों पर कुछ बोले क्यों नहीं राहुल ?
महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव में न तो अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कोई प्रचार किया और न ही पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी ने ही कोई रैली की। गांधी परिवार से सिर्फ राहुल गांधी ही दोनों राज्यों में कुल मिलाकर 7 चुनावी सभाएं कीं। ऐसे में चुनाव परिणाम, जो कि उम्मीद से बेहतर कहे जा सकते हैं, उसपर वे कुछ बोल क्यों नहीं रहे? वोटों की गिनती जारी रहने के दौरान ही 10 जनपथ की गतिविधियां बढ़ गई थीं। सोनिया गांधी ने हरियाणा के पूर्व सीएम भूपिंदर सिंह हुड्डा से भी बात की थी, उन्हें सरकार बनाने की संभावना के लिए फ्री हैंड दे दिया था। शाम को उन्होंने परिणामों पर चर्चा भी की। प्रियंका गांधी ने भी रायबरेली में नतीजों पर बहुत खुशी जताई थी। कांग्रेस के कुछ नेताओं का कहना है कि नतीजे उत्साहजनक हैं। लेकिन, राहुल ने पार्टी और देश को एक ट्वीट के लिए भी मोहताज कर दिया।

इसलिए तो चुप नहीं हैं राहुल ?
हरियाणा की बात करें तो इसबार राहुल ने यहां सिर्फ दो रैलियां की थीं। यहां का चुनाव भी इसबार आलाकमान ने एक तरह से भूपिंदर सिंह हुड्डा और पार्टी अध्यक्ष कुमारी शैलजा के भरोसे छोड़ दिया था। सीधे शब्दों में कहें तो महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों जगह इसबार राहुल का कहीं कोई सीधा दखल नहीं दिखा। यही नहीं इन दोनों राज्यों में चुनाव से पहले राहुल के नियुक्त किए हुए प्रदेश नेताओं को पार्टी ने किनारे करने की भी कोशिश की। इसके चलते दोनों जगह पर बगावत के सुर भी फूटते दिखे थे। हरियाणा में राहुल के आदमी माने जाने वाले अशोक तंवर ने साइडलाइन किए जाने के बाद तो पार्टी ही छोड़ दी थी और महाराष्ट्र में भी संजय निरुपम ने विरोध का झंडा बुलंद कर दिया था। ऐसे में ये साफ है कि हरियाणा में कांग्रेस ने बेहतर किया है तो उसके पीछे आलाकमान नहीं प्रदेश नेतृत्व का रोल अहम है। जबकि, 5 महीने पहले जब लोकसभा में कांग्रेस राहुल के नेतृत्व में लड़ रही थी तो हरियाणा की सभी 10 लोकसभा सीटें बीजेपी जीत गई थी। यानि ऐसा कुछ नहीं बचा है, जिसके लिए राहुल क्रेडिट ले सकें। जहां तक महाराष्ट्र की बात है तो वहां कांग्रेस इसबार एनसीपी के शरद पवार की अगुवाई में चुनाव लड़ते दिख रही थी।

क्षेत्रीय पार्टी के रूप में लड़ी कांग्रेस!
सूत्रों की मानें तो हरियाणा में कांग्रेस के उम्मीदवारों ने राहुल गांधी से चुनाव प्रचार करवाने की ज्यादा मांग भी नहीं की थी। उन्होंने महाराष्ट्र में 5 रैलियां कीं, लेकिन हरियाणा में उन्हें सिर्फ दो रैली करने का ही मौका मिला। उसमें भी महेंद्रगढ़ की रैली वे इसलिए करने गए थे, क्योंकि अंतिम वक्त में सोनिया गांधी का दौरा रद्द करना पड़ा था। महाराष्ट्र की बात करें तो पार्टी को मुंबई में नुकसान झेलना पड़ा, क्योंकि राहुल के दोनों समर्थक संजय निरुपम और मिलिंद देवड़ा चुनाव के दौरान ही आपस में बुरी तरह उलझ गए थे। ऐसे में पार्टी में उन नेताओं का मनोबल बढ़ना स्वाभाविक है जो राहुल के काम करने के तरीके को नापसंद करते हैं। जानकारी के मुताबिक ऐसे नेताओं की मानें तो प्रदेशों में अध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्षों की नियुक्ति के उनके फैसले से पार्टी को बहुत नुकसान हुआ था। जबकि, उनकी मां सोनिया ने हुड्डा जैसे दिग्गज जाट नेता पर भरोसा किया, जिससे नतीजे बदल गए। चुनाव के दौरान हरियाणा से ये खबरें भी आई थीं कि हुड्डा के चुनावी पोस्टरों से राहुल को गायब रखा गया है। हो सकता है कि ये तमाम वजहें हों, जिससे राहुल कुछ बोलने की बजाए चुप रहने में ही भलाई समझ रहे हों।
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