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पैग़ंबर मोहम्मद की तस्वीर बनाना इस्लाम में क्यों मना है?

पवित्र कुरान
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पवित्र कुरान

इस्लाम के आख़िरी पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद के बारे में चर्चा के दौरान एक बात पर आपने ज़रूर ग़ौर किया होगा. इसमें कभी भी मोहम्मद साहब की कोई तस्वीर नहीं दिखाई जाती है. इसकी वजह यह है कि इस्लाम में अल्लाह या दूसरे किसी भी पैग़ंबर को पेंटिंग, तस्वीर या किसी दूसरे तरीक़े से दिखाना मना है. 

ज़्यादातर मुसलमानों के लिए तो मोहम्मद साहब को चित्र वग़ैरह के माध्यम से दिखाना बिल्कुल ही वर्जित है. उनका चित्र या मूर्ति बनाना उनका अपमान समझा जाता है. माना जाता है कि यह बुतपरस्ती या मूर्ति पूजा को बढ़ावा देना है. जब भी कोई इस नियम को तोड़ता है तो यह भारी विवाद का कारण बन जाता है. आपको पैग़ंबर मोहम्मद के कार्टून प्रकाशित करने पर फ्रेंच साप्ताहिक पत्रिका शार्ली एब्दो की घटना याद होगी. 

लेकिन इस्लाम में ऐसे नियम क्यों हैं? क्यों पैग़ंबर को चित्र या किसी और माध्यम से दिखाना प्रतिबंधित है? क्या पैग़ंबर का कभी कोई चित्र रहा है? इस संबंध में मुसलमानों का धार्मिक ग्रंथ कुरान क्या कहता है? इस पाबंदी ने इस्लामी कला को किस हद तक प्रभावित किया है?

ऐसे बहुत सारे सारे सवाल हैं जिनके जवाब इस लेख में तलाशने की कोशिश की गई है.

क़ुरान में इस बारे में क्या कहा गया है?

इस्लाम के पवित्र ग्रंथ क़ुरान में अल्लाह की तस्वीर या पैग़ंबर मोहम्मद की तस्वीर पर विशेष या स्पष्ट तौर पर कोई पाबंदी नहीं है. चाहे ये तस्वीर तराशी हुई हो या फिर चित्रकारी के ज़रिये बनाई गई हो. 

लेकिन क़ुरान में कई जगह ऐसा कुछ कहा गया है जिसके आधार पर इस्लाम के जानकार कहते हैं कि इस्लाम में तस्वीर बनाना मना है.

क़ुरान में कुल 114 चैप्टर हैं जिन्हें सूरा कहा जाता है. हर चैप्टर या सूरे के अंदर छोटे-छोटे खंड होते हैं जिन्हें आयत कहा जाता है.

पुरे क़ुरान में कुल 6236 आयत हैं.

जानकारों के मुताबिक़ क़ुरान के 42वीं सूरे की 42 नंबर आयत में कहा गया है, "अल्लाह ही धरती और स्वर्ग को पैदा करने वाला है. उसकी तस्वीर जैसी कोई चीज़ नहीं है."

क़ुरान में लिखी गई इन बातों के आधार पर इस्लाम के जानकार मतलब निकालते हैं कि अल्लाह को किसी मनुष्य  के हाथों से बनाई गई तस्वीर में क़ैद नहीं किया जा सकता. उसका सौंदर्य इतना ज़्यादा और महिमा इतनी बड़ी है कि मनुष्य के हाथों इसका चित्रण नहीं हो सकता.

अगर किसी ने ऐसा करने की कोशिश भी की तो इसे अल्लाह का अपमान माना जाएगा. मोहम्मद साहब के बारे में भी यही मान्यता लागू होती है. 

कुरान के चैप्टर या सूरे नंबर 21 की आयत नंबर 52 से 54 में कहा गया है, (अब्राहम) ने अपने पिता और उनके लोगों से कहा, ''ये किन तस्वीरों की पूजा आप कर रहे हैं? उन्होंने कहा, ''हमने अपने पूर्वजों को इनकी पूजा करते देखा है. इस पर अब्राहम ने कहा, ''निश्चित तौर पर आपने देखा होगा, आपके पिता ने भी इसे देखा होगा. लेकिन ये निश्चित तौर पर ग़लती थी.''

इस आयत का हवाला देते हुए इस्लाम के जानकार मानते हैं कि तस्वीरें बुतपरस्ती यानी मूर्ति पूजा को बढ़ावा दे सकती हैं. इसका मतलब यह है कि इस्लाम के जानकारों को इस बात की आशंका रहती है कि तस्वीर बनाने से किसी दैवीय प्रतीक की जगह उसकी आकृति पूजा या उपासना की वस्तु बन सकती है.

क़ुरान में इस बारे में ख़ास तौर पर कुछ नहीं कहा गया है लेकिन हदीस (हज़रत मोहम्मद ने अपने जीवन में जो कहा या किया उसे हदीस कहा जाता है) में तो तस्वीर बनाने से परहेज़ करने के लिए साफ़ तौर पर कहा गया है.

इस्लाम
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हदीस में इस बारे में क्या कहा गया है?

मोहम्मद साहब ने अपने जीवन में जो कुछ भी कहा और किया उनको हदीस कहा जाता है. मोहम्मद साहब के निधन के बाद उन्हें लिखा गया था. 

हदीस के अनुसार अल्लाह, मोहम्मद, ईसाई और यहूदी परंपरा के सभी प्रमुख पैग़ंबरों की तस्वीर पर पाबंदी है.

यहां तक कि इस्लामी परंपरा जीवित प्राणियों की ख़ास कर मनुष्यों की तस्वीर बनाने पर भी पाबंदी लगाती है.

यही वजह है कि इस्लामी कला ज़्यादातर अमूर्त और सजावटी चित्रण की ओर झुकी हुई है. दुनिया भर में बनी मस्जिदों की दीवारों और कुरान के पन्नों पर हमें ज्यामितीय पैटर्न के नमूने देखने को मिलते हैं. 

शिया मुसलमानों की परंपरा में ये प्रतिबंध उतने सख़्त नहीं हैं. पर्शिया (आधुनिक ईरान) में बनी सातवीं सदी की मोहम्मद साहब की तस्वीरें आपको मिल सकती हैं.

एडिनबरा यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर मोना सिद्दीक़ी मुस्लिम कलाकारों की बनाई मोहम्मद साहब की तस्वीरों का ज़िक्र करती हैं. ये तस्वीरें मंगोल और ऑटोमन साम्राज्य में बनाई गई थीं. 

इन तस्वीरों में मोहम्मद साहब के चेहरे को बिल्कुल नहीं दिखाया गया है लेकिन ये साफ़ है कि यह उन्हीं को दर्शाती हैं. वह कहती हैं ये तस्वीरें मोहम्मद साहब के प्रति समर्पण से प्रेरित होकर बनाई गई थीं. 

वह कहती हैं, ''ज़्यादातर लोगों ने उनकी तस्वीरें उनके प्रति प्रेम और श्रद्धा की वजह से बनाई थीं. उनका इरादा बुतपरस्ती का बिल्कुल भी नहीं था''.  

आख़िर कब ये माना गया कि मोहम्मद साहब की तस्वीर बनाना हराम है या पूरी तरह प्रतिबंधित है?  

 मिशिगन यूनिवर्सिटी में इस्लामी कला की प्रोफ़ेसर क्रिस्टिएन ग्रुबर के मुताबिक़ मोहम्मद साहब की काफ़ी तस्वीरें 14वीं सदी की हैं और उस वक़्त उन तस्वीरों को निजी तौर पर देखा जा सकता था ताकि बुतपरस्ती को बढ़ावा न मिले. 

ग्रुबर कहती हैं कि 18वीं सदी में बड़े पैमाने पर प्रिंट मीडिया के प्रसार से इसे चुनौती मिलने लगी. इस बीच कई मुसलमान देशों पर यूरोपीय ताक़तों और विचारों ने अपना आधिपत्य क़ायम कर लिया था. इसका भी इस विषय पर असर पड़ा. 

ग्रुबर कहती हैं कि इस्लामी दुनिया ने इस उपनिवेशवादी विचारधारा का जवाब यह बताकर दिया कि उनका इस्लाम धर्म ईसाई धर्म से कितना अलग है.

ईसाई धर्म में मूर्ति बनाना, तस्वीर बनाना या पेंटिंग करना बिल्कुल भी मना नहीं है.

इसके बाद मोहम्मद साहब की तस्वीरें ग़ायब होने लगती हैं और उनके चित्र या आकृति गढ़ने के ख़िलाफ़ एक नई बहस छिड़ गई.

लेकिन ज़्यादातर मुस्लिम शोधकर्ता और विद्वान कहते हैं कि शास्त्रीय विद्वानों ने हमेशा से ही मोहम्मद साहब, अल्लाह या दूसरे पैग़ंबरों की आकृतियों या किसी भी प्रकार के चित्रण की हमेशा निंदा की है.

ब्रिटेन की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक लीड्स की मक्का मस्जिद के इमाम क़ारी आसिम कहते हैं कि मध्यकाल में मोहम्मद साहब की बनाई गईं कुछ तस्वीरों को हमें उसके संदर्भ में समझना होगा. 

 वह कहते हैं, ''इनमें से ज़्यादातर तस्वीरें एक ख़ास रात में एक ख़ास सफ़र की तरफ़ इशारा करती हैं. इसमें भेड़ या घोड़ा दिखाया गया है. मोहम्मद साहब घोड़े या ऐसी ही किसी चीज़ पर बैठे हुए हैं."

(मुसलमानों का ऐसा विश्वास है कि मोहम्मद साहब ने ज़मीन से स्वर्ग की यात्रा की थी और यह सफ़र उन्होंने एक ख़ास रात में तय किया था.) 

एक अहम चीज़ ये है कि ये मोहम्मद साहब के साधारण पोट्रेट भर नहीं हैं. प्रोफ़ेसर आसिम का ये भी कहना है कि कई चित्र के विषय स्पष्ट नहीं हैं.

एडिनबरा यूनिवर्सिटी में समसामयिक दुनिया में इस्लामी अध्ययन केंद्र में अल-वलीद सेंटर के डायरेक्टर प्रोफ़ेसर ह्यू गोदारे कहते हैं, ''क़ुरान और हदीस जैसे मूल स्त्रोतों में भी इस मामले में एक मत नहीं है. बाद में मुसलमानों के अंदर इस मुद्दे पर अलग-अलग राय दिखने लगी.'' 

वह कहते हैं,''ये बहस आगे जाकर और मज़बूत हो गई. ख़ास मोहम्मद इब्न अब्दुल वहाब के आंदोलन की शुरुआत के बाद से.'' 

 उनका कहना है, ''निश्चित तौर पर पिछले 200 या संभवत: 300 वर्षों के दौरान इसमें महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं. '' 

कैलिग्राफी
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कैलिग्राफी

इस्लामी कला कैसे उभरी? 

 जैसा कि पहले कहा गया है कि इस्लाम के शिया और सुन्नी पंथों में मोहम्मद साहब की तस्वीर या आकृति बनाने को लेकर अलग-अलग विचार रहे हैं.  

लेकिन मोटे तौर पर इस्लामी धर्म गुरुओं, विद्वानों और विशेषज्ञों में इस बात पर आम सहमति है कि मोहम्मद साहब की तस्वीर किसी भी रूप में नहीं बनाई जानी चाहिए. 

हालांकि इस्लाम में पोट्रेट बनाना पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है. लेकिन इन पोट्रेटों को धार्मिक संदर्भों में नहीं देखा जाना चाहिए. यही वजह है कि हमें कई मुस्लिम बादशाहों और रानियों की तस्वीरें मिल जाती हैं. लेकिन कुरान में वर्णित अल्लाह, पैग़ंबर या किसी दूसरी किसी भी चीज़ की नहीं.  

इससे इस्लामी देशों में कला के एक नए रूप का उदय हुआ. जहां हम हिंदू मंदिरों में देवी देवताओं के चित्र देखते हैं और यूरोपीय चर्चों में यीशु, मरियम और अन्य संतों को, वहीं मस्जिदें ज्यामितीय आकृतियों से सजी होती हैं. उनमें कैलिग्राफी और जालीनुमा संरचनाएं होती हैं. 

चूंकि पैग़ंबर की आकृति बनाने पर प्रतिबंध है, लिहाज़ा कुछ लोगों ने उनके निरुपण के लिए नए तरीक़े अपनाने शुरू किए. इसी क्रम में ऑटोमन साम्राज्य में हिल्या जैसे दृश्य रूपों का उदय हुआ. यह एक कैलिग्राफिक प्रिंट है. ये आयतों का कैलिग्राफिक प्रिंट होता है, जिनमें पैग़ंबर की चर्चा होती है. 

इस्लाम
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पैग़ंबर की विवादास्पद तस्वीरें 

डेनमार्क के अख़बार जिलेंड्स-पोस्टेन ने  2005 में सेल्फ-सेंसरशिप की आलोचना में एक संपादकीय के साथ  मोहम्मद साहब के 12 कार्टून छापे थे. 

कई मुसलमानों ने इन कार्टूनों को अपमानजनक माना. उनका मानना था कि इस्लाम के प्रति यूरोप का बढ़ती दुश्मनी और मुसलमानों के डर की वजह से इस तरह की चीज़ें सामने आ रही हैं. पैग़ंबर और आम तौर पर मुसलमानों को चरमपंथियों की तरह दिखाना उनके लिए काफ़ी आपत्तिजनक था. 

2011 में पेरिस में शार्ली एब्दो (साप्ताहिक पत्रिका) के दफ़्तर पर हमला हुआ था. कारण यह था कि इस पत्रिका ने थोड़े समय के लिए अपना नाम बदल कर शरिया एब्दो कर लिया था. शरिया यानी इस्लामी क़ानून. पत्रिका ने एक अंक के  लिए अपना ये नाम रखा था और पैग़ंबर मोहम्मद को मुख्य संपादक बनने के लिए आमंत्रित किया था. 

अगले साल इस व्यंग्य पत्रिका ने एक ऐसा अंक प्रकाशित किया जिसमें ऐसे कार्टून थे, जिन्हें देख कर लगता था कि मोहम्मद साहब की आपत्तिजनक आकृति बनाई गई है. ये सब एक इस्लाम विरोधी फ़िल्म के रिलीज़ पर हुए हंगामे के बीच हुआ था. 

2015 में इस्लामी चरमपंथियों ने शार्ली एब्दो के दफ़्तर पर हमला कर 12 लोगों को मार डाला था. ये हमला मोहम्मद साहब के कार्टून छापने के बाद हुआ था. 

2015 में ईरानी निर्देशक माजिद मजिदी की फ़िल्म '' मोहम्मद- द मैसेंजर ऑफ़ गॉड'' ने इस्लामी दुनिया में एक बहस खड़ी कर दी. 

यह फ़िल्म मोहम्मद साहब की शुरुआती ज़िंदगी पर आधारित थी. लेकिन इसमें सीधे तौर पर किसी भी तरह से पैग़ंबर का चित्रण नहीं किया गया था. ईरान में कइयों ने इसकी तारीफ़ की लेकिन कई देशों में इस फ़िल्म को प्रतिबंधित कर दिया गया.

2020 में पेरिस के एक शिक्षक सैमुअल पैटी का गला काट दिया गया था. उन्होंने अपनी क्लास में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पाठ समझाने के लिए मोहम्मद साहब के कार्टून का इस्तेमाल किया था. 

इस्लामिक शैली
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इस्लामिक शैली

भारतीय क़ानून क्या कहता है? 

भारतीय क़ानून में ऐसा कोई ख़ास प्रावधान नहीं है, जो भारत में मोहम्मद साहब की आकृति से वास्ता रखता हो. इस संबंध में कोई भी शिकायत धार्मिक मामलों से संबंधित भारतीय दंड संहिता के तहत ही दर्ज की जाती है.  

आईपीसी की धारा 153 के मुताबिक़ अगर कोई व्यक्ति दंगा करने के उद्देश्य से कोई भड़काऊ बयान देता है या ऐसी कोई कार्रवाई करता है तो यह अपराध माना जाएगा.

आईपीसी की धारा 298 कहती है-  किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से उसकी धार्मिक सभा या सत्संग में किसी ग़लत शब्द का उच्चारण करना, शोर मचाना, या शरीर का कोई अंग दिखाना, कोई वस्तु रख देना,  संज्ञेय एवं ज़मानती अपराध है. इसमें एक साल के लिए जेल और जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.

(भारतीय क़ानून पर जान्हवी मुले के इनपुट के साथ)

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