महागठबंधन में 'दुक्की पे सत्ता' के भ्रमजाल से किसे होगा फायदा?

नई दिल्ली- उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का महागठबंधन अजीब सी उलझन में है। उलझन इस बात को लेकर है कि कांग्रेस ने उनके और उनके परिवार वालों के लिए 7 सीटें क्यों छोड़ी हैं? कांग्रेस कहेगी कि उसने तो सिर्फ नेकी का जवाब ज्यादा नेकी करके दिया है। मसलन 2 सीटों के जवाब में 7 सीटों पर अपने उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया है। फिर बहन जी इतना क्यों भड़क रही हैं? भला कांग्रेस उनकी नेकी पर कहां नाराज हुई थी। लेकिन, यह वोटों का समीकरण ही ऐसी चीज है, जिसमें कभी-कभी ज्यादा नेकी भी भारी पड़ सकती है। यही वजह है कि बुआ हर हाल में कांग्रेस से दूरी बनाकर रखना चाहती हैं। बुआ की परेशानी देखकर अब बबुआ को भी कांग्रेस की दोस्ती रास नहीं आ रही है।

मायावती की उलझन

कुछ ही दिन हुए हैं, जब मायावती ने साफ तौर पर घोषणा की थी कि यूपी तो क्या, भारत में कहीं भी कांग्रेस के साथ तालमेल नहीं करेंगी। हालांकि, उससे कुछ दिन पहले ही उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ फैसला किया था कि महागठबंधन अमेठी और रायबरेली में पार्टी की फर्स्ट फैमिली के खिलाफ कोई प्रत्याशी नहीं उतारेगा। इसके जवाब में जब कांग्रेस ने महागठबंधन के लिए 7 सीटें छोड़ने की घोषणा की तो माया तिलमिला गईं। ये वो सीटें हैं, जहां एसपी की फर्स्ट फैमिली, आरएलडी की फर्स्ट फैमिली चुनाव लड़ेगी और जहां से खुद मायावती चुनाव लड़ने का मन बनाएंगी।

दअरसल, मायावती इस बात से परेशान हैं कि कहीं कांग्रेस उनसे उदारता दिखाकर उनके वोट बैंक में सेंध न मार ले। खासकर कांग्रेस की पूर्वी यूपी प्रभारी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने जिस तरह से भीम आर्मी चीफ से अचानक मुलाकात की थी, उसने भी बीएसपी सुप्रीमो की आशंका बढ़ा दी होगी। उन्हें लग रहा होगा कि कांग्रेस की इस चाल से कहीं बीजेपी-विरोधी मतों का बंटवारा न हो जाय या उनमें कोई भ्रम की स्थिति न पैदा हो जाए। इसलिए वह कांग्रेस को सख्त चेतावनी देकर उन्हें किसी भी उलझन से दूर रखना चाहती हैं।

'मायाजाल' में अखिलेश

बुआ उलझन में हैं, तो बबुआ की चिंता बढ़नी भी लाजिमी है। यही कारण है कि अब अखिलेश यादव ने भी राहुल की दोस्ती को भुलाकर कांग्रेस को बहन जी की तर्ज पर ही चेतावनी दी है। उन्होंने भी कहा है कि बीजेपी के साथ लड़ाई में एसपी,बीएसपी और आरएलडी गठबंधन ही सक्षम है, उन्हें कांग्रेस से कोई सहयोग नहीं चाहिए। ये वही अखिलेश यादव हैं, जो हाल तक कह रहे थे कि कौन कहता है कि यूपी में कांग्रेस उनके साथ नहीं है। अमेठी और रायबरेली के लिए उम्मीदवार नहीं देने की ओर इशारा कर उन्होंने कहा था कि कांग्रेस उनके साथ है और उनकी साइकिल पर कई लोग बैठ सकते हैं। यही राजनीति है। अखिलेश जानते हैं कि अभी कुछ भी हो जाए बुआ को नाराज नहीं किया जा सकता। इसलिए, उन्हें फिलहाल यूपी में राहुल गांधी और उनके हाथ का साथ पसंद नहीं आ रहा है।

कांग्रेस की कवायद

कांग्रेस की कवायद

महागठबंधन भले ही उलझन में हो, लेकिन कम से कम एक मुद्दे पर कांग्रेस में कोई असमंजस नहीं है। वह अभी तक 73 सीटों पर अकेले दम लड़ने के लिए तैयार है। उसे बीजेपी के वोट बैंक में भी सेंध लगानी है और महागठबंधन के वोट बैंक को भी लुभाना है। फिलहाल इस मोर्चे पर प्रियंका बखूबी काम कर रही हैं। वह भीम आर्मी के चीफ से मिलकर माया की माया को भी परखना चाहती हैं और गंगा का सहारा लेकर बीजेपी को भी धोना चाहती हैं। राज्य में उनकी पार्टी के पास न कोई अपना मजबूत संगठन है और न ही कोई जनाधार। वो करे भी तो क्या करे। मरता क्या न करता वाले अंदाज में कांग्रेस यूपी में हर दांव खेल रही है।

इसकी शुरुआत प्रियंका की सियासी एंट्री से हुई थी। प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आने समेत अबतक पार्टी ने यूपी में चार बड़े दांव खेलने की कोशिश की है। इसमें भीम आर्मी चीफ से उनकी मुलाकात वाला उनका दांव अभी तक राजनीति की समझ रखने वाले पंडितों के लिए भी उलझन ही बनी हुई है। हालांकि, बाद में भीम आर्मी की ओर से ही कह दिया गया है कि कांग्रेस ने 60 साल में दलितों के लिए कुछ किया ही नहीं है। यही नहीं इस मुलाकात के बाद प्रियंका ने बहुत बढ़चढ़ कर शांति की दुहाई भी दी थी, लेकिन दो दिन बाद ही चंद्रशेखर आजाद ने भीमा कोरेगांव दोहराने की धमकी देकर अपना इरादा भी जाहिर कर दिया था। तीसरा दांव पार्टी ने महागठबंधन के लिए 7 सीटें छोड़कर चलने की कोशिश की है, जिसको लेकर महागठबंधन उलझन में अभी है। सबसे नया और चौथा दांव प्रयागराज से काशी तक प्रियंका की बोट यात्रा है, जिसमें एक तरह से उन्होंने कह भी दिया है कि कांग्रेस के अंदर किसी प्रकार का कोई कन्फ्यूजन नहीं है।

बीजेपी को फायदा?

बीजेपी को फायदा?

अभी तक तो लग रहा है कि बीजेपी यूपी में जैसी स्थिति चाहती थी, वहां की चुनावी राजनीति उसी दिशा में बढ़ रही है। बीजेपी-विरोधी पार्टियों की उलझनें जितनी बढ़ेंगी, उसका फायदा भाजपा को ही मिलने की उम्मीद है। मसलन, अगर दलित वोट बंटे तो फायदा भाजपा को, मुसलमानों के वोट बंटे तो फायदा भाजपा को, महागठबंधन से नाराज माया और अखिलेश समर्थकों के वोट बंटे तो भी ज्यादा फायदा भाजपा को। अलबत्ता, कांग्रेस अकेले महागठबंधन के लिए ही नहीं बीजेपी के लिए भी टेंशन है, लेकिन फिर भी मौजूदा सियासी परिस्थिति बीजेपी को ही ज्यादा सूट कर रही है।

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