नरेंद्र मोदी और अमित शाह नाराज़ छात्रों से बात क्यों नहीं कर रहे

विरोध प्रदर्शन
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जवाहर लाल यूनिवर्सिटी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी, जादवपुर यूनिवर्सिटी और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू)... ये वो नाम हैं जो पिछले कुछ सालों से लगातार चर्चा में बने हुए हैं.

इन विश्वविद्यालयों और कुछ अन्य शिक्षण संस्थानों के छात्रों की सरकार और प्रशासन से नाराज़गी समय-समय पर सामने आती रहती है.

जेएनयू में फ़ीस बढ़ोतरी का मामला हो, नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध हो, बीएचयू में छात्राओं के साथ छेड़छाड़ के ख़िलाफ़ विरोध हो या रोहित वेमुला की आत्महत्या का मसला हो; हज़ारों की संख्या में छात्र-छात्राओं ने सड़क पर उतरकर बीजेपी सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है.

जेएनयू में विरोध प्रदर्शन
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जेएनयू में विरोध प्रदर्शन

छात्रों ने सरकार पर उनकी बात अनसुनी करने, मनमानी करने और निष्पक्ष कार्रवाई न करने के आरोप लगाए हैं. हालांकि, सरकार और प्रशासन में मौजूद अधिकारी इन आरोपों से इनकार करते रहते हैं.

ताज़ा मामला जेएनयू में नक़ाबपोश लोगों द्वारा छात्रों के साथ मारपीट करने का है. इस पर जल्द कार्रवाई करने की मांग की जा रही है. यहां भी छात्रों का पुलिस पर लापरवाही बरतने का आरोप है.

छात्रों के प्रति बेरुख़ी?

सत्ता और छात्रों के बीच ये टकराव लंबे समय से नज़र आ रहा है.

लेकिन, जिस तरह सरकार ने नागरिकता संशोधन क़ानून के मसले पर घर-घर जाकर लोगों से बात करने का अभियान चलाया है और ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बॉलिवुड की हस्तियों से मिले हैं, इस तरह की कोई कोशिश छात्रों के मामले में नज़र नहीं आई है.

सवाल उठ रहा है कि इसके पीछे क्या कारण हैं? क्या सरकार छात्रों में भरोसा पैदा करने की कोशिश ही नहीं करती या सरकार की कोशिशें पटल पर नज़र नहीं आतीं?

जेएनयू में विरोध प्रदर्शन
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जेएनयू में विरोध प्रदर्शन

इस संबंध में जेएनयू के पूर्व छात्र और राजनीतिक विश्लेषक अमित सेन गुप्ता कहते हैं, ''2014 में जब से बीजेपी सरकार आई है, छात्र उसके निशाने पर रहे हैं. जेएनयू में ये हमला 2016 से शुरू हुआ है जब जेएनयू छात्र संघ के पूर्व नेता कन्हैया कुमार और उमर ख़ालिद को पुलिस ने गिरफ़्तार किया था. यहां वाइस चांसलर इनका है जो सरकार के पक्ष में काम करता है.''

''ये जेएनयू को एक ऐसा उदाहरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर इसे झुका दिया तो बाक़ी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में भी सब झुक जाएंगे. फिर उसका किसान संघों और सिविल सोसाइटी पर भी असर पड़ेगा और ये संदेश जाएगा कि हम तुमको भी ख़त्म कर देंगे.''

लेकिन, दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर संगीत रागी मानते हैं कि ये छात्र आंदोलन नहीं है बल्कि ये राजनीतिक विरोध है.

संगीत रागी कहते हैं, ''जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय और बीएचयू, इन सभी शिक्षण संस्थानों में हुआ विरोध एक ही मसले पर नहीं है. कोई फ़ीस और हॉस्टल सुविधा के लिए हुआ, जादवपुर में कभी समर्थन तो कभी विरोध नज़र आता है, अलीगढ़ में जेएनयू और जामिया के छात्रों के समर्थन में विरोध प्रदर्शन हुआ. इसलिए सरकार किस-किस छात्र को और किस-किस मुद्दे पर निजी तौर पर समझाएगी? बाक़ी हर विश्वविद्यालय के मसले को उसके स्तर पर सुलझाने की कोशिश होती है. जैसे जेएनयू में फ़ीस बढ़ने पर कमिटी बनाई गई और छात्रों की बात को सुना गया.''

''ये भी जानना ज़रूरी है कि ये विरोध होता क्यों है. ख़ासकर की जेएनयू में जो सबसे ज़्यादा चर्चा में रहा है. जेएनयू वामपंथी छात्र संगठन और शिक्षकों का एक वैचारिक केंद्र रहा है. इन्हें चुनौती देने की हिम्मत पहले किसी ने नहीं दिखाई. लेकिन, अब दूसरी विचारधारा के संगठनों और शिक्षकों ने लेफ़्ट विंग के सामने मुखर होना शुरू किया है. वाइस चांसलर ने नियमों को गंभीरता से लागू करना शुरू किया है तो अब लेफ़्ट विचारधारा के छात्र इस चुनौती पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं, विरोध कर रहे हैं.''

विरोध प्रदर्शन
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युवाओं तक पहुंचने की कितनी कोशिश

छात्र किसी देश का भविष्य भी निर्धारित करते हैं. किसी भी पार्टी के लिए युवा एक बड़ा वोट बैंक होते हैं. वहीं, देश में दिल्ली, बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनाव भी आने वाले हैं जो महाराष्ट्र और झारखंड की हार को देखते हुए बीजेपी के लिए बेहद अहम हैं. ऐसे में बीजेपी क्या युवाओं का समर्थन बीजेपी की चिंता नहीं हैं?

अमित सेन गुप्ता मानते हैं कि इस सरकार ने कभी किसी को मनाने की चिंता नहीं की. वह कहते हैं, "धारा 370 हटाई, कश्मीर में सेना तैनात की लेकिन इस पर कोई चर्चा नहीं की. यही हाल सीएए, एनआरसी में है. आप सिविल सोसाइटी, सांसदों और अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात कर सकते हैं लेकिन इस सरकार को सबकी सहमति की चिंता नहीं है. ये लोग नौजवानों को अपना दुश्मन मान रहे हैं."

''इस बार जामिया में पहली बार ऐसा विरोध देखने को मिला और पुलिस की क्रूरता भी सामने आई. इस सबसे देश का माहौल सामने आ रहा है कि किस तरह दो लोगों की मर्ज़ी के हिसाब से ये देश चल रहा है.''

लेकिन दो लोगों की सरकार के मसले पर संगीत रागी कहते हैं कि इस सरकार में दो लोगों के अलावा और भी मंत्री हैं. वह कहते हैं, "सरकारी संस्थाएं और सरकार में सबकी भागीदारी है. लेकिन जब किसी ने ये तय कर ही लिया है कि मैं इस सरकार के साथ नहीं हूं और ये सरकार वामपंथ के ख़िलाफ़ है तो सरकार सरकार उसे नहीं समझा सकती."

PTI

सरकार से कितनी उम्मीद

लेकिन, राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी का कहना है कि इस बार सरकार के अलग-अलग वर्गों से बात करने की उम्मीद थी लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

नीरजा चौधरी ने कहा, ''जिस तरह सरकार ने सीएए को लेकर लोगों को समझाने की बात कही और गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एनआरसी को पूरे देश में लागू करने के मामले में बैकफुट पर आए, उसे देखकर लग रहा था कि वो छात्रों और सिविल सोसाइटी से भी अलग से चर्चा करेंगे. लेकिन, ऐसा कोई पहल नहीं हुई. उन्होंने मुख्यमंत्रियों और अल्पसंख्यक संगठनों से भी बात नहीं की.''

वह कहती हैं, ''जहां तक बात छात्रों से संवाद न करने की है तो इसकी वजह बीजेपी की हिंदू-मुस्लिम धुव्रीकरण की नीति हो सकती है. छात्रों से बात करने से ये नीति कमज़ोर पड़ सकती है क्योंकि कई महत्वपूर्ण चुनाव आने वाले हैं. उनमें इस मसले का असर पड़ सकता है.''

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