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क्यों चर्चाओं में है झारखंड का ये जिला? जानें जामताड़ा की बदनामी का इतिहास

जामताड़ा झारखंड में स्थित एक जिला है। ये अपने साइबर अपराधों की वजह से चर्चाओं का विषय बना था। इस छोटे से जगह ने साइबर अपराध में बदनामी हासिल की है और इसे साइबर राजधानी के रूप में जाना जाता है।

जामताड़ा दुमका जिले से अलग होकर बनाया गया एक छोटा जिला है। यह उत्तर में देवघर जिले, पूर्व में दुमका और पश्चिम बंगाल, दक्षिण में धनबाद और पश्चिम बंगाल और पश्चिम में गिरिडीह से घिरा है। इसका कुल क्षेत्रफल 1811 वर्ग किमी है। 2011 में हुई भारत की जनगणना के अनुसार यहां की जनसंख्या 7,91,042 व्यक्ति है।
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Why is Jamtara infamous

साइबर क्राइम के लिए बदनाम है जामताड़ा
जामताड़ा धोखाधड़ी में घोटालेबाजों का एक समूह शामिल है जो खुद को वैध कंपनियों का प्रतिनिधि बताते हैं। अक्सर वे बैंकों या बीमा कंपनियों के कर्मचारी होने का दिखावा करते हैं।

इस आड़ में, वे संदिग्ध व्यक्तियों को उनकी व्यक्तिगत और वित्तीय जानकारी, जैसे बैंक खाता संख्या, पासवर्ड और क्रेडिट कार्ड विवरण शेयर करने के लिए बरगलाते हैं। फिर घोटालेबाज इस जानकारी का उपयोग धोखाधड़ी वाले लेनदेन को अंजाम देने के लिए करते हैं, जैसे अनधिकृत खरीदारी करना या पीड़ित के खातों से पैसे ट्रांसफर करना।

जामताड़ा के धोखेबाज अक्सर सोशल इंजीनियरिंग जैसी रणनीति का उपयोग करते हैं। पहले वो लोगों से बात कर के उनका विश्वास जीतते हैं फिर उन्हें उन पर भरोसा करने के लिए मनाते हैं।
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हाल के वर्षों में, जामताड़ा-शैली वाले धोखेबाज भारत के अन्य हिस्सों में भी सक्रिय हो गए हैं। यह भारत में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय रहा है। इन घोटालेबाजों पर नकेल कसने और उनके संचालन को खत्म करने के लिए कई प्रयास किए गए हैं।

पिछले साल दिल्ली पुलिस ने ग्राहक सेवा केंद्रों के माध्यम से भारत में 2,500 से अधिक व्यक्तियों से 1 करोड़ रुपये की ठगी करने के आरोप में जामताड़ा से छह लोगों को गिरफ्तार किया था। आरोपी अपने सेलफोन नंबरों को अधिकांश बैंकों के ग्राहक सेवा नंबरों के रूप में प्रकाशित करते थे। बैंकों या ऑनलाइन खुदरा विक्रेताओं के लिए ग्राहक सेवा जानकारी की तलाश करने वाले लोगों को अक्सर दिए गए नकली नंबर मिलते हैं और वे साइबर धोखाधड़ी का शिकार हो जाते हैं।
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कहां से हुई धोखाधड़ी की शुरूआत?
जामताड़ा पुलिस की फाइलों के अनुसार करीब 14 साल पहले यहां के एक गांव, सिंदरजोरी में रहने वाला सीताराम मुंबई गया था। उसने वहां मोबाइल रिचार्ज की दुकान में नौकरी की और ठगी करना सीखा। छुटि्टयों में जब वह लौटा तो ठगी के हथकंडे को आजमाया।

जाली सिमकार्ड लगाकर, नकली बैंक मैनेजर बनकर ग्राहकों को फोन लगाता, कहता- आपका कार्ड ब्लॉक हो गया है। इस बहाने एटीएम नंबर, ओटीपी और सीवीवी नंबर जैसी जानकारियां मांग लेता। फोन कट होते-होते ग्राहक की जेब भी कट चुकी होती थी।

इस पैसे को वह मोबाइल रिचार्ज रिटेलर की आईडी में ट्रांसफर करता। तीस फीसदी रखकर रिटेलर उसे बाकी 70 फीसदी कैश दे देता। उसने कमीशन का लालच देकर कई लोगों के बैंक खाते व चेकबुक हासिल कर ली। ठगी की रकम वह इन्हीं खातों में ट्रांसफर करता।

सीताराम पकड़ा गया। डेढ़ साल की सजा हुई। जमानत पर छूटा ही था कि दूसरे केस में पुलिस ने उसे पकड़ लिया। लेकिन सीताराम के शार्गिदों ने गांव में कई गैंग बना रखे हैं, जो यहीं से देशभर में ठगी का खेल बदस्तूर कर रहे हैं। यह भी देखें: झारखंड के जामताड़ा में हुए ट्रेन हादसे पर सीएम चंपई ने जताया दुख, बताया बचाव कार्य जारी है

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