देश की आईटी हब बेंगलुरु में साइबर क्राइम का दोषी कोई नहीं!
बेंगलुरु। सरकार की ओर से 32 यूआरएल को ब्लॉक करने का फैसला किया गया है और दो साइट्स के यूआरएल को ब्लॉक भी कर दिया गया है। सरकार के इस फैसले के बाद से ही बहस शुरू हो गई है कि सरकार को साइट्स को ब्लॉक करना चाहिए या फिर नहीं। लेकिन इन सबके बीच ही इस बात के बारे में भी बातें हो रहीं हैं कि सरकार की अप्रोच ठीक नहीं है और यहीं पर सारी समस्या की शुरुआत होती है।

इंटरनेट, आईएसआईएस और आतंकवाद
दरअसल पिछले कुछ दिनों में जब से देश में आईएसआईएस से जुड़े युवाओं के बारे में खबरें आनी शुरू हुई हैं तब से ही इंटरनेट के रोल के बारे में भी सवाल उठ रहे हैं। ऑनलाइन युवाओं को भ्रमित करने वाली साइट्स को जैसे ही बंद किया जाता है, एक और वेबसाइट सामने आ जाती है। भारत के लिए यहीं से चुनौतियों में इजाफा हो रहा है।
बेंगलुरु सबसे कमजोर
बेंगलुरु जिसे देश की आईटी हब कहा जाता है और जिसे देश के सबसे टेक-सेवी शहरों में शुमार किया जाता है, यहां पर अभी तक साइबर क्राइम ऐसा भी केस सामने नहीं आया है जिसमें दोष साबित हो सका हो।
बेंगलुरु में वर्ष 2001 में साइबर क्राइम सेल की शुरुआत हुई थी। अभी तक हालात वहीं के वही हैं। आपको बता दें कि पिछले दिनों बेंगलुरु से ही आईएसआईएस के ट्विटर हैंडल के ऑपरेट होने की खबरें आई थीं। इन खबरों के बाद पुलिस ने मेहदी मसरूर बिस्वास नामक एक शख्स को गिरफ्तार भी किया था। यह सारे हालात बयां करने को काफी हैं कि बेंगलुरु में हालात किस तरह के हैं।
क्या हैं वजहें
साइबर क्राइम सेल के प्रमुख तर्क देते हैं कि जितने भी सर्विस प्रोवाइडर्स हैं, वह अमेरिका में हैं और ऐसे में यह काफी मुश्किल है। साइबर क्राइम सेल के प्रमुख की मानें तो कई केसेज तो ऐसे हैं जिनमें सर्विस प्रोवाइडर्स को शिकायत भी भेजी गई है लेकिन पिछले आठ वर्षों से वह शिकायत वहीं की वहीं पड़ी है।
90 प्रतिशत मामलों में छूटते आरोपी
- भारत में साइबर क्राइम से जुड़े केसों में दोषियों को सजा मिल पाना काफी मुश्किल है।
- देश में ऑब्जेक्शनेबल कंटेंट पर रोक लगा पाने में काफी मुश्किलें आ रही है।
- वहीं देश में साइबर क्राइम से जुड़े केस में सिर्फ 0.5 प्रतिशत केस ही ऐसे होते हैं जिनमें दोष साबित हो पाता है।
- 90 प्रतिशत केस में वेबसाइट्स मालिकों की ओर से सहयोग न मिल पाने की वजह से आरोपियों को छोड़ना पड़ता है।
- इस समय करीब 18,000 शिकायतें देशभर में बनी अलग-अलग साइबर सेल के पास दर्ज हैं।
- शिकायतें तो जल्द दर्ज होती हैं लेकिन जब शिकायतों की जांच के लिए वेबसाइट्स प्रोवाइडर्स से डाटा मांगा जाता है तो वह आनाकानी करते हैं।
- ऐसे में आरोपी को छोड़ना ही पड़ जाता है।
- सर्विस प्रोवाइडर की ओर से कोई सहयोग न मिल पाने की स्थिति में साइट को ब्लॉक करना ही आखिरी विकल्प बचता है।
क्लोजर रिपोर्ट आखिरी रास्ता
ज्यादातर केस ऐसे होते हैं जिनमें गवाह मुकर जाता है क्योंकि सूबुत ही नहीं होते हैं। ऐसे में अधिकारी के पास सिर्फ क्लोजर रिपोर्ट ही फाइल करने का ऑप्शन रह जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक साइबर क्राइम से जुड़े केसों में देशों के बीच आपसी सहयोग एक अहम जरूरत है।
अब जबकि आतंकवाद को इंटरनेट का सहारा मिल रहा है, यह काफी जरूरी है कि दुनिया भर के देशों को इस समय आगे आना होगा और इस समस्या से निबटने के लिए आपसी सहयोग बढ़ाना ही होगा।
भारत और इजरायल आएंगे साथ
साइबर क्राइम से जुड़े मुद्दों पर भारत और इजरायल ने एक दूसरे की मदद करने का फैसला किया है। भारत और इजरायल एक साथ मिलकर इंटरनेट के जरिए बढ़ने वाले आतंकवाद और साइबर क्राइम से लड़ेंगे। भारत की सबसे बड़ी समस्या चीन और पाकिस्तान से मिल रही साइबर चुनौतियों से पार पाना है।
हाल ही में जब गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने साइबर क्राइम से लड़ने के लिए दोनों देशों के साथ आने की जरूरत और इससे जुड़ी अहमियत के बारे में बात की थी। दोनों ही देश एक साथ आगे बढ़ने पर राजी हो गए हैं।












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