क्यों लिपुलेख पास से कैलाश मानसरोवर यात्रा के विरोध में नेपाल, भारत ने दिया दो टूक जवाब
नई दिल्ली। नेपाल ने भारत-चीन सीमा पर स्थित लिपुलेख पास को जोड़ने वाली सड़क निर्माण के भारत के फैसले पर विरोध जताया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शुक्रवार को इस सड़क का उद्घाटन किया है। 17,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित लिपुलेख पास उत्तराखंड में पिथौरागढ़ जिले के तहत आने वाले धारचूला में पड़ता है। भारत की तरफ से नेपाल को स्पष्ट कर दिया गया है कि यह सड़क कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले तीर्थयात्रियों के प्रयोग के लिए है। विदेश मंत्रालय ने नेपाल को दो टूक कहा है कि यह सड़क भारत की सीमा में पड़ती है।

76 किलोमीटर सड़क का काम पूरा
यह सड़क 80 किलोमीटर लंबी है और माना जा रहा है कि इस सड़क की वजह से यात्रा पर जाने वाले तीर्थयात्रियों को तिब्बत तक जाने में आसानी हो सकेगी। भारत और तिब्बत के बीच लिपुलेख पास पिछले कुछ समय से व्यापार का बड़ा जरिया बना हुआ है। कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाने वाले तीर्थयात्री अब तीन रास्तों से यात्रा पर जा सकते हैं-सिक्किम, उत्तराखंड और नेपाल में काठमांडू। यह तीनों ही रास्ते काफी लंबे हैं। 80 किलोमीटर लंबी इस सड़क पर अब तक 76 किलोमीटर की दूरी का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है।

लिपुलेख पर नेपाल ने जताया अपना दावा
इस रास्ते की वजह से यात्री वाहनों का प्रयोग कर बस दो दिनों में ही अपने गंतव्य तक पहुंच सकते है। इस साल के अंत तक बाकी बची चार किलोमीटर की दूरी का निर्माण भी पूरा हो जाएगा। यह सड़क रणनीतिक वजहों से काफी अहम है। नेपान लिपुलेख पास पर अपना दावा जताता है और कहता है कि धारचूला, सुदूरपश्चिम जिले में आता है। यह जगह कालापानी नदी से घिरी है और इससे एक नदी और निकली है जिसे काली नदी कहते हैं। काली नदी हिमालय पर 3,600 से 5,200 फीट की ऊंचाई पर बहती है। भारत लिपुलेख पास को एक तिहरा रास्ता मानता है जिसके पूर्व में नेपाल की सीमा है।

अभी तक नेपाल ने नहीं किया विरोध
इसी क्षेत्र में काली नदी भी पड़ती है जो भारत और नेपाल के बीच से बहती है। भारत का कहना है कि उसने इसकी मुख्यधारा को सीमा में शामिल नहीं किया है। लिपुलेख पास हमेशा से भारत के नक्शे में था और नेपाल ने कभी भी इसका विरोध नहीं किया है। चीन ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि यह भारत का हिस्सा है और इसी वजह से उसने तिब्बत तक जाने के लिए इसे मंजूरी दी। नेपाल का कहना है कि सीमा पर विवाद को बातचीत और समझौतों के जरिए सुलझाना चाहिए।

उत्तराखंड का रास्ता काफी लंबा
उत्तराखंड के जरिए जो रास्ता यात्रा तक जाता है उसमें तीन पड़ाव हैं। पहला पड़ाव करीब 107.6 किलोमीटर लंबा है और पिथौरागढ़ से तावाघाट तक जाता है। दूसरा पड़ाव तावाघाट से घटियाबगढ़ तक जाता है और यह 19.5 किलोमीटर लंबा है। इसके बाद तीसरा रास्ता घटियाबगढ़ से लिपुलेख पास तक जाता है और यह 80 किलोमीटर लंबा है जो चीन सीमा तक जाता है। इस पूरे रास्ते को कवर करने में करीब पांच दिन का समय लग जाता है और इस रास्ते पर कई घटनाएं भी हो चुकी है।
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